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बेड़ियाँ

क्या यह वही बेड़ियाँ हैं, जो किसी मुजरिम को बाँध कर रखती है ? क्या यह वही बेड़ियाँ हैं,जो किसी गुनहगार को कैदखाने में कैद कर के रखती है ? नहीं….. नहीं…..

यह वे बेड़ियाँ नहीं —-यह तो वे बेड़ियाँ हैं,जो किसी लड़की के ख़्वाबों को बाँध कर रखती है |यह वे बेड़ियाँ हैं,जो किसी स्वप्न भरी लड़की को घर में कैद करके रखती है |

एक लड़की अपना स्वप्न न्योछावर कर देती है,अपने परिवार के लिए |उस परिवार के लिए जिसे विवाह-पूर्व वो जानती तक नहीं,नहीं जानती —–सब कैसे हैं ??क्या चाहते हैं ??क्या सोचते हैं ??कुछ भी नहीं शायद…

बस एक ही बात चलती है मन में कि,कहीं गलती से भी कोई गलती न हो जाये,कहीं उसकी किसी हरकत से कोई नाराज़ न हो जाये,कहीं कोई उसकी भूल पे उसके माता-पिता पर ऊँगली ना उठा जाये,कहीं कोई उसकी परवरिश गलत न ठहरा जाये,कहीं.. हाँ शायद, कहीं उसकी पैरों की पायल, बेड़ियाँ न बन जाये |

क्या एक लड़की आज़ाद सी चिड़िया नहीं हो सकती ? क्या एक लड़की निरंतर आकाश में पंख फैलाये नहीं जी सकती ? क्या एक लड़की स्वतंत्र भंवरा नहीं हो सकती ? क्या एक लड़की सुन्दर फूलों के रसपान से बेफिक्र जीवन नहीं जी सकती ? क्या एक लड़की खूबसूरत मछली नही हो सकती ? क्या एक लड़की बेखौफ़ से गहरे पानी में नहीं तैर सकती ????क्या एक लड़की एक स्वतंत्र इंसान नहीं हो सकती ?

क्यों  आखिर क्यों ?

क्यों उसकी आँखों में अपने ही ख़्वाबों के टूटने का अश्क़ है ??क्यों उसके हाथों में अपनी ही ख्वाहिशों की बेड़ियाँ है ??क्यों उसके सिर पर अपनी इच्छाओं का बोझ है ??

ये कैसी जिम्मेदारियां ?

ये कैसी परम्पराएं ?

ये कैसी रिश्तेदारी ?

ये कैसी जकड़न ?

क्यों पैरों की पायलबन जाती है,मजबूरियों की बेड़ियाँ ?

अब इस दुनिया की बेड़ियों से,परिंदो को आज़ाद करो |

अब इस दुनिया की बेड़ियों से,लड़कियों को आज़ाद करो |लड़कियों को आज़ाद करो |

 

स्वरचित कविता ~ रुचि रश्मि

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