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गांधारी का प्रायश्चित!!

गांधारी का प्रायश्चित!!
गांधारी का प्रायश्चित!!
हतभागिन एक विवश होकर,मन विचलित है धीरज खोकर,
बिखरे मृत अंगों बीच खड़ी,थक हार मृत्यु चहुँओर पड़ी,
वह अपनी क्षुधा मिटाने को, फल एक, वृक्ष से पाने को,
निर्बल हाथों को बल देकर,बिखरी लाशों को तल देकर।
इक दूजे के ऊपर रखती, चढ़ने को बना रही तखती,
तरु ऊपर एक  घनेरा है, फल फूलों का जो डेरा है।
कुरु रानी शंका घेर बढ़ी, ले आस शवों के ढेर चढ़ी,
चढ़,तोड़ उतर आई नीचे, दुखघन ने झर अाँसू सींचे।
जब दृग से टूट पड़े मोती, हो गई धूमिल उसकी ज्योति।
वह आतुर थी फल खाने को,जठराग्नि ज्वाला बुझाने को,
पुष्पज को मुँह तक ज्यों लाई, पदचाप सुनी वह घबराई।
देखा सम्मुख, घनश्याम खड़े, हाथों से पुष्पज छूट पड़े।
गोविन्द ने झुक प्रणाम् किया, कह ‘बुआ’ उचित सम्मान दिया,
प्रत्युत्तर नतमस्तक होकर, बोली राज्ञी प्रभु में खोकर,
हे नाथ, अश्रु सूखे मेरे, घिर गये कृष्ण,  काले घेरे,
मन तो निश-दिन ही रोता है,तन क्षुधित विकल अब होता है।
सब किया दमन होकर कठोर,पर पेट अनल को कहाँ ठोर,
इसकी तो अलग कहानी है, मांगे ये भोजन पानी है,
विपदा में इसके भाग जगे, प्रभु, दुख में अतिशय भूख लगे
तन  चाहत को विश्राम नहीं,केशव, मन को आराम नहीं,
विध्वंस हुआ मेरे कारण, मैं दोषी हूँ, हे जग तारण,
पति मोह में पूर्ण समर्पित थी, दृग छिपा पूर्णत: अर्पित थी
मेरे जीवन की महा भूल,  चुभ रहे हृदय में महा शूल,
चैतन्य हीन  ये महा दम्भ, मैं बनी काल का महा जम्भ।
श्रुतिपट में गूँज रहा क्रन्दन, विध्वंस मचा कैसा भगवन।
मिट गया आज कुरु कुल गौरव, निज वंश मिटा मांगा रौरव।
हो गई अंक खाली मेरी, कट गई हरित डाली मेरी।
निज पैरों से रौंधा उपवन, विध्वंस मचा कैसा भगवन,
सब तृष्णा के आगे हारे, निज हाथों से अपने मारे,
पीकर शोणित हर्षित सारे, भाई के भाई हत्यारे,
वैभव पा रोता सिंहासन, विध्वंस मचा कैसा भगवन।
पावन सरि का तट पुर खोता, पदतल मद विजित पड़ा रोता,
मानव तृष्णा के विवश पड़ा, कुरु जनपथ तज सम्मान खड़ा।
है क्षुब्ध व्यथित जिसका कण- कण, विध्वंस मचा कैसा भगवन।
देखो, चहुँओर हताशा है, छाई, चहुँओर निराशा है,
हँसतेे सियार इतराते है, शव चाट, श्वान मुस्काते है
पैंचक सब मालामाल हुए, खग कृष्ण,रक्त पी लाल हुए,
पट गई मही नर लाशों से, टूटी खंडित विश्वासों से।
रणखेत रेत ने रंग बदला, हो गया सुपावन जल गंदला,
पर इसका कारण एक रहा, गांधारी का अविवेक रहा,
जो नृप से हेत नहीं होता, मुझको यह खेद नहीं होता,
मति गई नाथ मेरी मारी, हो गई कलंकित महतारी।
हे केशव आज अभागिन हूँ,शत सुत जाये हत भागिन हूँ,
गांधारी,बिलख पड़ी स्वर भर,ज्यों लूट चला वंचक सब हर,
केशव ने निज कर हाथ लिया,गांधारी को विश्वास दिया,
होनी कोई, टाल नहीं सकता,विधि भी निज अंक नहीं ढकता।
जो होना वह होकर रहता, हो शोकग्रस्त नर क्यों दहता?
जो हुआ उसे स्वीकार करों, जो शेष उसी से प्यार करों,
यह तुम कहते हो मधुसूदन, विश्वास नहीं होता मोहन।
यदि तुम हृदय में धर लेते, सारे पापों को हर लेते।
तो युद्ध कहाँ ये संभव था, ऐसा विध्वंस असंभव था,
केशव ने  झट प्रतिवाद किया, बोले,  कब नहीं संवाद किया?
हर संभव सब प्रयास किया, मदअंधी ने कब साथ दिया।
उसने सबको ठुकराया था, बंदी करने वह आया था।
नृप की इच्छा जब बल खाती, उचितोचित मति मारी जाती,
नृप महत्वकांक्षी था मद भर, कब रोका सुत,आगे बढ़कर?
अपराधिन तुम भी,सनी रही,मिथ्या का सहायक बनी रही,
जन्मांध पति का साथ दिया,हाँ भले,ये तुमने उचित किया
पर माँ के पथ से विलग हुई, कर्तव्य छोड़कर अलग हुई,
माँ ही तो भाग्य विधाता है, माँ गुण कर्मों की दाता है,
माँ माटी में गुण गढ़ती है, माँ कर्म रेख ले चढ़ती है,
स्मृतियाँ आज जगाता हूँ, मैं बीती बात बताता हूँ।
पति मोह में पट्टी बाँधी थी, जब चली नेह की आँधी थी,
गंधार सखी ने चेताया, कर याद,तुझे था समझाया,
ले हाथ कहा था दासी ने, हित तेरा, उस विश्वासी ने,
माँ-भार्या में बहु अंतर है, माना इनमें अभियंतर है।
शत लाख दासियाँ भी मिलकर, कब रह पाती माता बनकर,
हो अंध,भार मत वहन करों, कर्तव्य सभी निर्वहन करो,
तुमने उसका अपमान किया, नृप के वैभव को मान दिया,
है याद तुझे या भूल गई, जब दृष्टि तन को शूल गई।
दृग से पैंबद हटाया जब, दुर्योधन तज पट आया तब,
जहाँ-जहाँ दृष्टि ने वार किया, तन को कर वज्र सँवार दिया,
जो भाग डरा अचकचा रहा, सब वज्र,वही अधपका रहा।
सुत जीवन भर देखा जाता, व्यक्तित्व वज्र सा हो जाता।
न शकुनि की चाले चलती, न कुरु कुल की संध्या ढलती।
पत्नी का धर्म निभाया सब, माँ का कर्तव्य निभाया कब?
हर माँ अंधी हो जाती है, जब सुत हित बारी आती है,
रहती उसकी ये अभिलाषा, बेटे की जीत भरी आशा।
हो रहा पाप वह सह जाती, सुन अनाचार चुप रह जाती,
बेटे को राज मिले फल से, सुख वैभव मिले भले छल से
उसको पर पुत्र सुहाता कब, पर बेल फले फल भाता कब,
सुत गाथा उसे सदा भाती, पर सुत हित गीत मरण गाती।
पर मोह अधिक जब बढ़ जाता, बन काल पुत्र का वह आता ,
ममतापट बुद्धि ढक जाती, दुर्बल हो, काल विवश आती,
कर भीष्म प्रतिज्ञा दूर रहे, निज वचनों से मजबूर रहे,
ये तुम दोनों का दोष रहा, कहने में न संकोच रहा।
जब प्रश्न राष्ट्र का आता है, हर धर्म निभाया जाता है,
हठ छोड़ राष्ट्र अधिमान रहे, वचनों पर न अभिमान रहे,
हठ निजता को हद देता है, मद का अवलम्बन लेता है,
मैं मिथ्या दोष नहीं देता, सत्य का पक्ष सदा लेता।
परराष्ट्र भले ही समधी हो, पर उसपर भी पाबंदी हो,
उसको निज भेद नहीं देते, निज घट का छेद नहीं देते।
वहाँ अपनी भी मर्यादा हो, रिश्ते कम हो या ज्यादा हो,
पर तुमने यहाँ,न ध्यान दिया, भाई को घर में मान दिया।
उसने छल का  व्यवहार किया,छल का छल से प्रतिकार लिया।
जो उचित समय जाना होता, ठग,छलिया पहचाना होता,
ऐसा विध्वंस नहीं होता, होता!  कुरुवंश नहीं खोता।
केशव की बात समझ आई, गांधारी मन में अकुलाई,
खुल गये मति के पट सारे, छा गये दृश्य दृष्टि द्वारे,
भूत्या का मत जाना होता, जो सत्य कहा,माना होता,
आँखों पर आड नहीं होती, निज वंश मिटा, मैं न रोती,
भ्राता के मोह वश सब भूली, मैं नाशशाख पर जा झूली
भ्राता ने भी प्रपंच रचा, जिस कारण ये विध्वंस मचा
नर पापी को पहचान टोक, जो देती उसको बीच रोक,
ऐसा षड़यंत्र नहीं होता, कौरव निज वंश नहीं खोता।
पति अंकशायिनी बन आई, सुत जने, न माता बन पाई,
हर सुत माँ लाड दुलारा था, माँ की आँखों का तारा था,
माँ थी पर माँ, न बन पाई, माँ नाम,कलंकित कर आई,
मर गया विवेक न भान रहा,षड़यंत्र, न  कोई  ध्यान रहा।
माधव अब देर हुई भारी, मर्यादा भूल गई सारी,
इस एक भूल ने पाप किया, कुरु कुल को भीषण शाप दिया,
मैं पापिन हूँ कुल नाशी हूँ, निज वंश रक्त की प्यासी हूँ,
हे केशव, मम उद्धार करो, प्रायश्चित बता,उपकार करो,
हे पार्थसारथी, पाप कटे, हतभागिन का संताप मिटे,
केशव ने कहा, विचार करो, होनी को तुम स्वीकार करो,
जो गया गुजर फिर कब आता? भावी को रक्षित कर जाता,
फिर आँख बंद कर मत जीना, अपराध व्यालविष मत पीना,
निज प्रतिभा का सत्कार करे,निज क्षमता का विस्तार करे।
जो उष्ण दूध से जलता है, वह मठा फूँक कर पीता है,
संयम रख स्वयं विचार करो,बिन परखे, न स्वीकार करो
हर नारी द्वय कुल खेता है, सुता,दारा बहन, जनिता है,
निज उचित कर्म का ध्यान रहे,नारी का जग में मान रहे।
गांधारी नतमस्तक होकर,गिर पड़ी कृष्ण के पगतल पर।
हेमराज सिंह ‘हेम’ कोटा राजस्थान

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