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ग़ालिब हो जाने के लिए

ग़ालिब हो जाने के लिए
सुना था ग़ालिब को उमराव की गोद में लेटे लेटे
चुप जुबां आरज़ू समेटे
जब नया ख्याल आता
वो उनके दुपट्टे के कोने में गिरह लगा देते
और ख्याल कैद कर लेते
और जब कलम स्याही पाते
दुपट्टे की गिरह खोलते जाते
ग़ज़ल करीने से उतारते जाते।
हमे भी चढ़ा है शौक नया ग़ज़लखानी का
कलम की बेपरवाह रवानी का
कहानी का, बेवक्त जवानी का
अब गालिब हो जाना तो मुमकिन नहीं
सो अनाड़ी, अदक्ष कवि ही सही।
ग़ालिब हो जाने के लिए
एक उमराव भी चाहिए।
मैं जब भी अपनी उमराव की गोद में लेटता हूं
ख्वाबों में डूबता हूं
खयालों को समेटता हूं
और कैद करने को खोजता हूं दुपट्टा
वो अक्सर गाउन पहने बैठी होती है।
अब बताइए, इसपर किनारा कहां खोजा जाए
उंगलियां किधर लपेटी जाए
कमबख्त गिरह कहां लगाई जाए
नज़्म कैसे कैद की जाए।
सो हम चादर ही मरोड़ देते है
नज्मों से तरबतर मन उसी में निचोड़ देते हैं
वो फिर, कभी बेटे के पैरो तले कुचली जाती है
बेटी के काजल से रंगी जाती है
कभी मशीन में घूम जाती है
और सुलगती धूप में पड़ जाती है।
और जब ग़ज़ल लिखने बैठते है
अंगूर का किशमिश हो चुका होता है
सूख जाती है भावनाएं सारी
कोमल फूलों की रंगीन क्यारी।
चादर में वो दुपट्टे वाली बात कहां
सीने से लगे सच्चे जज़्बात कहां
वो तो हैसियत तक पसारने की चीज़ है
उसमे चांद, सितारे, कायनात कहां।
अब तो जो दर्ज़ होगा
वो इसी दर्जे का होगा।
देखिए आज मैने अपने खराब कवि
होने के मायने खोज लिए है
क्योंकि ग़ालिब हो जाने के लिए
एक उमराव भी चाहिए।
(तेजेश सिंह नेगी)

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