जूनियर आर्टिस्ट
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जूनियर आर्टिस्ट

शिवम से मेरी मुलाकात मुंबई के मेहबूब स्टूडियो में हुई थी जहाँ वह किसी फिल्म की शूटिंग के लिए आया हुआ था। मैं वहाँ एक चर्चित कैमरामैन के इन्टरव्यू के सिलसिले में गया था, जिन्होंने मुझे पहले ही बता दिया था कि मुझे यह इन्टरव्यू एक शॉट से दूसरे शॉट के बीच मिलने वाले समय में ही लेना होगा क्योंकि उनके लिए लंबा समय दे पाना मुश्किल था। मैंने भी उनके इस प्रस्ताव को खुशी खुशी स्वीकार कर लिया था क्योंकि ‘ना’ बोलने का मतलब था उनके ईगो को हर्ट करना और फिर दूसरी बार उनकी सहमति कब मिलती इसकी भी कोई गारंटी नहीं थी। मैं निर्धारित समय से थोड़ा पहले ही स्टूडियो पहुँच गया था, वैसे तो किसी सामान्य आदमी के लिए स्टूडियो में अंदर जाना बहुत मुश्किल होता है पर प्रेस से होने की वजह से मेरे लिए यह कोई बड़ा मसला नहीं था। अंदर पहुँच कर मैने पता किया तो मुझे बताया गया कि वे सेट नम्बर २ पर शूटिंग कर रहे हैं और वहीं मिलेंगे। मैं सेट नम्बर २ पर जब उनसे मिला तो वे फिल्म के निर्देशक से बात कर रहे थे, उन्होंने मुझे देखते ही मेरा अभिवादन किया और मुझे इन्तज़ार करने को कहा। मैं भी वहीं खड़े होकर शूटिंग के लिए तैयार किये गये सेट को देखने लगा। शायद यहाँ कोई कोर्ट सीन फिल्माया जाने वाला था क्योंकि उस जगह कोर्ट का माहौल तैयार किया गया था और सभी अपने अपने काम में लगे हुए थे। मैंने देखा कि एक सहायक निर्देशक हीरो को संवाद की प्रैक्टिस करा था, मेकअप मैन एक कलाकार के चेहरे को फिनिशींग टच देने मे तल्लीन था, लाईट वाले लाईट की टेस्टिंग कर रहे थे, कैमरामैन का सहायक कैमरा सेट कर रहा था, सभी अपनी अपनी दुनिया में व्यस्त थे। तभी मैंने देखा कि कैमरामैन का सहायक मेरी तरफ आ रहा था, मुझे लगा कि शायद वह इन्टरव्यू के लिए बुलाने आया है इसलिये मैंने खुद ही पूछ लिया,
-सर फ्री हो गये क्या?
-नहीं सर जी थोड़ा वक़्त और लगेगा शायद एक घन्टा भी लग सकता है सर ने सॉरी बोलने को कहा है, मैं आपके लिए चाय भेजता हूँ तब तक आप चाय पीजिए जैसे ही सर ़प्रâी होंगे मैं खुद आकर इन्फॉर्म कर दूँगा।
-कोई बात नहीं अब आ गया हूँ तो काम पूरा कर के ही जाना ठीक होगा। बाई द वे तुम्हारा क्या नाम है?
सर मेरा नाम पी आर बालन है आप मुझे बालन कह सकते हैं।
-ग्रेट मि बालन थैंक यू।
यह सुनकर वह मुस्कुराते हुए वापस चला गया। मुझे बालन बहुत व्यवहार कुशल लगा जबकि अमूमन इस फील्ड में ऐसे लोग मैंने कम ही देखें हैं। थोड़ी देर बाद मेरी चाय भी आ गई और आराम से पास ही रखे हुए सोफे पर बैठ कर चाय पीने लगा। आमतौर पर स्टूडियो के अंदर लगाये गये सेटों पर बड़ी गहमा गहमी रहती है और सभी खुद को सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण और वी आई पी टाईप समझा करते हैं। ऐसे में किसी से औपचारिक बातचीत करना भी संभव नहीं होता और मेरी समस्या वक़्त गुजारने की थी अत: समझ में नहीं आ रहा था कि क्या किया जाये। तभी मैंने देखा कि एक सामान्य कद काठी का आकर्षक चेहरे वाला नौजवान जो थोड़ा सहमा सहमा सा लग रहा था आस पास खड़े यूनिट के लोगों से कूछ पूछने की कोशिश कर रहा था पर सही जबाब या तवज्जो नहीं मिलने के कारण वह किसी दूसरे शख्स की तरफ बढ़ जाता था। मेरे पत्रकार मन की जिज्ञासा बलवती हो उठी मैंने सोचा इससे बात करनी चाहिए, मेरा कुछ समय तो अच्छा निकल जायेगा। वह मुझसे बमुश्किल पन्द्रह या बीस कदम की दूरी पर रहा होगा। मैं अपनी चाय खत्म होते ही उसके पास पहुँच गया और सीधे ही पूछ लिया।
-किससे मिलना है तुम्हें।
-सर मुझे असिस्टेंट डायरेक्ट साहब से मिलना है।
-इस सेट पर कम से कम पाँच असिस्टेंट होंगे ऐसे खोजना मुश्किल होगा तुम्हें नाम पता है उसका?
-नहीं सर मुझसे कहा गया था कि सेट पर जाकर असिस्टेंट डायरेक्टर को मिल लेना वो तुम्हे सब समझा देंगे।
-तुम क्या शूटिंग देखने आये हो।
-नहीं सर मैं आर्टिस्ट हूँ।
-आर्टिस्ट?
-हाँ सर मेरा कार्ड भी है।
-ओह-तो ऐसा कहो ना कि जूनियर आर्टिस्ट हो।
-सर एक बात बताओ जूनियर आर्टिस्ट,आर्टिस्ट नहीं होता क्या?
-अरे भाई बेशक़ होता है, मैंने ऐसे ही पूछ लिया था, मेरी बातों को सीरियसली मत लेना।
-नहीं सर माफ कीजिएगा मैंने ओवर रिएक्ट कर दिया था।
-नो इस्यू, मुझे लगता है तुम अभी नये नये हो।
-हाँ सर पिछले हफ्ते ही कार्ड बनवाया है और आज पहला दिन ही है।
-ओह! आल द बेस्ट।
-थैंक यू सर।
-वैसे क्या तुम अकेले ही आये हो और आर्टिस्ट भी आने वाले हैं।
-सर कुल पंद्रह आर्टिस्ट आने वाले हैं पर मै समय से काफी पहले आगया हूँ,सर जी मेरा पहला दिन था ना इसलिये काफी उत्साह था अंदर से इसलिये पहले ही निकल लिया ताकि जल्दी पहुँच कर थोड़ा रिलैक्स हो जाऊं तभी तो अपना बेहतर दे सकूँगा।
मुझे उसकी बातों में रुचि होने लगी थी अत: मैं भी उससे प्रâी होने की कोशिश कर रह था, मैंने बातचीत को आगे बढ़ाने की कोशिश की।
-तुम्हारे ऑफ़िस से कोई नहीं आया?
-सर जी कोई तो आनेवाला है ऐसा सुना था मैने, सर आप भी प्रोडक्शन से हैं?
-अरे नहीं भाई मैं बहुत छोटा आदमी हूँ बस लिखने पढ़ने का शौक है यहाँ एक इंटरव्यू के सिलसिले में आया हूँ बस बुलाये जाने का इन्तजार कर रहा हूँ।
-सर क्यों ऐसा बोल रहे हो आप तो बहुत बड़े आदमी हो, भला जर्नलिस्ट लोग छोटे कब से होने लगे। सर जी आपका नाम जान सकता हूँ?
-मैंने मुस्कुराते हुये अपना आई कार्ड उसकी तरफ बढ़ा दिया तो उसने चौंकते हुये कहा सर क्या बात है आपसे ऐसे मुलाकात हो जाएगी सोचा भी नहीं था मैंने आपके कई लेख पढ़े हैं बहुत अच्छा लिखते हैं आप।
अपनी प्रशंसा भला किसे बुरी लगती है जाहिर है मुझे भी खुशी हुई कि चलो कोई तो पढ़ता है हम जैसे लेखकों को भी।
-भाई तुम्हारा नाम तो मैने पूछा ही नहीं। कुछ बताओ अपने बारे में?
-सर जी मेरा नाम शिवम संत है मैं अहमद नगर से हूँ और यहाँ अपने एक दोस्त के साथ रहता हूँ।
-मुंबई में कितने साल हो गये?
-सर लगभग तीन साल से ज्यादा हो गये इस मायानगरी की खाक छानते हुए और अब थोड़ा बहुत समझने लगा हूँ।
-क्या बात है काफी समझदार हो बहुत जल्दी समझ गये इसके मायाजाल को मैं तो अब तक नहीं समझ पाया हूँ।
-सर माफ़ कीजियेगा जो जी में आया वो बोल गया उसने हँसते हुए कहा।
-अरे नहीं। आई वाज नॉट सीरियस यों ही बोल गया, अच्छा यह बताओ तुम्हारे अंदर जूनियर आर्टिस्ट बनने का ख्याल कैसे आया? इस सवाल से वह मुझे थोड़ा असहज सा लगा।
-सर जी आप बहुत देर से खड़े हैं आपको तकलीफ़ हो रही होगी।
-शिवम लगता है मेरे इस सवाल ने तुम्हे परेशान कर दिया है, कोई बात नहीं अगर तुम सहज नहीं हो तो जाने दो हम किसी और टॉपिक पर बात करते हैं।
-सर जी आप तो अन्तर्यामी हो कैसे जान लिया आपने।
-शिवम भाई बस मुझे ऐसा लगा, पता नहीं क्यों। मेरी बात सुनकर वह थोड़ा सहज हो गया और फिर बोलने लगा।
-सर जी मैं एम एस सी कर रहा था पर पूरा नहीं कर पाया। आई बाबा दोनों मिल कर खेती करते हैं ताई की शादी हो चुकी है, खेती का हाल तो आप भी जानते ही होंगे यह प्रॉफिट का धंधा तो है नहीं, हाँ घर में इतना ही पैसा आता है कि हमारा गुजारा हो जाता है। स्कूल के जमाने में ही चोरी छिपे फिल्म देखने की लगी लत ने कब ऐक्टिंग के कीड़े को जन्म दे दिया पता ही नहीं चला और बस इस जुनून ने कुछ यों जकड़ा कि सब कुछ छोड़ कर मुंबई आ गया। कालेज के जमाने में कई नाटकों और नुक्कड़ नाटकों में भाग लिया करता था तो दोस्त यार मेरी ऐक्टिंग की बहुत तारीफ किया करते थे और सभी की यही सलाह होती थी कि मुझे फ़िल्मों में कोशिश करनी चाहिए। मुझे भी लगता था कि मैं कुछ कर सकता हूँ कुछ करीबी लोगों की राय थी कि मुझे किसी ऐक्टिंग स्कूल ज्वाइन कर लेनी चाहिए इससे फिल्मों के जाने का रास्ता आसान हो जाता है पर उनकी फीस पे कर पाना मेरी सोच से भी बाहर की बात थी तो अन्त में एक ही रास्ता था कि मैं मुंबई आकर अपनी किस्मत का एक्जाम दूँ और आखिर वही किया मैंने। पर शायद मैंने अच्छे से तैयारी नहीं की थी इसलिये हर बार फेल होता रहा और हर असफलता के साथ आत्मविश्वास भी उसी रफ्तार से दम तोड़ने लगा।
मुझे उसकी बातों में ईमानदारी नजर आ रही थी और उसकी आपबीती सुनकर यही लग रहा था कि इसने मेहनत तो ज़रूर की होगी पर सही अवसर नहीं मिल पाने के कारण कुछ हासिल नहीं कर पाया था। मैंने फिल्म पत्रकारिता के अपने लंबे अनुभव मे यह महसूस किया था कि ऐक्टिंग एक ऐसा करियर है जहाँ सफल होने के लिये बहुत सारे फैक्टर्स का एक साथ मिलना बहुत ़जरूरी होता है और उसके आभाव में कुछ लोग पूरी जिन्दगी स्ट्रगल करते हैं और कुछ जूनियर आर्टिस्ट बन कर फ़िल्मों में जमा होने वाली भीड़ का हिस्सा बनने को ही अपनी किस्मत की इतिश्री मान लेते हैं। मुझे न जाने क्यों शिवम से बहुत सिम्पैथी हो रही थी और मैं उसके बारे में बहुत कुछ जानना चाहता था। मैंने उससे फिर पूछा,
-शिवम जब तुमने मुंबई आने का तय किया तो तुम्हारे आई बाबा ने क्या कहा?
-सर जी वे लोग इसके लिए बिलकुल तैयार नहीं थे खास कर आई तो एकदम नहीं वो तो यही बोलती थी कि हम लोग खेती करने वाले लोग हैं यह सब काम हमारा नहीं है पर मेरी जिद के आगे वे भी क्या बोलते उन्होनें आधे मन से हाँ कह दिया।
-पर क्या तुमने पूरी कोशिश की?
-सर जी अपनी तरफ से तो पूरी कोशिश की थी पर प्रोडक्शन या कास्टिंग वालों की डिमांड मैं कहाँ से पूरी करता! सभी को हाई टेक पोर्टफोलियो चाहिये जिसे तैयार करवाने में काफी खर्च आता है और वह मेरे लिए संभव नहीं था,कुछ को अनुभवी लोग चाहिये थे और जहाँ नये चेहरों की ज़रूरत थी वहाँ मैंने ऑडिशन दिया था पर बात नहीं बनी, कुछ थियेटर ग्रुप से भी जड़ने की कोशिश की पर वहाँ कई तरह की बातें देखने और जानने को मिलीं साथ ही उनकी शर्तें भी अजीब थीं अत: थियेटर वाला आइडिया भी ड्रॉप कर दिया मैने। सर लगभग तीन साल तक बहुत हाथ-पैर मारे और घर से आने वाले पैसे पर गुजारा करता रहा फिर एक दिन किसी ने जूनियर आर्टिस्ट बनने का आइडिया दिया जो मुझे सही लगा और मैंने मेम्बरशिप ले ली पर मेरी कोशिश जारी रहेगी सर जी।
-मेम्बरशिप लेने में तुम्हारे कितने पैसे खर्च हुए?
-सर जी जाने दीजिये क्या करेंगे जान कर वैसे आपको सब पता होगा। मैंने हँसते हुए कहा- शिवम मैं बस यह जानना चाहता था कि उन्होनें तुमसे ज्यादा पैसे तो नहीं लिये, खैर कोई बात नहीं पर मैं तुम्हे निराश नहीं करना चाहता फिर भी एक बात तुम्हें बताना ज़रूरी समझता हूँ कि जूनियर आर्टिस्ट से आर्टिस्ट बनने का सफर बहुत लंबा और मुश्किल भी हो सकता है इसलिये धैर्य मत छोड़ना। यहाँ लोगों को भीड़ का हिस्सा बने रहने में ही उम्र निकल जाती है बमुश्किल कुछ लोगों को डायलाग बोलने का मौका मिलता है पर अगर तुम्हारे अंदर प्रतिभा है तो तुम्हे ज़रूर मौका मिलेगा। मेरी बात सुनकर वह भावुक हो गया था जो उसके चेहरे से साफ साफ दिख रहा था। उसने धीरे से कहा,
‘सर जी मेरा दोस्त कहता है कि जूनियर आर्टिस्ट कभी आर्टिस्ट नहीं बन सकता है और ऐसा ही कुछ आपने भी कहा था क्या ऐसा सच में होता है? सच कहूँ तो मुझे उससे इस तरह के जटिल सवाल की उम्मीद नहीं थी और इसका ज़बाब देना भी मेरे लिए बहुत आसान नहीं था इसलिये मैने थोड़ी भूमिका के साथ अपनी बात कहने की कोशिश की।
-शिवम मैं जो कह रहा हूँ उसे समझने की कोशिश करना, देखो दोनों आर्टिस्ट ही हैं पर प्रॉब्लम यह है कि एक जूनियर आर्टिस्ट का रोल बहुत ही सीमित होता है वह किसी भी सीन में भीड़ का एक हिस्सा मात्र होता है जैसे तुम्हे यहाँ कोर्ट सीन के लिए बुलाया गया है तो ऐसे में तुम्हारी प्रतिभा कैसे बाहर आएगी जबकि एक आर्टिस्ट को पूरा सीन करने का मौका मिलता है वह अपनी डायलाग डिलीवरी और अपने किरदार के अनुसार अपने चेहरे पर वैसे ही भाव लाकर दर्शकों को प्रभावित कर सकता है। पर कई बार ऐसा होता है कि एक दो मिनट के सीन में किसी जूनियर आर्टिस्ट द्वारा दिया गया परफोर्मेंस भी लोगों को याद रह जाता है इसलिये मैं तुमसे यही कहूंगा कि कोशिश करते रहना क्योंकि अभिनय की यह दुनिया अजीब है यहाँ की गई भविष्यवाणी कभी भी गलत हो सकती है। तुमने खुद भी कितने नये चेहरों को आगे जाते और स्टार पुत्रों को फ्लॉप होते देखा होगा इसलिये लगे रहना आज नहीं तो कल मौका ज़रुर मिलेगा।
वह मेरी बात को बहुत संजीदगी से सुन रहा था और मैं उसके चेहरे पर आने जाने वाले भावों को पढ़ने की कोशिश कर रहा था और मेरा अन्तर्मन बार बार यह कह रहा था कि बंदा जेनुइन है तभी उसने कहा,
-सर जी लोगों को यह कहते सुना है कि अगर एक बार जूनियर आर्टिस्ट का टैग लग जाये तो आदमी कभी आर्टिस्ट नहीं बन सकता है क्या ऐसा होता है?
मैंने उसकी आँखों में देखते हुए उसकी पीठ थपथपाते हुए कहा,
-तुम जिस स्टुडियो में खड़े हो और वह जिसके नाम पर है वे उन लोगों में से एक हैं जिन्होनें अपना करियर बतौर एक्सट्रा शुरू किया था और इससे ज्यादा मैं क्या कह सकता हूँ। मेरे इस जबाब को सुनकर उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक दिखी मुझे जो यह साफ साफ संकेत दे रही थी कि वह सौ फीसदी पॉजिटिव हो चुका है। तभी मुझे सामने से कैमरामेन का सहायक इशारा करता हुआ दिखा अथार्त मुझे इंटरव्यू के लिए बुलाया जा रहा था। मैंने शिवम की तरफ देखते हुए कहा,
-ओके डियर मैं इंटरव्यू के लिए जा रहा हूँ फिर कभी ऐसे ही तुमसे मुलाकत हो जाएगी शायद तुम्हारा इंटरव्यू लेने के लिए ही आ जाऊं, इतना सुनते ही उसकी आँखें भर आईं वह मेरे पैर छूने के लिए झुक ही रहा था कि मैने उसे रोकते हुए कहा,
-यह क्या कर रहे हो शिवम इसकी ज़रूरत नहीं है मेरी शुभकामनाएं तुम्हारे साथ हैं मुझे पूरा विश्वास है कि तुम एक दिन ज़रूर सफल होगे।
-सर जी आप आज अचानक मिल गये यों समझिये आज से आप मेरे मेंटॉर हो गये बस अपना एक कार्ड दे दीजिए आपको बीच बीच में फोन करता रहूँगा,कर सकता हूँ न सर जी।
-बिलकुल क्यों नहीं, मैंने उसे अपना कार्ड देते हुए कहा और आगे बढ़ गया। मैं मन ही मन सोच रहा था हम पत्रकारों की जिन्दगी भी अजीब होती है कभी हफ्तों तक कोई स्टोरी नहीं मिलती और किसी रोज एक ही दिन में दो मिल जाती है, है ना कुछ अजीब सा यह प्रोफेशन!

राजेश कुमार सिन्हा
बान्द्रा, मुंबई

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Written by Sahitynama

साहित्यनामा मुंबई से प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका है। जिसके साथ देश विदेश से नवोदित एवं स्थापित साहित्यकार जुड़े हैं।

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