राष्ट्रधर्म और साहित्य

हमारे धर्म ग्रंथों में राष्ट्र, धर्म और साहित्य इतने अधिक निकट लगते हैं कि कई बार उनमें अन्तर करना कठिन हो जाता है। हमारे ग्रंथ कहते हैं कि जो राष्ट्र है, वही हमारा धर्म है, इसलिए राष्ट्र हमेशा ही प्रथम होता है। यह बात भी हमें आदि-साहित्य में मिलती है। विश्व में भारतवर्ष ही एकमात्र है, जहाँ धरती को भी माँ माना जाता है। धरती माँ के प्रति अदम्य सम्मान एवं प्रेम 'नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे' से अभिव्यक्त होता है। यही वह पुण्यभूमि है, जहाँ यह शरीर जन्मा और पोषित हुआ है, इसलिए इस जन्मभूमि से बढ़कर और कुछ नहीं। रामायण में वाल्मीकि जी ने लिखा है कि "जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी" अर्थात् जननी (माँ) और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है। पराधीनता के दौर में हज़ारों-लाखों क्रांतिकारियों के मन में केवल यही भावना थी कि किसी तरह भारत माँ को परतंत्रता की बेड़ियों से मुक्त कराया जाए। राष्ट्रीय धर्म तो हमारे रक्त में पहले से ही अभिसिंचित था, उसमें बस थोड़े उबाल की ही आवश्यकता थी।
क्रांतिकारियों के मन में बंकिम चंद्र का गीत 'वंदे मातरम्' जोश जगा रहा था। यह गीत क्रांतिकारियों की प्रार्थना बन गया। उन्होंने इस गीत के माध्यम से जन-चेतना को जाग्रत किया। इस गीत की उपादेयता बताने के लिए सिर्फ इतना ही काफी है कि अंग्रेज इसका उद्घोष करने वालों से खौफ़ खाने लगे थे। 'आनंद मठ' उपन्यास में 'वंदे मातरम्' गीत का सर्वप्रथम ज़िक्र था, जिसे बाद में राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार किया गया। इसके एक सम्वाद है - "हम किसी दूसरी माँ को नहीं मानते, हमारी माता, जन्मभूमि ही हमारी जननी है, हमारे न माँ है, न पिता है, न भाई है - कुछ नहीं है, स्त्री भी नहीं, घर भी नहीं, मकान भी नहीं, हमारी अगर कोई है तो वही सुजला, सुफला, मलयज समीरण शीतला है।"
श्रीकृष्ण 'सरल' जी का तो सम्पूर्ण साहित्य मानो राष्ट्रीय उद्घोषणा की ही अभिव्यक्ति है। उन्होंने अपना संपूर्ण साहित्य ही देशप्रेम पर लिखा, मानो राष्ट्रधर्म ही उनके जीवन का आधार है। दादा माखनलाल चतुर्वेदी जी ने मध्य प्रदेश के खण्डवा को अपनी कर्मस्थली के रूप में चुना। इन्हीं के सम्पादन में 'कर्मवीर' नामक पत्र का प्रकाशन भी प्रारंभ हुआ था। अपने लेखों और सम्पादकीय के माध्यम से उन्होंने अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया था। विद्यार्थियों के लिए उन्होंने एक हस्तलिखित वार्षिक पत्रिका 'भारतीय विद्यार्थी' भी निकाली। प्रारंभ में वे अपने लेख 'एक भारतीय आत्मा' के नाम से लिखते थे, क्योंकि उस समय आज की तरह अभिव्यक्ति की भी स्वतन्त्रता नहीं थी। यहाँ तक कि कोई नया समाचार पत्र या पत्रिका शुरू करने के पूर्व अंग्रेज़ मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन-पत्र देना पड़ता था। ऊपर से सरकारी अधिकारियों द्वारा हर स्तर पर प्रत्येक लेखन पर नज़र रखी जाती थी, गोया साहित्य प्रत्येक क्षण 'नज़रबंद' था।
स्वतंत्रता आंदोलन को पुष्ट करने के लिए साहित्य ने महती भूमिका निभाई। भारत के हर प्रांत की प्रत्येक भाषा में लोक-जागरण के लिए विपुल साहित्य रचा गया, जिसने स्वराज की भावना को आंदोलित किया और जन-चेतना का जागरण किया, इनमें रवीन्द्रनाथ की 'गोरा', महात्मा गाँधी की 'हिंद स्वराज', महादेव गोविंद रानाडे की 'राइज़ ऑफ़ द मराठा पॉवर', वीर सावरकर की 'हिन्दुत्व' और '1857 का स्वातंत्र्य समर'', बाल गंगाधर तिलक की 'गीता रहस्य', माधव राव सदाशिव गोलवलकर 'गुरुजी' की 'वी ऑर अवर नेशनहुड डिफाइन्ड', बंकिम चंद्र की 'दुर्गेश नंदिनी', सुभाषचंद्र बोस की 'द इंडियन स्ट्रगल' आदि कुछ उल्लेखनीय पुस्तकें हैं।
हमें मुगलों, अंग्रेज़ों, राजशाही से स्वतंत्रता तो मिल गई और हमने लोकशाही यानी लोकतन्त्र की स्थापना भी कर ली, मगर कई अर्थों में हम अब भी वास्तविक स्वराज से दूर हैं। हमारे अवचेतन में कई स्तरों पर हम अब भी अपने धर्म, अपने राष्ट्र के प्रति गर्व की भावना नहीं रखते। हिन्दुत्व हमें साम्प्रदायिक लगता है, क्योंकि तत्कालीन सरकारों ने तुष्टीकरण के चलते ऐसे विमर्श चलाये, कि लोग प्रायः हीन-भावना से ग्रस्त हुए हैं। हमें साँस्कृतिक, साहित्यिक पुनर्जागरण की सदैव ही आवश्यकता है और यह किसी एक दिन-विशेष का मोहताज नहीं होना चाहिए।
हमारे ग्रंथों में राष्ट्रीय अवधारणा से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण श्लोक -
हिमालयं समारभ्य यावत इंदु सरोवरम्,
तं देवनिर्मितं देशं हिन्दुस्थानं प्रचक्षते।
हिमालय से शुरू होकर हिन्द महासागर तक फैला हुआ यह ईश्वर निर्मित देश है जिसे हिन्दुस्थान कहते हैं।
उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्,
वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र संतति:।
जो समुद्र के उत्तर में है और हिमालय के दक्षिण में है, उस देश का नाम भारत है और उसमें रहने वाले लोग भारतीय हैं।
माता भूमि: पुत्रो अहं पृथिव्या:- महाभारत
ये धरती हमारी माता है और हम इस पृथ्वी के पुत्र है।
उग्रा हि पृश्निमातर:(ऋग्वेद 1/23/10)
देशभक्त (हि) सचमुच (उग्रा:) तेजस्वी होते है।
वयं तुभ्यं बलिहृत: स्याम (अथर्ववेद 12/1/62)
हम सब मातृभूमि के लिए बलिदान देने वाले हों।
यतेमहि स्वराज्ये (ऋग्वेद 5/66/6)
हम स्वराज्य के लिए सदा यत्न करें।
यस्मान्नानयत् परमस्ति भुतम् (अथर्ववेद 10/7/31)
स्वराज्य से बढ़कर और कुछ उत्तम नहीं है।
‘जननी-जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ (रामायण )
जननी (माता) और जन्मभूमि का स्थान स्वर्ग से भी श्रेष्ठ एवं महान है।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः, परधर्मो भयावहः।। गीता अ०3, श्लोक 35
अपने धर्म में तो मरना भी कल्याण कारक है और दूसरे का धर्म भय को देने वाला है।
- दुर्गेश कुमार ‘शाद’
What's Your Reaction?






