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अन्तर्द्वन्द्व

छोटा भाई आया हुआ था विदेश से। उसके परिवार की सोच, समझ, सलीका….

वे इस बात से बहुत प्रभावित थे कि विदेश में अलग-थलग रहते भी छोटे भाई ने बच्चों को भारतीय संस्कारों से जोड़े रखने का प्रयास किया था, मन ही मन शर्मिन्दा भी हुए कि उनके बच्चों को कुछ नहीं आता, न अपने तीज- त्योहार, न कल्चर , न अदब -लिहाज़, पूछो तो मुँह में ज़बान नहीं होती…भट्टा सी आँखें खोले देखते रहेंगे या फिर इंगलिश में उल्टे- सीधे जवाब …

अब अपनी खीज पत्नी पर निकाल रहे थे- तूने कुछ भी नहीं सिखाया उन्हें ….न घर के न घाट के….बेशऊरी के छत्ते में उल्टे लटके…पूरे अंग्रेज़ बने हुए हैं।

पत्नी ने दबी ज़बान से प्रतिकार किया-

-आपने इन्हें अंग्रेज़ी स्कूलों में पढ़ाया है तो कैसे कुछ आयेगा, वहाँ कहाँ कुछ सिखाते हैं और आपने ही तो नहीं मनाने दिये अपने तीज- त्योहार। तब दकियानूसी लगता था ये सब कुछ। टाइम का वेस्टेज।

फिर भी उन्होंने बात को समझने की कोई कोशिश नहीं की और पत्नी की ओर आँखें तरेरते रहे।

शाम हुई, पत्नी ने पूजा पारम्परिक ढंग से सजाई। पूजा पर सब जुड़ कर बैठे। टोह सी लेते वे भाई की बेटी से बात करने लगे।

-डू यू नो फ़ैस्टिवल्स जान्हवी ?

-यस ताऊ जी, दीवाली का फ़ैस्टिवल है….गॉडेस लक्ष्मी की पूजा करेंगे, टीका लगायेंगे, आरती गायेंगे…मिठाई खायेंगे और पठाखे चलायेंगे।

अंग्रेज़ी उच्चारण में बोली गई हिन्दी मीठी लगी ।

-अरे ,किसने बताया तुम्हें…..?
-पापा ने…पापा सब बताते हैं इंडियन कल्चर को, सब फैस्टिवल में मम्मा- पापा और हम पूजा करते हैं, मिठाई लाते हैं…पापा सब सिखाते हैं ,साईकिल चलाना, तैरना , पढ़ाना…क्राफ्ट ..वीक एंड पर घूमने जाते हैं ,आऊटिंग करते हैं। पापा……..

माँ ने पूजा का दिया जला दिया । सब बच्चों ने हाथ जोड़ कर आँखें मूँद लीं। भाई और भाभी ने भी।

वे नज़रें झुकाये लक्ष्मी जी और उनके समक्ष जलते दिये को निहारते रहे…उन्होंने कब बच्चों के साथ मिल बैठ कर कुछ सिखाया या समय बिताने का सोचा । घर-गृहस्थी के काम उन्हें छोटे और बेकार से लगते। उनके मिजाज़ कभी भी नहीं मिलते थे, गुस्सा हरदम नाक पर ही रखा रहता। बच्चे उनके उग्र और रुखे स्वभाव से सहम जाते थे। उनके घर में रहने पर वे दूर-दूर कोनों में गुम हो जाते……. पर अब ……अफ़सोस सा क्यों लग रहा था वे समझ नहीं पा रहे थे। अंग्रेज़ियत के गुण छोटे क्यों लग रहे थे ?
पत्नी को देखा, वह उनकी मनःस्थिति को समझ कर सहानुभूति भरी आँखों से उन्हें ही देख रही थी।

विधिवत पूजा सम्पन्न करके उन्होंने पलकें मूँद कर मीठे स्वर में आरती शुरु कर दी। समवेत स्वरों की गूँज में अपनी ग्लानि भुलाने के लिए हाथ जोड़ कर आँखें बंद कर लीं और स्वयं को समझने का प्रयास करने लगे।

-आभा सिंह

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Written by Sahitynama

साहित्यनामा मुंबई से प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका है। जिसके साथ देश विदेश से नवोदित एवं स्थापित साहित्यकार जुड़े हैं।

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