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साम्प्रदायिक सद्भाव में साहित्य की भूमिका

प्रख्यात साहित्यकार गोपीनाथ कालभोर ने लिखा है- ‘समूहों के हितों के बीच होने वाले टकराव का रूप जब विध्वंसक एवं दंगाई हो जाए तो वह सांप्रदायिक कहलाता है।’ निश्चित रूप से सांप्रदायिकता का संबंध किसी धर्म, जाति अथवा समूह की अस्मिता से है, जिसका आधार अन्य समूह के वैषम्य, भेद और वैमनस्य होता है। एक अन्य साहित्यकार ने लिखा – ‘साम्प्रदायिकता साम्राज्यवाद की कोख से जन्मी उसकी अवैध संतान है जिसका एकमात्र उद्देश्य साम्राज्यवाद के हितों को पोषित करके जनतंत्र और स्वाधीनता की चेतना एवं संघर्ष को कुंद करना होता है।’

इसी तथ्य को इंगित करते हुए विख्यात इतिहासकार विपिन चंद्र ने लिखा है कि साम्प्रदायिकता और इसकी बढ़ोतरी उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के दौरान भारत की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक घटनाओं एवं परिस्थितियों का परिणाम था। स्पष्ट है कि साम्प्रदायिकता का संबंध धार्मिक विकृतियों और विद्रूपताओं से है। बिट्रिश साम्राज्यवाद की साजिश ने अपने देश की एकता और सद्भाव को नष्ट करने के लिए हिन्दू और मुसलमान को दो विरोधी संप्रदायों के रूप में आमने-सामने खड़ा कर दी। नतीजतन दोनों संप्रदायोंके बीच अविश्वास और विद्वेष की विषैली भावनाएं बढ़ती
ही गई। वर्तमान समय में देश साम्प्रदायिक समस्या के दंश को झेल रहा है।साम्प्रदायिक समस्या के कई कारण हैं । विभाजन की कटु- स्मृतियाँ, राजनीतिक दलों द्वारा निहित स्वार्थों के लिए पृथक्करण की भावना अपनाना ,मुसलमानों का आर्थिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़ापन, सरकार की उदासीनता, तुष्टीकरण की राजनीति ,वोट बैंक की राजनीति इत्यादि प्रमुख कारण हैं।
साम्प्रदायिकता के विरूद्ध सद्भाव को स्थापित करने और इसके संवर्धन में साहित्य की महती भूमिका रही है। भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने इस दिशा में ‘पंच पवित्रात्मा’ शीर्षक से एक पुस्तिका को प्रकाशित करके सराहनीय प्रयास किए थे जिसमें मुसलमानी मत के मूलाचार्य महात्मा मुहम्मद, आदरणीय अली, बीबी फातिमा, इमाम हसन और इमाम हुसैन की
संक्षिप्त जीवनी प्रस्तुत की थी। भारतेन्दु हरिश्चंद्र के बाद देवकीनंदन खत्री ने अपने कथा साहित्य में मुसलमान पात्रों की सृष्टि काफी संख्या में की है। भारतीय कथासाहित्य में प्रेमचंद कदाचित् पहले लेखक हैं जिन्होंनें स्वाधीनता आन्दोलन के संदर्भ में इस जातीय सद्भाव के महत्व को समझा और भारी जोखिम उठाकर उसके विकास का रास्ता तैयार किया। सन्1909 में उर्दू में प्रकाशित ‘सोजेवतन’ की कहानियाँ मुस्लिम पृष्ठभूमि की ही कहानियाँ हैं जिसमें
स्वाधीनता की चेतना थी और जातीय सद्भाव का संवर्धन भी था। आगे चलकर प्रेमचंद अपने इस मुहिम के प्रति और सजग हो गए।उन्होनें ‘कर्बला’ लिखकर मुस्लिम जनजीवन के अंकन द्वारा आत्मीयता और सद्भाव के रिश्ता को और प्रगाढ़ कर दिए। ‘ईदगाह’ और ‘ पंचपरमेश्वर ‘जैसी कहानियों में मुस्लिम जनजीवन के अंकन के साथ- साथ साझा – संस्कृति के सौंदर्य और विरासत की बात करते हैं। उन्होेंने लिखा कि मजहब खिदमत का नाम है, लूट और कत्ल का नहीं। अमृतलाल नागर की कहानी ‘आदमी नहीं ! नहीं!! ‘, यशपाल की ‘प्रेम का सार’ , ‘परदा’ और ‘गमी में खुशी’ इत्यादि इसी तरह की कहानियाँ हैं।

अज्ञेय ने ‘शरणदाता ‘ और ‘ बदला ‘ जैसी कहानियाँ लिखी। इन कहानियों में मानवीय सौहार्द की अंतर्धारा को देखा जा सकता है जो हताशा के क्षणों में भी मनुष्य का साथ नहीं छोड़ती। किशन चंद की कहानियों का संग्रह ‘हम वहशी’ हैं ,
मंटो की ‘खोल दो’ और ‘टोबा टेक सिंह एवं ख्वाजा अहमद अब्बास की ‘सरदार जी’ आदि कहानियाँ मानवीय सौहार्द पर विशेष रूप से बल देने वाली कहानियाँ हैं जो घोर अंधकार में भी मनुष्यता का दिशा- निर्देशन करता है।पाकिस्तान के अस्तित्व में आने के बाद भी आम आदमी की यातना और हताशा में भी कोई अंतर नहीं आया है-सिवाय उसके अपनी जड़ों से कटने और सदियों से बसे- बसाए जीवन के उजड़ने के।इस तथ्य को कृष्णा सोबती की अनेक कहानियाँ बड़े प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करती है। ‘सिक्का बदल गया’ , ‘डरो मत’ ,’मैं तुम्हारी रक्षा करूँगा’ और ‘आजादी शम्मोजान की’ आदि उनकी ऐसी ही कहानियाँ हैं। बदनुमा ने अपने संग्रह ‘अनित्य’ की अनेक कहानियों में बिहारी मुसलमान की उस भावात्मक पीड़ा का उल्लेख किया है जो अपनी जड़ों से कटकर रेत में पड़ी मछली की तरह छटपटाता है और हताश होकर अपनी जड़ों की ओर लौटता है। भीष्म साहनी की अनेक कहानियाँ साम्प्रदायिक सौहार्द की गरिमा का बखान करती है। ‘सलमा आया’ , ‘सरदारजी’,’जहूर बख’ और ‘ झुनझुना ‘ जैसी कहानियाँ सीधे हृदय को स्पर्श करती हैं। अपनी सुप्रसिद्ध कहानी ‘अमृतसर आ गया’ में भीष्म साहनी सांप्रदायिक उन्माद के उद्भव और विस्फोट की समूची प्रक्रिया को उद्घाटित करते है।
विष्णु प्रभाकर ने भी विभाजन की पृष्ठभूमि और मानवीय सौहार्द का अंकन करने वाली अनेक कहानियाँ लिखी । ‘मेरा वतन’ इस श्रेणी का उनका प्रसिद्ध कहानी संग्रह है।इसी तरह विभाजन की त्रासदी पर महीप सिंह की कहानी ‘पानी और पुल’ रूह को कँपा जाती है। जरा इस कहानी के इस वाक्य को पढ़िए- ‘पंजाब के पाँचों नदियों का जल उन्माद की तीखी शराब बन चुका था।’ इसी तरह दिल्ली में हुए दंगों की पृष्ठभूमि पर सुरेंद्र तिवारी के संपादन में प्रकाशित ‘ काला नवंबर ‘ की अनेक कहानियाँ आदमी की पशुता का उल्लेख करती है,फिर भी किसी के हृदय में मानवीय सौहार्द की चमक विद्यमान है- यह भी बताती है। हिन्दी उपन्यासों में भी सांप्रदायिक सद्भाव पर बहुत कुछ लिखा गया है। प्रख्यात साहित्यकार कमलेश्वर का ‘ कितने पाकिस्तान ‘ भारत-पाकिस्तान के बँटवारे और हिन्दू-मुस्लिम संबंधों पर आधारित प्रसिद्ध उपन्यास है। इसमें एक जबरदस्त जिरह छिड़ी है। यह उपन्यास हिन्दू, मुसलमान, सिख सबकी तरफ लगातार सवाल खड़े करता है कि मित्रता बड़ी है या शत्रुता। प्रेम बड़ा है या घृणा।यह कब्रिस्तान और श्मशान के बीच जीवन-जिरह है । इस उपन्यास ने आज के टूटते मानवीय मूल्यों को संजोने तथा दहशत की जिन्दगी में मानवता की खोज की है। इसी तरह भीष्म साहनी का ‘तमस’ विभाजन के समय के साम्प्रदायिक दंगे पर आधारित प्रसिद्ध उपन्यास है। इसमें मानवीय घृणा ,साम्प्रदायिकता और नृशंस-पशुता की कहानी है। इस उपन्यास में व्यक्तिगत और सामाजिक संबंधों में दरार पैदा करने वाले मजहब की संकीर्णता का यथार्थ वर्णन है। इस उपन्यास में साम्प्रदायिक हादसे का चित्रण तो है ही ,इसके साथ उसके कारणों की जाँच-पड़ताल भी की गयी है।

साम्प्रदायिक सद्भाव में साहित्य

प्रख्यात लेखिका अमृता प्रीतम ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास ‘पिंजर’ में बँटवारे के पूर्व के हिन्दुस्तान के पंजाब के एक गाँव की लड़की पूरो के दुखों की कहानी का वर्णन किया है। इसके साथ-साथ उस समय की राजनैतिक हलचलों के कारण हो रहे घटनाक्रम के प्रभावों से जो बेचैनी जन साधारण के अंदर पैदा लेती है,उसका भी मार्मिक वर्णन है।
पिंजर का कथ्य औरत के दहशत तथा अकेलेपन की कहानी है जो विभाजन की त्रासदी के रूप में झेलने के लिए बाध्य है। मंजूर एहतेशाम ने अपने उपन्यास ‘ सूखा बरगद ‘ में साम्प्रदायिक सोच पर कटु व्यंग्य कर सुहैल के माध्यम से लोगों में राष्ट्रीय भावनाओं को बढ़ावा देने का प्रयास किया है।सुहैल लोगों से कहता है- ‘यही तुम्हारा मुल्क है और इसी से तुम्हारी किस्मत जुड़ी है। तुम पहले एक इंसान, फिर हिन्दुस्तानी और उसके बाद मुसलमान हो।’ ‘ झूठा सच ‘ प्रख्यात साहित्यकार यशपाल द्वारा लिखित उपन्यास है। इसमें देश विभाजन और उसके परिणाम के चित्रण की काफी ईमानदारी से लिखी कहानी है। इस उपन्यास में वीभत्स दृश्य हैं तो यथेष्ट करूणा भी। इस उपन्यास के बारे में लेखक ने लिखा है कि मैं झूठा सच में सच को कल्पना से रंग कर उसी जन समुदाय को सौंप रहा हूँ जो सदा झूठ से ठगा जाकर भी सच के लिए अपनी निष्ठा और उसकी ओर बढ़ने का साहस नहीं छोड़ता। डॉक्टर राही मासूम रजा के प्रसिद्ध उपन्यास ‘ टोपी शुक्ला ‘ में हिन्दू- मुस्लिम की समस्या का यथार्थ चित्रण है। इसमें लेखक ने आज के भारत में चलने वाली राजनीति, जाति प्रथा , धर्म, सम्प्रदाय की भावना का पर्दाफाश किया है। इसी तरह के कई अन्य उपन्यास साम्प्रदायिक सौहार्द को स्थापित करने में अपना अमूल्य योगदान दिए हैं। हिन्दी साहित्य की कविताओं में भी सांप्रदायिक सद्भाव का उत्कृष्ट चिंतन और वर्णन है।
संत कवियों का विश्वास था कि धर्म केवल एक है और वह है मानव धर्म। तुलसीदास, सूरदास , कबीर, नानक, रैदास , नामदेव, दादूदयाल आदि कवियों ने हिन्दू- मुस्लिम एकता का समर्थन किया। रामधारी सिंह ‘ दिनकर ‘ लिखते हैं –
“तुलसीदास के सारे साहित्य में इस बात का कहीं रंचभर भी प्रमाण नहीं है कि मुसलमानों पर उन्हें तनिक भी क्रोध या आक्रोश था।”आगे वे लिखते हैं-
” हिन्दी के दूसरे महाकवि सूरदास में भी मुसलमानों के प्रति निंदा या आक्रोश के भाव नहीं है।”
( संस्कृति के चार अध्याय, दिनकर ,पृष्ठ संख्या-252)

रसखान मुसलमान होकर भी कहते हैं-” मानुष हौ तो वही रसखानि बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।” मुस्लिम कवयित्री ताज कृष्ण तत्व की महिमा का वर्णन भावविभोर होकर करती है। कविवर रहीम की भारत- भक्ति से कौन परिचित नहीं
है। तुलसीदास और रहीम के बीच के आत्मीय संबंध तो जगजाहिर है। कबीर दास भारतीय धर्म निरपेक्षता के आधार पुरूष माने जाते हैं। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से जनमानस की आँखों पर धर्म और सम्प्रदाय के नाम पर पड़े परदे को खोलने का प्रयास किया। उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम एकता का समर्थन किया तथा साम्प्रदायिक सद्भाव के विचार को व्यक्त किया।
वे कहते हैं-
“अव्वल अल्लाह नूर उपाया, कुदरत के सब बंदे।
एक नूर तेज सब जग उपज्या, कौन भले को मंदे।। “
तथा
” हिन्दू कहे मोहि राम पियारा , तुरक कहे रहमाना।
आपस में दोउ लरि लरि मुए , मरम न काहू जाना ।।
एवं
” पूरब दिशा हरी को बासा ,पश्चिम अल्लह मुकामा।
दिल में खोजि दिलहि मा खोजो, इहै करीमा रामा ।।”
ये सारे तथ्य साम्प्रदायिक सद्भाव को दर्शाते हैं। आधुनिक काल में साम्प्रदायिक समस्या के संदर्भ में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘ दिनकर ‘ की कविता ‘तकदीर का बटवारा’ और ‘कस्मैदेवाय’ बहुत ही प्रसिद्ध है।
‘तकदीर का बटवारा ‘ कविता की इन पंक्तियों को पढ़िए-

“खून! खूॅ की प्यास , तो जाकर पियो ,
जालिमो , अपने हृदय का खून ही ,
मर चुकी तकदीर हिन्दुस्तान की,
शेष इसमें एक बूंद लहू नहीं ।”
तथा

” खूॅ बहाया जा रहा इन्सान का
सींगवाले जानवर के प्यार में !
कौम की तकदीर फोड़ी जा रही
मस्जिदों की ईंट की दीवार में।”

सम्प्रदाय के नाम पर पाखंड फैलाने वालों को सही मार्ग बताते हुए वे अपनी एक कविता में लिखते हैं-

” आरती लिए तू किसे ढूँढता है मूरख,
मंदिरों, राजप्रासादों , तहखानों में,
देवता कहीं सड़कों पर गिट्टी तोड़ रहे ,
देवता मिलेगें खेतों में , खलिहानों में।”

मैथिलीशरण शरण गुप्त मानवतावाद को ग्रहण करके सांप्रदायिक एकता का प्रतिपादन किया। ‘काबा और कर्बला’ जैसी प्रसिद्ध कविता लिखकर उन्होंने सांप्रदायिक सद्भाव का मिसाल पेश किए। इसी तरह माखनलाल लाल चतुर्वेदी ने ‘भारत भारती’ कृति और ‘दीप से दीप जले’ कविता लिखकर इस दिशा में देश प्रेम, मानवतावाद और सत्य- अहिंसा का प्रचार किए। उनकी कविताओं में राष्ट्रीय एकता और प्रेम की अनूठी झलक मिलती है। मानवीय पूजा इनके काव्य के आधार हैं। ” दीप से दीप जले ‘ उनकी कविता की इन पंक्तियों को पढ़िए –

‘ युग के दीप नए मानव , मानवी ढ़लें
सुलग सुलग री जोत ! दीप से दीप जलें। “

छायावाद के प्रमुख कवियों की रचनाओं में भी सांप्रदायिक सद्भाव दृष्टिगोचर होता है।रामस्वरूप चतुर्वेदी लिखते हैं-” राष्ट्रीयता जहाँ कविता बनी है वे प्रसाद और निराला के गीत हैं।” राष्ट्रीय एकता और साम्प्रदायिक सद्भावना आगे चलकर नागार्जुन, मुक्तिबोध, रघुवीर, शमशेर बहादुर सिंह आदि की रचनाओं में मिलती है।
शेर जंग गर्ग लिखते हैं-

” गर्क वे हो गये नफरत के गली – कूचों में ,
फर्क करते रहे जो उम्र भर इंसानों में ,
यह मुसलमान, यह हिन्दू , यह ईसाई, यह सिख ,
आदमी खो गया , मजहब के बियाबानों में।”

एक कवि ने लिखा-

” फूल खिलते हैं अनेक पर चमन एक है,
हैं सितारे कई पर गगन एक है ,
लाश हिन्दू की हो या मुसलमान की ,
हमने देखा है कफन सबका एक है।”

डॉक्टर शिवमंगल सिंह ‘ सुमन ‘ की कविता ‘ मेरा देश जल रहा कोई नहीं बुझाने वाला ‘ में लिखा गया है- ” भगत सिंह, अशफ़ाक, लाल मोहन, गणेश बलिदानी,सोंच रहे होंगे हम सब की व्यर्थ गयी कुर्बानी, जिस धरती को तन की देकर खाद खून से सींचा, अंकुर लेते समय उसी पर किसने जहर उलींचा ।”

हरिवंश राय बच्चन लिखते हैं-

” समस्त देश की बस एक टेक हो ,
समस्त छिन्न-भिन्न जाति एक हो ,
विमूढ़ता नहीं , जहाँ विवेक एक हो ,
यही प्रभाव/ शब्द- शब्द में भरो।”

भारत भूमि पर रहने वाले भारतीयों को एक साथ मिलकर रहने की प्रेरणा देते हुए पंत जी लिखते हैं-

” राष्ट्र वर्ग से निखरे मानव ,
जाति- वर्ण के क्षय हों दानव ,
नव प्रकाश भव का हो अनुभव,
रहे न मन भौतिक तमसाः वृत्त ,
इन्हें भाव दो ।”

निदा फाजली साहब मनुष्य द्वारा मनुष्यों के बीच खड़ी की गयी साम्प्रदायिकता की दीवार को गिराकर मनुष्यता की विजय देखना चाहते थे।उन्होंने हमेशा मनुष्य के भीतर, सृष्टि के कण- कण में खुदा की तलाश की।

” चाहे गीता बाचिए या पढ़िए कुरान।
तेरा मेरा प्यार ही हर पुस्तक का ज्ञान।।”

साम्प्रदायिक सद्भाव की एक अन्य बेहतरीन कविता की इन पंक्तियों को
पढ़िए-

” अब तो एक ऐसा वतन मेरा तेरा ईमान हो,
इक तरफ गीता हो जिसमें इक तरफ कुरान हो।
काश ऐसी भी मोहब्बत हो कभी इस देश में,
मेरे घर उपवास हो जब तेरे घर रमजान हो।”

इस प्रकार, हम देखते हैं कि साम्प्रदायिक सद्भाव को स्थापित करने में हिन्दी साहित्य की महत्वपूर्ण भूमिका है।

– अरूण कुमार यादव

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Written by Sahitynama

साहित्यनामा मुंबई से प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका है। जिसके साथ देश विदेश से नवोदित एवं स्थापित साहित्यकार जुड़े हैं।

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