मैं अपनी फेवरेट हूँ
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मैं अपनी फेवरेट हूँ

`मैं अपनी फेवरेट हूँ’.. अपने बारह वर्षीय पोते राहुल से यह पूछने पर कि `दादी लाइफ में आपकी फेवरेट कौन है?’ तो पैंसठ वर्षीया रमा जी ने बिल्कुल करीना कपूर वाले स्टाइल में इस तरह जवाब दिया। उसके बाद राहुल और रमा जी की हंसी की आवाज़ पूरे घर में गूंज उठी।
अवनि ऑफिस से अभी थोड़ी देर पहले लौटी थी।
दादी और पोते के इस वार्तालाप से मंत्रमुग्ध हो मुस्कुरा उठी।
सुंदर पोटली बैग पर मोतियों की कढ़ाई करती सासु माँ
के हाथों से बैग लेकर अवनि ने सेंटर टेबल पर रख दिया और प्यार से उनके हाथों को अपने हाथों में ले आदर से सर झुका चूम लिया।
कढ़ाई करने के दौरान कई बार सुइयों की रगड़ और चुभन से रमा जी की उंगलियां थोड़ी रूखी जरूर हो गई थी, पर इस चुभन ने फूल सा अहसास दिला चेहरे को आत्मविश्वास भर दिया था। उन शब्दों के शूल से परे जो ससुर जी भेदा करते थे। विगत दिनों के दृश्य अवनि की आंखों के सामने से घूम गए।
`अक्ल घास चरने गई है’! …`तुम्हे आता ही क्या है’!… `गंवार की गंवार ही रहोगी’!…. ऐसे अदृश्य बाण जिसके कोई निशान नहीं दिखाई देते, पर कहीं गहराई तक ज़ख्म दे जाते हैं… जिसे भेद ससुर जी सासु माँ की हर निपुणता में कमी निकाल उनके चेहरे की कांति धूमिल कर अपने मुख की कांति बढ़ाना पुरुषोचित अधिकार समझते थे।
माँ के प्रति पिताजी का यह कटु व्यवहार देख अवनि विचलित हो जाया करती, पर संस्कारवश उनसे कुछ बोल नहीं पाती थी। अकेले में सासु माँ की नम आंखों को देख उसकी आंखें भी नम हो जाती।

कम पढ़ी लिखी पर सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, चित्रकारी, में सासु माँ इतनी निपुण हैं.. उसे ये तब पता चला जब, स्टोर रूम में कुछ सामान ढूंढते वक्त, बंद बक्से में उनके सुघड़ हाथों से बनाए हुए सुंदर पर्दे, कुशन कवर, चादर, और सुंदर-सुंदर मधुबनी पेंटिंग देख अवनि दंग रह गई …पर जल्दी ही उसे ये एहसास हो गया था कि ससुर जी ने इसे कहीं भी सजाने की अनुमति नहीं दी थी, क्योंकि यह उनकी नजर में किसी गंवार की बनाई आउटडेटेड चीज़ें थी।
सासु माँ के लाख मना करने और यह कहने के बाद भी इसे सजाया हुआ देख `ये’ नाराज हो जाएंगे…पर सारी बातों को अनसुना कर अवनि ने कहा… इसे मैं ड्राइंग रूम में नहीं, अपने कमरे में सजा रही हूं माँ !, मेरे कमरे को तो मैं अपनी मर्जी से सजा सकती हूं। इतनी सुंदर कलात्मकता बक्से में बंद होने के लिए नहीं होती। देखते ही देखते अवनि के कमरे का एक एक कोना रमा जी की कलात्मकता व प्रवीणता की गवाही दे रहा था।
हमेशा से उपेक्षित व तिरस्कृत रहे अपने गुणों का इतना सम्मान पाकर रमा जी, अवनि के गले लग फफक कर रो पड़ी।
उसी दिन अंजलि ने उन्हें बाहों में भर ठान लिया
इस बक्से के अंदर बंद कर दी गई काबिलियत को,
जिसे अपने ही घर में स्थान नहीं दिया गया, उसे वह ऐसा ब्रांड बना देगी, जिसकी खूबसूरती को घर-घर में स्थान देने की ललक हर घर में हो।
शुरू शुरू में ससुरजी ने विरोध किया पर, अपनी
पढ़ी लिखी दृढ़ निश्चयी बहु के आगे और बेटे अमन को भी सहयोग करता देख उनकी एक न चली।
हमेशा डरी डरी रहने वाली रमाजी को
बहु से मिलने वाली स्नेह छाया और आत्मसम्मान से जीने की ललक ने उनके हौसलों में उड़ान भर दी।
अंजलि और रमा जी के अथक परिश्रम, उनका खुद पर दृढ़ विश्वास और वक्त की रगड़ ने ससुर जी के अंहकार को नतमस्तक कर दिया था।
आज सासु माँ के हाथों से बनाए सुंदर सुंदर पेंटिंग, पर्दे और कुशन कवर ही ड्राइंग रूम की शोभा नहीं थे, बल्कि उन्हें मिलने वाले कई सम्मान और प्रशस्ति पत्र भी इस
ड्राइंग रूम की शोभा में चार चांद लगा रहे थे।
जिसे अब सबको दिखाकर ससुर जी बहुत गौरवान्वित महसूस करते थे। अकेले में उनके चेहरे पर अपने किए का पश्चाताप साफ झलकता था।
आज इस ब्रांड `बक्से का हुनर’ के नीचे कई कारीगर रोजगार पा रहे थे।
जब अमन ने ऑफिस से आकर चहकते हुए माँ को अचानक पीछे से आकर अपनी बाहों से घेर लिया, तब अवनि की तंद्रा टूटी।
तब तक ससुर जी भी आ गए। बेटे को इतना खुश देख उन्होंने पूछा…क्या हुआ अमन?
पापा, माँ को अपनी कलाकृतियों को पुनर्जीवित रखने और स्वरोजगार का अवसर प्रदान कराने के लिए राज्यपाल की तरफ से पुरस्कृत किया जा रहा है। अमन ने बड़े उल्लास से बोलते हुए पेपर पिता की तरफ़ बढ़ाया।
ससुर जी खुशी से अभिभूत हो गए।
रमा जी ने कहा..`अरे! मैं क्या करूंगी पुरस्कार लेकर, मुझे तो अपने काम में ही सुकून मिलता है, बस! यही मेरे लिए बहुत है।’
आज घर में सब एक साथ खिलखिला उठे जब दादी की बात सुनकर पोते राहुल ने शाहरुख खान वाले स्टाइल में जवाब दिया…अभी तो शुरुआत है!! `पिक्चर तो अभी बाकी है मेरे दोस्त’….

-कंचन मिश्रा 

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Written by Sahitynama

साहित्यनामा मुंबई से प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका है। जिसके साथ देश विदेश से नवोदित एवं स्थापित साहित्यकार जुड़े हैं।

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