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अवधू मेरा मन मतवाला

अवधू मेरा मन मतवाला
अवधू मेरा मन मतवाला

 लाखों वर्ष पहले का आलौकिक दृश्य । आश्रम,तप करते हुए ऋषि,सघन तरूच्छाया,कोमल पत्तियों के भार से झुकी शाखाएं,हवन के धुंए से सुगंधित हवाओं के झोंके,ऋग्वेद के पवित्र श्लोकों से ध्वनित होती पृथ्वी । आज का दिन कुछ अलग है,आश्रम में आखिरी दिन।ध्यान में झुके झुके अधखुले नेत्र।विस्तार का अनंत शब्द सागर।अचानक कहीं से आवाज़ आई,   

 मातृ देवो भव

उसके साथ ही मानस कि तंद्रा टूट गई। ओह तो वह अधखुली आंखों से सपना देख रहा था।

अपनी अपनी बेल्ट बांध लीजिए।अब हम छत्रपति शिवाजी इटरनेशनल एयरपोर्ट पर पहुंचने वाले हैं।‘ 

मानस की बंद आंखों से दो आंसू ढुलक कर उसके अरमानी के सूट को भिगो गए।अचानक आश्रम,तप करते ऋषि,हवन कुंड सब विलीन हो गए। बस गुंजित रह गई एक ध्वनि

मातृ देवो भव‘ 

वह भी तो मां से मिलने जा रहा है,उस मां से,जिसे आज तक देखा भी नहीं है।उसे तो पता भी नहीं था कि जिसने उसे जन्म दिया ,वह तो हिंदुस्तान के किसी कोने में रहती है।वह तो आज तक नैन्सी को ही अपनी मां समझता था।

 लंदन के अरबपति बिज़नेस मैन हिमांशु मेहता का इकलौता बेटा, मानस। टेम्स नदी के किनारे हजारों एकड़ में बना हुआ फार्म हाउस।ऊंचे ऊंचे वृक्षों से घिरा हुआ,बीच में बड़ा सा तालाब,रंग बिरंगे कमल के फूलों से घिरी शिव पार्वती की आदम कद मूर्ति। रात होते ही जैसे पूरा फार्म हाउस जैसे झिलमिलाने लगता।रंग बिरंगे प्रकाश के इन्द्रधनुष पानी में खेलने लगते।शिव की जटाओं से निकलती जलधारा तालाब को भरने लगती।यह सारा ऐश्र्वर्य हिमांशु की मेहनत से बनाया हुआ है।मानस को आदत है इस ऐश्र्वर्य में रहने की।

 पिछले कुछ दिनों से मानस देख रहा था पिता को,ना जाने बैठे बैठे अचानक कहां खो जाते थे।कुछ दिनों से उनकी तबियत भी खराब रहने लगी थी।एक दिन मानस ने हिम्मत करके पूछ ही लिया था,

डैडी कुछ मन में हो तो मुझे बताओ।कोई चिंता है क्या?’

उसे जवाब देने की जगह हिमांशु कहीं दूर खो गए थे।शायद जीवन संध्या के झुटपुटे में,बहुत सी पीछे छूट गईं स्मृतियां पास आकर खड़ी हो गईं थीं, जिन्हें जीवन की पगडंडियों पर चलते हुए वह कभी का अनदेखा करके गुजर चुके थे।पिता की मृत्यु के पश्चात,पिता का पत्र ,मानस के हाथ में था। और पत्र के अंदर थी एक बेहद खूबसूरत युवती की तस्वीर। पत्र में लिखा था,

  ‘मुझे माफ़ करना मानस,मेरा अंतिम समय निकट है।चाहता तो तुम्हें कभी नहीं बताता और मेरी मृत्यु के साथ ही ये राज़ हमेशा के लिए मेरे साथ भस्म हो जाता। परंतु अपनी आत्मा पर ये बोझ लेकर मैं अनंत पथ पर नहीं जाना चाहता,इसलिए तुम्हें बता रहा हूं,नेंसी तुम्हारी मां नहीं है।तुम्हारी मां का नाम है कल्याणी।जो मुंबई के एक छोटे से फ्लैट में,मेरी मां के साथ रहती है। मां अब हैं या नहीं पता नहीं।कल्याणी भी है या नहीं पता नहीं। पच्चीस साल पुराना पता , पत्र में लिख रहा हूं। ढूंढ सको तो अपनी मां को ढूंढ लेना।लंदन नौकरी करने आया था।सोचा था,कुछ कमा कर तुम्हें और कल्याणी को अपने साथ लंदन ले जाऊंगा पर ना जाने कब नेंसी से प्यार हुआ,कब यहां की चमक धमक से मोहांध हुआ कब यहां की नागरिकत्व प्राप्त करने के लिए नैंसी से विवाह कर लिया,पता ही नहीं चला…।

यहां तक तो ठीक था, पर उसके बाद मैं मुंबई गया।

  कल्याणी को भनक भी नहीं लगने दी कि मैंने दूसरा ब्याह रचा लिया है और फिर तुम्हारे सुनहरे भविष्य की खातिर रातों रात तुम्हें लेकर लंदन भाग आया।उस समय तुम दो साल के थे।फिर मैंने आज तक कभी हिन्दुस्तान का रुख नहीं किया।नैंसी ने भी तुम्हें कभी मां की कमी महसूस नहीं होने दी।उसने तुम्हें इतना प्यार दिया कि कभी तुम्हें पता नहीं लगने दिया कि तुम उसके बेटे नहीं हो।मुझ से पहले वह चली गई,यदि में गया होता तो वह तुम्हें कभी नहीं बताती कि तुम उसके बेटे नहीं हो।इतना बड़ा साम्राज्य तुम्हें सौंपकर जा रहा हूं।वहां मुंबई में तुम्हारी मां ना जाने किस हाल में होगी।हो सके तो उसे ढूंढ लेना,और वह सुख देना जो मैं उसे नहीं दे पाया। मैं तुम्हारा गुनाहगार हूं बेटे,मुझे माफ़ कर देना।

 पत्र के टुकड़े टुकड़े करके फेंक दिए मानस ने।पिता से उसे घृणा हो आई।जिस मां को आज तक देखा नहीं,उसके लिए एक अव्यक्त सी कसक उठी मन में। मां को कौन सा सुख देने की बात कर रहे थे हिमांशु मेहता।सारी जवानी जिसने बिना पति के बिता दी,वह सुख? या पता नहीं किस किस अभाव में दिन बिताए,वह सुखलोगों के कैसे कैसे ताने उलाहने सुने होंगे?कौन से सुख की बात कर रहे थे ?काश जिंदा होते तो वह उन्हें बताता कि किसी औरत को दगा देने का,किसी मां से उसका बच्चा छिन लेने का क्या दंड मिलता है ।अब तो बस एक ही इच्छा है, मां उसे मिल जाए।ना जाने किस हाल में होगी। कहां होगी।कितनी सुंदर लग रही है फोटो में।मानस की पलकें भीग उठी।

  बांद्रा स्टेशन के पास झोपड़पट्टी से भी बदतर सड़ांध मारता छोटा सा फ्लैट।बहुत देर तक खटखटाने के बाद दरवाजा खुलता है।एक झुकी देह सिर निकल कर पूछती है,

किसको मांगता

मानस का सिर चकरा गया।यह कौन सी भाषा है।और जो भी हो,ये झुकी देह उसकी मां नहीं हो सकती।

किसको मांगता

जी कल्याणी यहीं रहती हैं

कल्याणी,कौन कल्याणी?रुको मैं कांबले को बुलाकर लाता।

फटाक से झुकी देह ने दरवाजा बंद किया। पांच मिनट,दस मिनट।प्रतीक्षा रत मन उस वातावरण में घुटन महसूस करने लगा।थोड़ी देर बाद पान की पीक से सडे   हुए दांत निपोरता कांबले आया,

क्या चाहिए साहब

 ‘ कल्याणी ,यहीं रहती हैं ?’

रहती था। बोत साल पहले हमको ये फ्लैट बेच कर ,अपने बेटे के साथ मथुरा रहने चला गया। बोत अच्छा बाई।अपनी सास के साथ रहता।बुढ़िया की खूब सेवा किया।मर्द छोड़कर भाग गया।तब पेट में बच्चा था बिचारी के।जब तक सास ज़िंदा रहा,यहीं रहा। लोगों के बर्तन भाड़े मांजकर बेटे को पढ़ाया लिखाया।चरित्र का बोत पक्का बाई।पढ़ लिख कर बेटा कमाने लगा तो मुंबई छोड़कर दोनों मथुरा चले गए । मथुरा में दोनों गोविंद धाम वाली गली में रहता। हमको वहां से पता लिख कर भेजा कि कभी उसका मर्द बेटे को लेकर आए तो।

 मानस का माथा फटने लगा।उसे इस वक्त सिर्फ एकांत चाहिए था,ऐसा एकांत जहां उसकी मन की टहनियों पर बिखरी कड़वाहट कोई ओस बूंद तलाश सके।

चाय पिएगा साहब ‘?

मानस ने देखा,झुकी देह टूटे हुए प्याले को चाय से भरकर , चाय से भरी हुई प्लेट में लेकर खड़ी है। 

मानस की उंगली में पहनी हुई पचास लाख की रत्न जड़ित अंगूठी,कलाई में बंधी बीस लाख की घड़ी,अरमानी का सूट,सब उस काली मक्खी भिनकती चाय के सामने फीके पड़ गए।

नो थैंक्स, मैं चाय नहीं पीता

तो फिर निम्बू पानी ?’

नहीं,कुछ भी नहीं,पर क्या मैं आपका घर देख सकता हूं ?’

हां हां, अवश्य आइए साहब

विनम्रता से दोहरा होता हुआ कांबले उसे फ्लैट के अंदर ले गया।मछली की गंध से उसे उल्टी होने को हो आईं।जगह जगह से उखड़ा हुआ चूना, सीलन की दम घोंटू बदबू ।मानस से एक पल भी खड़ा नहीं रहा गया।

इस घर में उसकी मां रहती थी।उसकी आंखों के सामने टेम्स नदी के किनारे बसे घर की नियोन बत्तियां जगमगा उठी।बाहर निकला तो दरिद्रता की प्रति मूर्ति झुकी देह और भी झुककर हाथ जोड़े खड़ी थी।मानस ने बुढिया कि पीठ पर हल्के से हाथ फेरा और पर्स में से हजार पाउंड निकाल कर बुढ़िया के हाथ में रख दिए।आखिर कांबले की मां उस घर में रहती है,जहां कभी मानस की मां रहती थी।

   मथुरा में गोविंद धाम वाली गली ढूंढते ढूंढते मानस पसीने पसीने हो उठा।कल्याणी के घर का पता पूछते पूछते जिस घर के सामने पहुंचा,वहां से एक अर्थी निकल रही थी।चार कंधों में से ,सबसे आगे जिसका कंधा था वह ज़रूर मानस का छोटा भाई ही होगा,उसे पहचानने में मानस को एक पल का भी समय नहीं लगा।बिल्कुल उसके जैसा। पूछने पर पता लगा,जिसकी अर्थी निकल रही है,वह और कोई नहीं कल्याणी है।सिर थाम कर मानस वहीं पेड़ के नीचे बैठ गया।नियति ये उसके साथ कैसे कैसे खेल खेल रही है।

थके हुए कदमों से वह भी भीड़ में शामिल हो गया।जब कंधा बदला जा रहा था,तब एक बार उसने भी अपनी मृत मां को कंधा दे दिया।इतनी देर से रुके हुए आंसू अविरत गति से बहने लगे।जिस मां से मिलने वह लंदन से यहां चला आया,उनसे मिला भी तो कैसे? जिसे सुख देना चाहता था ,उसने वह सुख लेने से भी इंकार कर दिया।एक क्षण में उसे जीवन से वैराग्य हो गया।

मथुरा की उस छोटी सी,साफ सुथरी कोठरी के सामने मानस को अपना लंदन का वैभव फीका लगने लगा।उसके सामने बैठा था उसका छोटा भाई तीर्थ।कितना सुंदर नाम रखा मां ने उसका ,तीर्थ।सचमुच मां के लिए तो वह उसका तीर्थ ही था,मानस तो कहीं खो गया था।

अंतिम समय तक मां तुम्हें और अपने पति की आशा मन  में लिए जीवित रहीं

पति? वह तुम्हारे पिता भी थे

नहीं,वह तुम्हारे पिता थे। तुम्हें मां और पिता दोनों का भरपूर प्यार मिला।और यहां हम दोनों तरसते रहे । मां पति के लिए, मैं पिता के लिए।

खैर छोड़ो ये सब। खाना खा लो।

दाल,सब्जी,रोटी

लंदन का दस कुर्सियों वाला डाइनिंग टेबल ।कुक को आदेश देती हुई मां

मनु के लिए रोस्टेड बादाम लाओ और साथ में हॉट केक भी।और दूध में नट्स क्यों नहीं डाले?’

लंदन के उस घर के लंच,डिनर के शोर शराबे के बीच ये घर कितना सात्विक,कितना खामोश लग रहा है।एक अनकही सी शांति है यहां।

अरे,आपने तो कुछ खाया ही नहीं?’

बस,अब कुछ नहीं

मानस खिड़की के पास से जाती हुई धूप में ना जाने क्या तलाश रहा था

आप आराम कर लें

 खाना खाने के बाद, मैं आराम नहीं करता

थका हारा तीर्थ सो चुका था।वह बड़ी देर तक कमरे में घूमता रहा।

 घर के सामने लगे शिवली के फूलों की सुगंध, मृत देह की गंध के साथ मिलकर एक अजीब बैचेनी पैदा कर रही है। सुबह मां के अस्थि विसर्जन के पश्चात तीर्थ से बात करनी होगी।

सुबह होते ही घर घर से घंटी और शंख कि ध्वनि सुनाई देने लगी। चारों तरफ से बस एक ही नाद – राधे गोविन्द ,राधे गोविन्द ।यमुना के किनारे खड़ा हुआ मानस। सर्दियां बीत गईं,युग बीत गए, हज़ारों वर्ष बीत गए।कौन है ये? एक दिव्य सामिप्य  की प्रतीति।अनवरत प्रवाह।अक्षत, फूल,कुमकुम रखकर पत्ते के दोनों में दिया रखकर यमुना में बहाया जा रहा है। दोने में बहने वाली ये अर्चना,जल के प्रवाह पर तैरती हुई कितनी दूर तक जाएगी,किसे पता। घाट पर पुरोहित तीर्थ से अस्थि विसर्जन करवा रहा है।जीवन की अस्थियों के सुमन एक महा प्रवाह में डूब जाने को बैचैन हैं।

तीर्थ

जी

मैं चाहता हूं,तुम मेरे साथ लंदन चलो

एक तार टूट कर छन्न से तीर्थ की आंखों से गिरा।

 जब वक्त था तब कोई नहीं आया।आप भी नहीं,वैसे मैं आपको तो दोष देता भी नहीं,आप तो जानते ही कहां थे।क्षण क्षण ,पल पल सारी रात मां करवटें   बदलते हुए बिता देती थी।उसके दुख को बहुत करीब से मैंने देखा है।यहां तक कि जब मुंबई से मथुरा आए तो ना जाने किस आशा में कांबले को यहां का पता लिख कर भेजा।तड़पती रही तुम्हारे लिए।मेरे लिए तो ये कोठरी ही लंदन है और मां के साथ बिताए पल मेरा ऐश्वर्य।आपने मुझे चलने के लिए कहा ,आपकी कृपा।पर वह जगह आपके लिए है।मेरे लिए नहीं।फिर सोचिए कितने भाग्यशाली होते हैं वह लोग जो मथुरा में रहते हैं।उनका सौभाग्य,उनके मित्र हैं पूर्ण ब्रह्म,साक्षात भगवान।एक वाक्य,बल्कि कभी कभी एक शब्द ही काफी होता है,इन्सान के जीवन को बदलने के लिए।तीर्थ के कहे उस एक वाक्य ने मानस का पूरा जीवन ही बदल दिया।लंदन का वैभव , ऐश्वर्य सब उस मित्र के सामने फीके पड़ गए।जिस ऐश्वर्य को एकत्र करने में हिमांशु को सालों लगे थे,उसे पल के सौवें भाग में,उनके पुत्र ने मिट्टी में मिला दिया।और चल पड़ा ,वहां जहां स्व को जानने का मार्ग मिलता है।

भोर का डूबता हुआ,खिली हुई रातरानी,झरती हुई चांदनी,महकते हुए फूलों की खुशबू,उदय होता हुआ सूरज,उसकी कुछ कुछ। संदेश देती हुई अरूनाभ लालिमा, संन्यासियों के समवेत स्वर हरे रामा हरे कृष्णा के महामंत्र से गुंजीत होता हुआ वृंदावन का इस्कोन मंदिर का प्रांगण।और मंदिर के भीतरी प्रकोष्ठ में शंख की मधुर ध्वनि से अपने मित्र को जगाता हुआ स्वामी देव रूप दास।

किसने सोचा था,एक दिन लंदन का धनाढ्य मानस,स्वामी देव रूप दास बन जाएगा।रात दिन पैसों, वैभव में जीने वाला आज दूसरे ही नशे में डूबा है

अवधू मेरा मन मतवाला

उन्मुनी चढ़ा,गगन रस पिवे

त्रिभुवन भया उजियारा।

मन की गलियों में जब वह सूरज उग जाता है,कभी नहीं होता।

मानस के जीवन का भी ये अंत नहीं शुरुआत है।

निशा चंद्रा

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