परवरिश
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बच्चों की परवरिश – एक कठिन कार्य

बाल मनोविज्ञानियों के अनुसार दुनिया का सबसे कठिन कार्य बच्चों की सही परवरिश है क्योंकि इसका कोई बंधा हुआ नियम नहीं होता है लेकिन बच्चे वही करते हैं जो वह अपने बड़ो से सीखते हैं.
बच्चे जिनकी मानसिकता गीली मिट्टी की तरह होती है। हम बड़े उस पर जो कुछ लिखते जाते हैं वही उनका जीवन ज्ञान होता है। वही उनके संस्कार में ढल जाता है हर मां बाप की यही ख्वाईश रहती है कि वह एक समझदार अभिभावक बने वह यह भी चाहते हैं कि बच्चा उनके जैसा बने लेकिन यहां यह विचारणीय हो जाता है कि वह उसे अपने जैसा क्यों बनाना चाहते हैं? क्या वह इस दुनिया में सबसे बेहतर हैं, सबसे अधिक जानकार हैं ?
आज का समय मोबाईल युग है जहां हमें अपने सारे प्रश्नों के जबाब तो मिल जाते हैं लेकिन सही क्या है इसका ज्ञान भी तो होना चाहिए ।
क्योंकि हर बच्चा अपने आप में अलग है अनूठा है बड़े सयाने तो यह भी कहते पाए गये हैं कि जब बच्चों को पालने का सलीका नहीं आता तो बच्चे किसलिए पैदा किये? लेकिन यह एक जैविक प्रक्रिया है जो होती ही है और माता पिता एक शरीर को जन्म देते हैं,उसके जीवन के प्रति माता पिता को समर्पण दिखाना होता है। तभी बच्चा भी उनसे सीखेगा! माता-पिता को परवरिश के दौरान किसी भी तरह की जोर जबरदस्ती नहीं करनी चाहिए। बस बच्चे की समझ को विकसित करने का प्रयास करना होता है।
बच्चों की परवरिश में माता पिता को ही मेहनत करनी होती है। उनके सम्मुख अच्छा व्यवहार करना होता है, जो प्रेरणा दायक हो,कहा जाता है कि माता पिता बच्चों की तकदीर लिखते हैं। इस तरह सकारात्मक वातावरण में सुरक्षित माहौल में वच्चों की परवरिश सरलता से होती जाती है ।

हर एक शिशु अपने जन्म के समय लगभग सौ बिलीयन मस्तिष्क कोशिकाएँ लेकर जन्म लेता है यह न्यूरोंन्स शिशु में विचारों को पैदा करते हैं परिवार के पुष्ट माहौल और माता पिता की सही शिक्षा से उसके व्यक्तिव को आकार मिलता है। शैशवावस्था से लेकर उसके सात वर्ष का होनें तक की परवरिश बहुत महत्वपूर्ण होती है,क्योंकि शिशु का मस्तिष्क सीखने की क्षमताओं से भरा होता है। बाल्यावस्था का दिया ज्ञान शिशु के मस्तिष्क में छप जाता है। हर अभिवावक अपने बच्चे को प्यार करते हैं लेकिन उनका प्यार संतुलित भी होना चहिये परशरिश के दौरान कमाता पिता बच्चे को वह सब देते रहते हैं जिसकी वह फरमाईश करता है वह सोचते है कि इससे वह अपना प्यार जाहिर कर रहे हैं लेकिन परवरिश का यह तरीका बच्चों में माता पिता को छलने के तरीकों को प्रोत्साहित करता है बच्चों को जरुरत और गैर जरुरतके फर्क को समझाना चाहिए। क्योंकि बच्चा यह समझने लगता है कि मैं मांगूगा और रोऊँगा तो माता-पिता मुझे सब दिला देंगे अधिकतर माता-पिता बच्चों की परवरिश के दौरान उन्हें अच्छा खाना अच्छे कपड़े देना ही समझते हैं जो सही नहीं है। तो बच्चों को पालने में प्यार तो करें लेकिन उस प्यार को सही तरीकों के साथ जाहिर भी करें. बच्चों के सम्मुख विनम्र रहें और सकारात्मक व्यवहार की प्रस्तुति करें जैसा वह अपने बच्चों से चाहते हैं। बच्चों को सृजनात्मक और सुरक्षित माहौल के साथ उनका ध्यान रखना उनकी गढ़ी कहानियाँ सुनना उन्हें कहानियाँ सुनाना सही सोच विकसित करना बच्चों के साथ खेलना, खेलो के माध्यम से उनका दृष्टांत समझना, दृष्टिकोण में सकारात्मक सुधार करना उनकी समस्या को सुनना सुलझाने में मदद करना।

परवरिश के दौरान माता-पिता को यही ध्यान रखना चाहिए। कई पेरेंन्टिक तकनीकों का वैज्ञानिक रुप से शोध भी किया गया है जो हमें यही बताती हैं कि हर बच्चा अपने आप में अलग होता है। लेकिन हर कोई परफ्केट भी नहीं होता है। किंतु हर बालक अपने आप में खास अवशय है क्योंकि हर बच्चे में एक खासियत होती है, प्रतिभा छिपी होती है। घर को बच्चों के लिए एक सुरक्षित जगह बनायें कई माता-पिता घर को सुबह शाम की लड़ाई का अड्डा बना लेते हैं। जहां सुबह शाम की तू तू मैं मैं से घर का माहौल हिंसा भरा हो जाता है। कभी अभिवाभक बच्चों पर हाथ भी उठाने लगते हैं। बाल्यावस्था में बच्चा बड़ों का हिंसात्मक व्यवहार सहता है क्योंकि वो लाचार होता है। लेकिन घर का यह सब माहौल बच्चों के मस्तिष्क में हिंसा के बीज बो देता है। उस माहौल में वह बच्चा ठीठ हो जाता है और वही व्यवहार वह अपने से छोटों के साथ करता है।
अगर बच्चों के साथ माता पिता का कम्यूनिकेशन मजबूत होगा तो माता पिता बच्चों की हर तरह की बातों से परचित रहेंगे यह सही है कि अभिभावक और बच्चों में अनुशासन का लिहाज होना चाहिए लेकिन यह दूरी इतनी भी ना हो कि आपसी संवाद खो जाए बच्चों को डराकर नहीं संतुलित व्यवहार व्यवस्था के साथ पालन होना चाहिए।
जब हर एक बच्चा अलग है और हर बच्चे में एक खासियत है तो माता-पिता को ऐसी बातें करनी चाहिए जिससे उसका मनोबल ऊंचा उठे मानसिक स्तर को सही तरह से उठाने के लिए अन्य बच्चों से उसकी तुलना नहीं करनी चाहिए।
बिना नियम के जिंदगी की कल्पना नहीं की जा सकती है। बच्चों के लिए भी नियम बनायें जैसे पहले होमवर्क करो फिर टेलीविजन देखना और गेम खेलना और माता पिता को भी अपने व्यवहार से वही प्रेरित करने वालाr प्रस्तुती करनी चाहिए। झूठ नहीं बोलना चाहिए। बच्चों को कहानियों के माध्यम से समझाना चाहिए कि झूठ की राह गलत होती है। और झूठ बोलने से हम अपने आगे कई मुसीबतें पैदा कर लेते हैं। कुछ बच्चे बहुत चंचल होते हैं बिना हाथ पैर हिलाए एक जगह टिक नहीं सकते हैं उन बच्चों पर अधिक ध्यान रखने की होती है। कभी जरुरत के हिसाब से मनोचिकित्सकों की राय भी लेनी चाहिए। डांट और बहुत सख्ती भी बच्चों को विद्रोही बनाती है। कहा भी जाता है कि ज्यादा सख्ती टूटने की वजह बन जाती है।

माताओं को भी बच्चों को की देखभाल करते समय अपने स्वास्थय का ध्यान रखना चाहिए क्योंकि तभी वह बच्चों की देखभाल कर पाऐंगी बच्चों को जिम्मेदार बनाने के लिए उनकी उम्र के हिसाब से छोटे छोटे कार्य भी उन्हे सिखाने चाहिए। दूसरे की सेवा,घर की साफ सफाई, सामान को सलीके से रखना, अपने कपड़े साफ रखना,परवरिश के दौरान दी गयी शिक्षा की यह सब सीख एक बालक को जीवन की चुनौतियों के लिए भी तैयार करती हैं।
शिशु के पैदा होने पर मां बाप की सेहत और शादी सेकेंड प्रायोरिटी बन जाती है। और वह बच्चे से हटकर अपनी लाईफ पर ध्यान नहीं जाता है। जो एकदम ठीक नहीं है।

बच्चा माता पिता की परछाई होता है आप, वह सरल होता है ईमानदार कोशिशों और सरलता के साथ वह हर सीख को सीख लेता है। समयानुसार हर शिक्षा को उसे देना चाहिए। सीख के सही उपयोग के उदाहरण भी देने चाहिए। क्योंकि दिखावा नहीं सही शिक्षा ही सहायक होती है। बच्चों को मातापिता का भावनात्मक सहारा तो मिलता ही है। लेकिन बच्चे में भावनात्मक संतुलन रहे यह विचारणीय है। अपने बालक में प्रेम भाव को बढाना चाहिए डर को नहीं,कुछ पालक बच्चों को अपनी प्रौपर्टी मानते हैं। वह यह सोचते हैं कि आज हम इसकी परवरिश में और इसकी देखभाल में जितना इनवैस्ट करेंगे यह बड़ा होकर अच्छी सैलरी के रुप में हमें सब देगा और हम गर्व से सर उठाकर रहेंगे जो लोग ऐसा करते हैं वह बहुत गलत विचार रखते हैं। पालक यहभी चाहते हैं कि बच्चे उनसे जुडे़ रहें जबकि उन्हें ऐसा बनाओ कि वह अपने पालकों से भी बेहतर बनें अपनी समस्याओं का समाधान स्वयं विचारें, उन्हे अच्छा साथ दीजिए वह अपने मातापिता के अच्छे दोस्त बनेंगे बच्चों को पालना और एक पौधे की देखभाल करना काफी कुछ बराबर होता है। जिस तरह हम पौधे को समय पर पानी देते हैं उसे धूप से बचाते हैं समय समय पर खाद डालते हैं उसी तरह से बच्चोंको भी पौष्टिक आहार और भावनात्मक सहारे के साथ अंदरुनी शक्ति और मजबूती देनी होगी जिससे वह बाहरी विषम स्थितियों का भी डटकर मुकाबला करें. बच्चे कुदरतका खूबसूरत तोहफा होते हैं सबसेपहले हर पालक को उन्हें एक अच्छी परवरिश देकर इंसान तो बनाने का प्रयास करना ही चाहिए। एक अच्छी सोच और अच्छे व्यवहार वाला इंसान अपने समाज अपने परिवार और अपने राष्ट्र के उत्थान के लिए जागरुक रहता है। उसका यह व्यवहार हम सभी को कुदरत से जोड़कर रखता है। जिसकी हम सभी संतानें हैं ।

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Written by Sahitynama

साहित्यनामा मुंबई से प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका है। जिसके साथ देश विदेश से नवोदित एवं स्थापित साहित्यकार जुड़े हैं।

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