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नीरजा

नीरजा
कितनी खुशी खुशी से  शादी करके आयी थी  नीरजा ससुराल में। मन मे सतरंगी सपने लिए। मायके में पिता और भाई का इतना डर था कि किसी लड़के की तरफ देखना तो दूर मन मे किसी का ख्याल लाने का दुःसाहस भी नही कर पाती थी।
तो बस उस समय की बाकी सभी लड़कियों की तरह उसकी भी शादी माँ बाप की मर्जी से हुई थी। सभी लड़कियों की तरह  अगर उसने भी यही सपना देखा था कि उसको बहुत अच्छा ससुराल ओर बहुत प्यार करने वाला पति मिलेगा जिसके लिए वो दिलो जान न्योछावर कर देगी तो क्या गलत किया था उसने।
हर लड़की अपने पति में ही प्रेमी को खोजती है और उसी के साथ ज़िन्दगी के वो हसीन लम्हे जीना चाहती है जो बस उसकी कल्पना और ख्वाबों में आया करते थे। अगर उसको ऐसा जीवन साथी मिल जाये तो बाकी सब चीज़ों और कमियों से समझौता करके वो खुद को उसके लिए ही समर्पित कर देती है।
ज़िन्दगी ने उसको पहला और बहुत बड़ा झटका  हनीमून पर ही दे दिया  जब उसने पति के गले मे पहने हुए लॉकेट के लिए पूछा  क्योंकि वो नीरजा के नाम का ही पहला अक्षर था तो आगे से उसको ये जवाब मिला कि ये लॉकेट तुम्हारे लिए नही बनवाया ये तो उन्होंने बहुत समय से किसी और के नाम का पहन रखा है…
और फिर दिल के कितने टुकड़े हुए और कहाँ कहाँ गिरे कि वो तो समेट भी नही पायी और वो ही वो पहला दिन था जब शुरू हुआ ज़िन्दगी में समझौते करने का सिलसिला ।
कदम कदम पर वो अंतहीन समझौते करती रही और अपने ग्रहस्थ धर्म को निभाती रही। उसको यही उम्मीद थी कि वो अपने पति का मन जीत ही लेगी और वो कभी न कभी तो उसे अपने दिल मे जगह अवश्य देंगे।
 फिर ज़िन्दगी ने एक और बड़ा झटका दिया जब पति से ही पता चला कि वो उसके पति की ज़िंदगी मे एक बार फिर से आ गयी है क्योंकि जो दिल से नही निकल पायी वो फिर से सामने आने पर दिल के तार फिर से बज उठे।
 उस समय नीरजा के लिए खुद को संभालना बहुत ज्यादा मुश्किल हो गया था। वो कई रातें सो नही पायी। अपनी ज़िंदगी को खत्म करने तक का सोच लिया लेकिन बच्चों की खातिर खुद को सम्भाला और मन ही मन एक फैसला लिया कि किसी भी कीमत पर वो अपना घर टूटने नही देगी और सावित्री की तरह अपने सत्यवान को वापिस पा कर ही रहेगी।
लेकिन इस बार दोनो  परिवार में ही मिलते। एक साथ दोनो के परिवार बच्चे घूमने का या मूवी का प्रोग्राम बनाते। क्योंकि दोनों परिवारों का पहले से ही आना जाना था तो किसी को शक होने की भी गुंजाइश नही थी।
 नीरजा अंदर से सब कुछ जानती थी लेकिन उसने कभी भी दोनो को जलील नही किया और पति के हर कदम पर उसके साथ रही। हर जगह उनके साथ गयी और इसी वजह से उस दूसरी औरत का पति भी साथ होता कि परिवार में ही तो जा रहे हैं ।
दोनो बहुत समय तक उसको बेवकूफ बनाते रहे और वो शरीफ बन्दा अपनी पत्नी पर अंधविश्वास करता रहा। धीरे धीरे नीरजा ने अपने ही पति की प्रेमिका से दोस्ती बढ़ानी शुरू कर दी और ये दोस्ती धीरे धीरे इतनी गहरी होती गयी कि वो जहां भी फ्रेंड सर्किल में एक साथ जाती लोग उनको बहने समझते।  आखिर एक दिन  नीरजा के ही नाम के अक्षर वाली उस…..
को समझ आ गयी कि वो जो भी कर रही थी या किया वो बहुत गलत किया और उसको इस बात का अहसास भी हो गया  कि राजीव के लिए नीरजा ही बनी है नीलू नही। उसने राजीव को मिलने और अलग से बात करने से मना कर दिया।
 आज नीरजा और नीलू अपनी दोस्ती के लिए हर जगह जानी जाती हैं ।कोई उन्हें बहने समझता है तो कोई गहरी दोस्त। वो ही नीलू अब अपनी हर बात सबसे पहले नीरजा से ही शेयर करती है।
उधर नीरजा के पति को भी समझ आ गयी है कि जितने त्याग उसके लिए नीरजा ने किए वो कोई और नही कर सकता था। हालांकि वो नीरजा से यही कहते हैं कि वो अब दिल से सिर्फ और सिर्फ उसी को ही प्यार करते हैं।
 लेकिन नीरजा का दिल जो टूट गया तो बस टूट गया वो अपने मन मे यही कहती है कि प्यार तो ईश्वर की दी हुई एक नेमत है जो कि खुद ब खुद ही मिल जाता है छीना या मांगा नही जाता। अब जब ज़िन्दगी ही समझौतों पर टिकी  है तो ऐसे ही सही। लेकिन मन मे एक संतोष है जिसके लिए वो हमेशां ही भगवान का शुक्रिया अदा करती है कि उसने बिना किसी को बदनामी या जलालत दिए दो घरों को टूटने से बचाया है
-रीटा मक्कड़

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