बहू
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बहू

दिन के चार बज रहे थे। परिवार की बहू सबको लंच खिलाकर अभी अभी खाना खाने बैठी थी। एक दो निवाला ही मुंह में डाला था कि किसी ने बाहर का गेट बजाया।
कोरोना काल में वह तीन रुम का मकान पूरी तरह भर गया था। सास ससुर तो पहले से साथ में रहते ही थे , होली में आये बहू के मां बाप भी लाक आउट और वृद्धावस्था की मजबूरी से वही रूके हुए थे। कुल आठ आदमियों का संयुक्त परिवार जिनमें चार वृद्ध और दो बच्चे। दोनों घरेलू सहायिकायें फोर्सड लीव पर। पतिदेव सुबह नौ बजे से शाम सात बजे तक लैपटॉप पर कान से फोन सटाये बैठे रहते। चाय नाश्ता खाना सब आफिस का काम करते हुए वहीं टेबल पर। लेकिन उनकी एक आंख और एक कान पत्नी की ओर ही लगे रहते।
बहू बड़े सबेरे से उठकर सभी के लिए चाय नाश्ता, खाने पीने का इंतजाम करते हुए चकरघिन्नी की तरह नाचती रहती। खुद सिर्फ दो बिस्कुट खाकर चाय पी लेती। कहती अधिक खाने से फिर काम नहीं होता। ऐसा नहीं था की सास और उसकी मां उसकी मदद नहीं करना चाहती , लेकिन उम्र‌ की भी एक लाचारी और सीमा होती है।
ससुर ने दरवाजा खोला तो देखा दो बच्चे भूख-प्यास से व्याकुल गेट पर खड़े हैं।
‘ सुबह से कुछ नहीं खाया , कुछ खाने को दे दो साहब।’
उनकी कातर आवाज बहू का कलेजा चीरती हुई अन्दर तक चली गई। उसका मन किया अपनी ही थाली का खाना उन बच्चों को दे दे क्योंकि किचन में खाना लगभग समाप्त हो गया था। फिर ख्याल आया जूठा खाना नहीं देना चाहिए । फिर बहू ने अपना खाना ढका और हाथ धोकर किचन में चली गई। तभी पतिदेव ने पीछे से आकर उसे चौंका दिया।
‘ तुम जाकर खाना खाओ, मैं बच्चों को खिचड़ी बनाकर दे देता हूं।’ पतिदेव ने बड़े प्यार से पत्नी को देखते हुए कहा।
बहू निहाल हो गई। पति की इतनी सी उदारता और सहृदयता से उसका रोम रोम पुलकित हो गया और वह दिन भर की थकान भूल गई ।

-जनकजा कान्त ‌शरण 

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Written by Sahitynama

साहित्यनामा मुंबई से प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका है। जिसके साथ देश विदेश से नवोदित एवं स्थापित साहित्यकार जुड़े हैं।

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