in

ज़िंदग़ी

कब तलक

मैं तेरी उलझनें

सुलझाता रहूं ऐ ज़िन्दग़ी

कभी मुझे

अपनी सुलझी हुई

शक्ल तो दिखला जा ।

@ कुन्दन श्रीवास्तव

What do you think?

Written by Sahitynama

साहित्यनामा मुंबई से प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका है। जिसके साथ देश विदेश से नवोदित एवं स्थापित साहित्यकार जुड़े हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

पोंगल