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दो जून की रोटी

दो जून की रोटी
दो जून की रोटी
मासूम तरसती आँखों को
दो जून की रोटी
वक्त पर नसीब नहीं।
बालश्रम नियम का सच
बयां करने वाला
जमाने में कोई नकीब नहीं।।
वह मजबूरियों का मारा
दर दर भटकता
बदनसीब गरीब है।
कम उम्र के हिसाब से
 समझाये उसे
 क्या अच्छा-क्या बुरा
 न कोई हबीब है।
वक्त के हालात से मोड़ें
ऐसा कोई कबीर नहीं।
मासूम तरसती आँखों को,
दो जून की रोटी
वक्त पर नसीब नहीं।…..
बालश्रम पर चर्चा
 रोज हम करते है।
दशा उनकी देख
झूठी ही आहें भरतें है।
सोचों कभी अपनों से भी
ऐसा करवाते है।
होटल वर्कसोप में देख उन्हें
नयन हमारे भर आते है।
ज़माने के इस दौर में
उनके जैसा कोई यतीम नहीं।
मासूम तरसती आँखों को,
दो जून की रोटी
वक्त पर नसीब नहीं।……
बालपन में औरों की भांति,
वह पढ़ क्यों नहीं पाया।
निज स्वार्थ किस मजबूरी में,
अपनों ने काम पर उसे लगाया।
अमीरी-गरीबी की मध्यस्थता का
उस जैसा कोई रकीब नहीं।
मासूम तरसती आँखों को,
दो जून की रोटी
वक्त पर नसीब नहीं।…..
ये बातें कड़वी-फीकी है,
इन पर शिकवा क्या कीजिए।
जीवन एक समझौता है,
ताउम्र बस घूँट – घूँट पीजिए।
शासकीय विधान से सोचे
ऐसा कोई सबील,
भविष्य हो अच्छा इनका
आओं बन जायें कलीम।
सुनहरे राष्ट्र के सपनों में भी
मिलता आहार लतीफ़ नहीं।
मासूम तरसती आँखों को,
दो जून की रोटी
वक्त पर नसीब नहीं।…..
-महेन्द्र सिंह कटारिया ‘विजेता’
सीकर, राजस्थान.

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