in

जश्न–ए–जनाजा

मणिकर्णिका
कितनों की आँखें नम होंगी, क्या यारों का भरमार लगेगा
कितनी संजीदा सजेगी अर्थी, कितनों का व्यापार बनेगा,
जब आखिरी पड़ाव में जल कर शव मेरा अंगार बनेगा,
मणिकर्णिका पे जश्न भी होगा भस्म मेरा श्रृंगार बनेगा।
इक ख्वाब अधूरा शेष रहेगा, इक आस लगाए सो जाऊंगा
इक प्रेम अधूरा शेष रहेगा इक आग जलाए सो जाऊंगा
इक छटा घटा की यदा कदा स्मृतियों का विस्तार बनेगा
मणिकर्णिका पर जश्न भी होगा भस्म मेरा श्रृंगार बनेगा।
क्या शाम वो होगी गंगा तट की जहां लगेगा शवों का मेला
दुनिया से लेकर अन्त विदाई जब मैं निकल पड़ूंगा अकेला,
लेकर उड़ान कण कण मेरा छोटा सा इक संसार बनेगा
मणिकर्णिका पर जश्न भी होगा भस्म मेरा श्रृंगार बनेगा।
मुख में होगा गंगाजल और तुलसी दल की छोटी किसलय
 मैं शेष रखूंगा अपने हिय में थोड़ी सी प्यास थोड़ा सा मय
 मेरा अस्तित्व अवसान दिवस मेरा अन्तिम त्यौहार बनेगा
मणिकर्णिका पर जश्न भी होगा भस्म मेरा श्रृंगार बनेगा।
मैं खुशियों में तेरे साथ सदा, रोऊंगा तेरी उदासी में
हो गुम सा कहीं हवाओं में मैं बहूंगा शिव के काशी में
विश्वनाथ पंकज पग रज, मेरा अमृत आहार बनेगा
मणिकर्णिका पर जश्न भी होगा भस्म मेरा श्रृंगार बनेगा।
मैं धूं धूं करके जलूंगा अपनी चिता के हर चिंगारी में,
मैं प्रियतम तुम्हें पुकारूंगा अपने हर इक सिसकारी में,
नभ रोएगा उस दिन वियोग में अश्रु मेरा जल धार बनेगा
मणिकर्णिका पर जश्न भी होगा भस्म मेरा श्रृंगार बनेगा।
आशुतोष शर्मा 
वाराणसी (उत्तर प्रदेश) 

What do you think?

Written by admin

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

आख़िरी मुलाकात

आख़िरी मुलाकात

हमारी अपनी संस्कृति का भारत

हमारी अपनी संस्कृति का भारत