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झुलस रहा सत्य देश में

प्रजातंत्र
झुलस रहा सत्य देश में
घुट रही साँसें प्रजातंत्र की
चढ़ती ग्लुकोज मँहगाई की
खा रहा सुई भूख मिटने की
आखिर! मैं जिंदा जो हूँ।
रोजगार की लात की ठोकर
मार रहे प्रजातंत्र के सीने पर
आँसू बहते टूटी पीठ से
डिग रही लाठी प्रजातंत्र की
ठप्प तंत्र पर ठप्पों पर ठप्पें।
सीना तान खड़े लूटेरे चौराहे
सत्ता के झूले लटते अपराध
फिर भी लोकतंत्र मजबूत
आज आदमी मुर्दाघर में बैठा
देता दुहाई लोकतंत्र की पहले।
एक टाँग का प्रजातंत्र
नेताओं की बैशाखी पर
धूल फाँकते दफ्तर फाईल
मर गया जीवन चक्कर लगाते
आखिर! यही लोकतंत्र फायदा!
ज्ञानीचोर
शोधार्थी व कवि साहित्यकार
सीकर राजस्थान

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