in

गीतिका छंद “चातक पक्षी”

मास सावन की छटा सारी दिशा में छा गयी।

मेघ छाये हैं गगन में यह धरा हर्षित भयी।।

देख मेघों को सभी चातक विहग उल्लास में।

बूँद पाने स्वाति की पक्षी हृदय हैं आस में।।

 

पूर्ण दिन किल्लोल करता संग जोड़े के रहे।

भोर की करता प्रतीक्षा रात भर बिछुड़न सहे।।

‘पी कहाँ’ है ‘पी कहाँ’ की तान में ये बोलता।

जो विरह से हैं व्यथित उनका हृदय सुन डोलता।।

 

नीर बरखा बूँद का सीधा ग्रहण मुख में करे।

धुन बड़ी पक्की विहग की अन्यथा प्यासा मरे।।

एक टक नभ नीड़ से लख धैर्य धारण कर रखे।

खोल के मुख पूर्ण अपना बाट बरखा की लखे।।

 

धैर्य की प्रतिमूर्ति है यह सीख इससे लें सभी।

प्रीत जिससे है लगी छाँड़ै नहीं उसको कभी।।

चातकों सी धार धीरज दुख धरा के हम हरें।

लक्ष्य पाने की प्रतीक्षा पूर्ण निष्ठा से करें।।

************

गीतिका छंद विधान –

गीतिका छंद चार पदों का एक सम-मात्रिक छंद है। प्रति पद 26 मात्राएँ होती है तथा प्रत्येक पद 14-12 अथवा 12-14 मात्राओं की यति के अनुसार होता है। निम्न वर्ण विन्यास पर गीतिका छंद सर्वाधिक मधुर होता है, जो रचनाकारों में एक प्रकार से  रूढ है।

2122  2122  2122  212

चूँकि गीतिका एक मात्रिक छंद है अतः गुरु को आवश्यकतानुसार 2 लघु किया जा सकता है परंतु 3 री, 10 वीं, 17 वीं और 24 वीं मात्रा सदैव लघु होगी। अंत सदैव गुरु वर्ण से होता है। इसे 2 लघु नहीं किया जा सकता। चारों पद समतुकांत या 2-2 पद समतुकांत।

 

बासुदेव अग्रवाल ‘नमन’ ©

तिनसुकिया

What do you think?

Written by Sahitynama

साहित्यनामा मुंबई से प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका है। जिसके साथ देश विदेश से नवोदित एवं स्थापित साहित्यकार जुड़े हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

रुचि छंद “कालिका स्तवन”

जिसने देश का मान बढ़ाया !!

जिसने देश का मान बढ़ाया !!