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श्रम और श्रमिकों की प्रतिष्ठा

संत विनोबा भावे ने श्रमिकों को शेषनाग कहकर समादृत किया है। सचमुच यह धरती दिनभर श्रम करने वाले श्रमिकों पर टिकी है। वेदों में भी श्रम की महत्ता को स्थापित किया गया है। ऋग्वेद और यजुर्वेद में इस संबंध में वर्णन किया गया है। ऋग्वेद में परमात्मा विद्वानों से हल चलाने के लिए कहते हैं। रामायण में राजा जनक द्वारा हल चलाते हुए सीता प्राप्ति का प्रकरण श्रम की प्रतिष्ठा स्थापित करने के रूप में हम देख सकते हैं। महाभारत के अनुसार, धर्मराज के राजसूय यज्ञ में भगवान श्रीकृष्ण ने जूठी पत्तलें उठाने और पोछा लगाने का काम अपने लिए ढूँढ़ कर शारीरिक श्रम की प्रतिष्ठा में ही अभिवृद्धि की। ऋषि धौम्य द्वारा शिष्य आरूणि को खेत का पानी बांधने का आदेश देने का प्रकरण भी शारीरिक श्रम के महत्व को ही रेखांकित करता है। महाकवि तुलसीदास ने ‘रामचरितमानस’ में श्रम की प्रतिष्ठा को स्थापित करते हुए लिखा है- ‘राम भालु कपि कटक बटोरा, सेतु हेतु श्रम कीन्ह न थोड़ा।’ विनोबा भावे की तरह राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की भी शारीरिक श्रम में अटूट श्रद्धा थी। उन्होंने गीता, बोंडारेफ, रस्किन के जरिए शारीरिक श्रम की अवधारणा को पुष्ट किया है। निःसंदेह शरीरिक श्रम की उपेक्षा व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन की विभिन्न समस्याओं को उत्पन्न करती है। संत कबीरदास और रैदास दोनों श्रमजीवी थे। उन्होंने अपने वैचारिक दृढ़ता और अपनी रचनाओं द्वारा श्रम और श्रमिकों की प्रतिष्ठा को स्थापित किया। वे श्रमशील साधुता के प्रबल पक्षधर थे। प्रख्यात लेखक सरदार पूर्णसिंह ने भी लिखा है – ‘मजदूरी करना जीवन-यात्रा का आध्यात्मिक नियम है। मजदूरी के बिना फकीरी अपने आसन से नीचे गिर जाती है।’ संतुलित समाज के लिए बुद्धिजीवियों और श्रमजीवियों दोनों कीआवश्यकता है। लेकिन यह सच है कि बुद्धिजीवियों की अपेक्षा श्रमजीवियों की मजदूरी और आमदनी बहुत ही कम है।
मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति और सम्मानजनक जीवन के लिए उनकी आमदनी को सम्मानजनक स्तर पर पहुँचाने से ही समाज में विषमता का स्तर कम होगा। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर श्रमजीवियों के संघर्ष की बात करें तो १७८९ ईस्वी में लुई सोलहवां के विरुद्ध प्रâांस की राज क्रांति इतिहास में युगांतरकारी घटना साबित हुई। फिर १९१७ ईस्वी में व्लादिमीर लेनिन के नेतृत्व में रूस में जारशाही के विरुद्ध क्रांति हुई। इन क्रांतियों से श्रमिकों और किसानों की सरकारें स्थापित हुई और संसार में श्रम और श्रमिकों की प्रतिष्ठा स्थापित हुई।
कार्ल मार्क्स ने दुनिया की द्वंद्वात्मक तरीके से व्याख्या की और ‘दुनिया के मज़दूरों एक हो’ का प्रसिद्ध नारा दिया। इसी व्याख्या को लेनिन ने अपने देश में अमलीजामा पहनाया। मई माह दुनिया में श्रम और श्रमिकों के लिए ऐतिहासिक दृष्टि से विशिष्ट है। १ मई अन्तर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह श्रमिकों की कड़ी मेहनत और बलिदान के लिए समर्पित है। १ मई १८८६ को शिकागो का आन्दोलन हुआ था। इस तिथि को मजदूर आंदोलन ने इतिहास की पुरानी मान्यताओं को समाप्त कर दिया और श्रमिकों की आठ घंटे की ड्यूटी को मानक बना दिया। इस प्रकार १ मई की क्रांति से संसार में मजदूरों की अहमियत स्थापित हुई। अपने देश में मजदूर दिवस पहली बार १ मई १९२३ को मनाया गया। १९२६ ईस्वी में भारतीय मजदूर संघ अधिनियम पारित हुआ। आजादी के पूर्व के प्रमुख मजदूर नेताओं में लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, सरदार बल्लभ भाई पटेल, सुभाष चन्द्र बोस, सी.आर. दास, भीम राव अंबेडकर और जवाहर लाल नेहरू प्रसिद्ध हैं। नवंबर १९३८ में एक लाख से ज्यादा मजदूरों की हड़ताल का नेतृत्व डॉ. भीम राव अंबेडकर ने किया था। आजादी के बाद के प्रमुख भारतीय मजदूर नेताओं में दत्ता सामंत, जार्ज फर्नांडीस, एस. ए. डांगे, ज्योति बसु, नंबरीपाद, वी.वी. गिरी इत्यादि मजदूरों की भलाई के लिए जीवन पर्यंत काम किया। हमारे देश में भी मजदूरों की भलाई के लिए विभिन्न ट्रेड यूनियनों का गठन हुआ। इन ट्रेड यूनियनों के संयुक्त प्रयास से श्रमिकों के हित के लिए सरकार द्वारा विभिन्न कानून बनाए गए। महात्मा गाँधी ने कहा था- ‘किसी देश की तरक्की उस देश के कामगारों और किसानों पर निर्भर करती है।’
– अरुण कुमार यादव

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Written by Sahitynama

साहित्यनामा मुंबई से प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका है। जिसके साथ देश विदेश से नवोदित एवं स्थापित साहित्यकार जुड़े हैं।

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