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Category: कविता

कह रही है अजन्मी

मां मैं भी इस दुनिया में आना चाहती हूँ नन्हे नन्हे पैरो से मैं भी गिरकर ठोकर खाना चाहती हूँ गिरते गिरते उठकर सम्भलना चाहती हूँ तेरी उंगली पकड़कर चलना चाहती हूं तोतली जबान में कभी तो कभी लाड में माँ मैं भी तुझे माँ कहना चाहती हूँ। क्यों नहीं कर सकती मैं यह सब More

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बेवजह है ये अग्निपथ !!

बेवजह है ये अग्निपथ , सीधे मसान को भेज दो । खतम हो झंझट नौकरी का , जो भी बचा, सबको बेच दो ।। अभी जीवनपथ जिनका शुरू हुआ, अग्निपथ क्यों बना रहे ?? सोचो जरा उन माताओं की, जिनके हाथों  में दे  दिए तिरंगे क्या मुकाबला ओ करेगा , जिसके सर हो बहन की More

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आखिर किराये का घर छोड़ कर !!

आखिर किराये का घर छोड़ कर ,  जाने लगे सब शहर छोड़ कर , अलग रास्ते है, अलग मंजिले है।  आधा अधूरा सफर छोड़ कर ,  जाने लगे सब शहर छोड़ कर।  जब दूर होंगे और पास होंगे , कुछ अपनी कहेंगे कुछ उनकी सुनेगे  कदमो के निशां राहो पर छोड़ कर, जाने लगे सब More

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मानवता

शीर्षक (मानवता) मेरे अल्फ़ाज़ (सचिन कुमार सोनकर) ना मन्दिर में  ना  मस्जिद में ना गिरजाघर में ना ही गुरुद्वारे में, मानवता दिखती है दिल के गलियारे में। रोटी के लिये लाइन में खड़ा हर शख्स ना हिन्दू है ना मुसलमान है, वो तो बस एक भूखा इन्सान है। तुमको दिखते होगे हिन्दू और मुसलमान,  मुझको तो मानव में भी दिखते है भगवान । ईश्वर तक को बाट दिया अब हमारे दिलों में वो नफरत फैलायेगे। एक दिन फिर वही आ के हमको एकता का पाठ पढ़ायेगे। जस्बात पे अपने काबू रखना, तुम्हारे जस्बात को वो अपना हथियार बनायेगे।  इस धरती माँ के सीने पर वो नफ़रत का बीज उगायेगे। हिन्दू मुस्लिम  के नाम पे वो तुमको आपस में ही लड़ायेगे। इस धरती को वो तुम्हारे खून से लहूलुहान बनायेगे। तुम्हारी इसी गलती का वो दूर से लूफ्त उठायेगे। तुम्हारी इसी बेबसी का एक बार फिर वो मजाक बनायेगे। कब तक चीखोंगे More

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भारतीय सेना

शीर्षक (भारतीय सेना) मेरे अल्फ़ाज़ (सचिन कुमार सोनकर) मिटाने से भी  हस्ती हमारी मिटती नहीं,  समुंदर में भी कस्ती हमारी नही रूकती। ना विश्वास हो तो इतिहास उठा कर देख लो। जब-जब हमने हथियार उठाया है एक नया इतिहास बनाया है। अपने वतन की रक्षा हम दिलो जान  से करते है, इसमें जान भी चली जाये तो ग़म नही करते है। हम देश के लिये ही जीते है और देश के लिये ही मरते है। देश भक्ति है कि हमारे दिल से जाती नहीं,  हमको देश भक्ति के सिवा कुछ आती नहीं। जिस मिटटी में जन्म लिया है उसका कर्ज चुकायेगे।  हम भारत के वीर है पीठ नही दिखायेगे। तपती गर्मी में भी खड़े  है देश की रक्षा करने पर अड़े More

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मानवता

शीर्षक (मानवता) मेरे अल्फ़ाज़ (सचिन कुमार सोनकर) ना मन्दिर में  ना  मस्जिद में ना गिरजाघर में ना ही गुरुद्वारे में, मानवता दिखती है दिल के गलियारे में। रोटी के लिये लाइन में खड़ा हर शख्स ना हिन्दू है ना मुसलमान है, वो तो बस एक भूखा इन्सान है। तुमको दिखते होगे हिन्दू और मुसलमान,  मुझको तो मानव में भी दिखते है भगवान । ईश्वर तक को बाट दिया अब हमारे दिलों में वो नफरत फैलायेगे। एक दिन फिर वही आ के हमको एकता का पाठ पढ़ायेगे। जस्बात पे अपने काबू रखना, तुम्हारे जस्बात को वो अपना हथियार बनायेगे।  इस धरती माँ के सीने पर वो नफ़रत का बीज उगायेगे। हिन्दू मुस्लिम  के नाम पे वो तुमको आपस में ही लड़ायेगे।                               More

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अभी बाकी है

शीर्षक (अभी बाकी है।) मेरे अल्फ़ाज़ (सचिन कुमार सोनकर) सांसे रुकने को है,पर कुछ काम अभी बाकी है। यमराज से बोल देना थोड़ा रुक कर आये। क्योंकि दिल में अरमान अभी बाकी है। दो पल और जी लेने दो ऐ ज़िन्दगी  क्योंकि कुछ  काम अभी बाकी है। अभी नही चल सकता मैं साथ तेरे क्योंकि मेरे कद्रदान अभी बाकी है। ऐ ज़िन्दगी कुछ वक़्त और दे- दे मुझे कुछ लोगो के अहसान अभी बाकी है। ज़िन्दगी के कई इम्तिहान अभी बाकी है। ज़िन्दगी More

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मैं ईश्वर से प्यार माँगता हूँ

मैं ईश्वर से प्यार माँगता हूँ, तो वो मुझे तू दे,देते है, एक ऐसा प्यार, जिसमें तुझे छूना जरूरी नहीं, एक ऐसा प्यार, जिसमें साथ रहना जरूरी नहीं, मैं ईश्वर से प्यार… तो वो मुझे तू दे,देते है। एक ऐसा प्यार, जिसमें चीढ़ है खोने का, एक ऐसा प्यार, जिसमें खीज़ है,एक न होने की More

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चौपई छंद “चूहा बिल्ली”

चौपई छंद( बाल कविता)   म्याऊँ म्याऊँ के दे बोल। आँखें करके गोल मटोल।। बिल्ली रानी है बेहाल। चूहे की बन काल कराल।।   घुमा घुमा कर अपनी पूँछ। ऊपर नीचे करके मूँछ।। पंजों से दे दे कर थाप। मूषक लेना चाहे चाप।।   छोड़ सभी बाकी के काज। चूँ चूँ की दे कर आवाज।। More

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पवन छंद श्याम शरण

पवन छंद   श्याम सलोने, हृदय बसत है। दर्श बिना ये, मन तरसत है।। भक्ति नाथ दें, कमल चरण की। शक्ति मुझे दें, अभय शरण की।।   पातक मैं तो, जनम जनम का। मैं नहिं जानूँ, मरम धरम का।। मैं अब आया, विकल हृदय ले। श्याम बिहारी, हर भव भय ले।।   मोहन घूमे, जिन More

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तोटक छंद “विरह”

तोटक छंद सब ओर छटा मनभावन है। अति मौसम आज सुहावन है।। चहुँ ओर नये सब रंग सजे। दृग देख उन्हें सकुचाय लजे।।   सखि आज पिया मन माँहि बसे। सब आतुर होयहु अंग लसे।। कछु सोच उपाय करो सखिया। पिय से किस भी विध हो बतिया।।   मन मोर बड़ा अकुलाय रहा। विरहा अब More

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माँ गंगा

माँ गंगा का अवतरण

शीर्षक (माँ गंगा का अवतरण) मेरे अल्फ़ाज़ (सचिन कुमार सोनकर) गंगोत्री मेरा जन्म हुआ। देवप्रयाग में मैं आयी। देवप्रयाग से होते हुवे ऋषिकेश हो आयी। हरिद्वार को पावन किया। कानपुर में जगह बनाई। प्रयागराज की धरती पर मैं अपनी बहनों से मिल पाई। तब जा के कही मैं संगम कहलायी। काशी की धरती पर हुई मेरी बड़ी बड़ाई । पटना की धरती पर मैंने अपनी अदभुत छठा फैलाई। कोलकाता की धरती पर  मैं गंगासागर में हूँ  समाई। More

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