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Category: कविता

पादाकुलक छंद “राम महिमा”

पादाकुलक छंद “राम महिमा” सीता राम हृदय से बोलें। सरस सुधा जीवन में घोलें।। राम रसायन धारण कर लें। भवसागर के संकट हर लें।। आज समाज विपद में भारी। सुध लें आकर भव भय हारी।। राम दयामय धनु को धारें। भव के सारे दुख को टारें।। चंचल मन माया का भूखा। भजन बिना यह मरु More

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मनमीत

किसी से, दिल लगा। रह गया, मैं ठगा।। हृदय में, खिल गयी। कोंपली, इक नयी।।   मिला जब, मनमीत। जगी है, यह प्रीत।। आ गया, बदलाव। उत्तंग, है चाव।।   मोम से, पिघलते। भाव सब, मचलते।। कुलांचे, भर रहे। अनकही, सब कहे।।   रात भी, चुलबुली। पलक हैं, अधखुली।। प्रणय-तरु, हों हरे। बाँह में, नभ More

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पिता

माँ का प्यार तो तुमको याद रहा। क्या पिता का प्यार तुम भूल गये। एक पिता को समझना आसान नही पिता के जैसा कोई महान नही। पिता तो वो पीपल है जिसकी छाँव में तुम पले बड़े। जिस हाँथ को पकड़ के चलना सीखा उसका स्पर्श तुम कैसे भूल गये। तुम्हारे भविष्य की चिंता दिन More

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जिन्दगी और मौत

मौत तो यूँ ही बदनाम हैं। लोग तो जिन्दगी से परेशान हैं। जिन्दगी हर रोज़ लाती एक नया एग्जाम हैं। जो इसको पास कर जाये वही बलवान हैं। बाक़ी सब तो जिन्दगी से ही परेशान हैं। जिन्दगी मे पल पल पर एक नया मोड़ हैं। आज कुछ और तो कल कुछ और हैं। कोई अपने More

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माँ

माँ की ममता

शीर्षक (माँ की ममता) मेरे अल्फ़ाज़ (सचिन कुमार सोनकर) इस धरती पर जब मै आया गोद मे तेरे ख़ुद को पाया। गर्मी धूप का अहसास ना होता जब मैं तेरे आँचल मे सोता। दुख क्या होता है मैं ना जानो  तेरे सिवा मैं किसी को ना पहचानू। मेरी  रग-२ तू जाने है मेरी हर धङकन तक  तू पहचाने। माँ सदा ही मेरे पास आती है , चूम के माथा मुझे जागती है। प्यार से मुझे गले लगती है , मंजन ब्रश कराती है। नाश्ता मुझे करती है, फिर स्कूल छोड़ने जाती है। वापस स्कूल लेने आती है। प्यार से होम वर्क मुझे करती है। जब भी मैं दुख मे होता, More

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Maa

मेरी मां

दुःख – सुख, हर एक दर्द में खड़ा रहूंगा अपनी मां की मुसीबत का, सामना करूंगा। गर आई मेरी मां पर, एक भी चोट कसम से, उन चोटों से भी लड़ जाऊंगा। शब्दों से बात करते करते कब दिल में बसुंगा पता नही कब मम्मा का रियल बेटा बनूंगा ? अब मैं अपनी मम्मा को More

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महावीर

बन जा महावीर सा

खुद पर विजय तू प्राप्त कर, और बन जा शूरवीर सा, चुन सत्य की राहें सदा, बन के दिखा महावीर सा I खुद जी सके,जीने भी दे, बन शांति का प्रतीक सा I बस कर्म कर,करता ही चल बन ऐसा कर्मवीर सा I मन में दया का भाव हो बन कर्ण दानवीर सा I वाणी More

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नारी – स्वयं सम्पूर्ण

ज्वलंत ज्वाला सुलगे है तुझमें क्यूँ चिंगारियों से घबराती हैं? शक्ति के भंडार से सजी तु तु हि जगत जननी कहलाती है। दिनकर है तु स्वयंम प्रकाशित सी तारों की मांग क्यूँ कर जाती है? कर्म पथ पर चले वीर योद्धा बनकर क्यूँ छोटी उलझनों से डर जाती है? गंगा सी निर्मल अविरल धारा तु More

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मन का आईना

मन का आईना

मन के आईने में जो देखा, बस तू ही तू नज़र आया, मन के आईने में जो देखा, दिल के कोने में, बैठा तू नज़र आया, मेरी साँसों में, खुशबू की तरह, बस तू ही तू छाया, मन के आईने में जो देखा, दिल के कोने में, बैठा तू नज़र आया, रात को जो सोयी, More

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बँटवारा रिश्तों का

बँटवारा रिश्तों का

बँटवारा रिश्तों का अकसर दिल तोड़ जाता है, मासूम बच्चों के कोमल मन को चोट बहुत पहुँचाता है, बड़े तो अपनी जीत पे खुशियाँ मनाते हैं, मुस्कुराते हैं, पर ये मासूम बच्चे खुद को तो बहुत ही तन्हा पाते हैं, अपनी मन की किसी से कह न पाते हैं, बस अकेले बैठ कर सोचा करते More

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ज़िंदगी का मुसाफ़िर

ज़िंदगी का मुसाफ़िर ज़िंदगी के सफर पे था मुसाफ़िर, अन्त में अकेला रह गया। रे मुसाफ़िर तू तो चल रहा था, सफ़र ए ज़िंदगी में ख़ुद की तलाश में। इस संसार में भटकता रहा, अन्त में अकेला रह गया। नए मुसाफ़िर मिले, रिस्ते बने, यार मिले, दिल जुड़े, दिल टूटे। मिलन जुदाई का समा चलता More

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मुझे पसंद है

मुझे पसंद है…! पतझड़ का मौसम…!! मुझे पसंद है…! अकेलापन…!! मुझे पसंद है…! उदासीनता…!! मुझे पसंद है…! तन्हाईयां…!! मुझे पसंद है…! खामोशियां…!! मुझे पसंद है…! रेगिस्तान…!! मुझे पसंद है…! काली घनी रातें…!! क्योंकि मुझे पसंद हो तुम…! क्योंकि मुझे पसंद है तुम्हारा हर सितम…!!    आरती सिरसाट | बुरहानपुर मध्यप्रदेश मौलिक एंव स्वरचित रचना। More

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