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कहानी – दूसरा पहलू

दूसरा पहलू
आज मेरे पचासवें जन्म दिन पर मेरे बहुत मना करने के वावजूद मेरे पति साहिल मुझसे रात के 12 बजे सुगर फ्री केक कटवा कर ही माने‌ क्योंकि आज कल बर्थ डे कुछ ऐसे ही सेलिब्रेट किया जाता है और साहिल पूर्ण रूप से आज के आधुनिक संस्कृति व टेक्नोलॉजी को आत्मसात कर चुके हैं।
      साहिल का मानना है कि अगर जीवन में खुश रहना है तो हमें समय के साथ हो रहे परिवर्तन को सहर्ष स्वीकार कर लेना चाहिए और यही वजह है कि साहिल हमारे सोसाइटी के युवाओं में लोकप्रिय हैं।
         सुगर फ्री केक लाने के पीछे भी उनका अपना एक खास मक़सद था। वो भली-भांति जानते हैं कि मुझे केक बहुत पसंद है किन्तु मुझे मीठा खाने की सक्त मनाही है क्योंकि अक्सर मेरा सुगर लेवल  हाई रहता है और उन्हें सदा मेरे स्वास्थ्य की चिंता रहती है।
        उम्र के इस पड़ाव पर अक्सर बड़े अरमानों के साथ तिनका तिनका जोड़ कर बनाए अपने घोंसले में पति-पत्नी अकेले ही रह जाते हैं। बच्चे दूर कहीं ऊंची उड़ान भरने घोंसला छोड़ कर उड़ जाते हैं और एक बार फिर पति पत्नी से माता-पिता बनी यह जोड़ी वहीं कर आ खड़ी हो जाती है जहां से उन्होंने अपना सफर शुरू किया था।
       साहिल समय के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने पर विश्वास रखते हैं इसलिए वे कभी इस बात से दुखी नहीं होते कि अब हमारे बच्चें हमारे साथ नही हैं और ना ही कभी मुझे उदास होने का मौका देते हैं। साहिल कभी किसी भी अवसर को हाथ से नहीं जाने देते।वे हर छोटी से छोटी खुशी को उत्सव के रूप में मनाने और उन लम्हों को यादगार बनाने  में विश्वास  रखते हैं।
       वे मानते हैं ईश्वर पुनः पति-पत्नी को  वह हसीन पल लौटाते है जिसे माता पिता बनने के पश्चात दंपत्ति अक्सर भूल जाते हैं और केवल अपने बच्चों की ख्वाहिशों को पूरा करने में कुछ इस तरह जुट जाते हैं कि उनके अपने अरमान कहीं पीछे छूट जाते हैं, परन्तु यही वह वक्त होता है जब वे फिर से अपनी अधूरी जिन्दगी खुल कर जी सकते हैैं,अपने अरमानों को पूरा कर सकते हैं। उनकी यही सोच उन्हें दूसरों से अलग करती है।
       हम पति-पत्नी अपनी छोटी सी दुनियां में अकेले ही रहते हैं। कुछ समय पहले तक हमारे बच्चे भी हमारे साथ हुआ करते थे  लेकिन अब हमारे दोनों बच्चों कि अपनी एक अलग दुनियां है, जहां वे बेहद खुश हैं। हमारा बेटा अपनी पत्नी और बेटी के साथ अपनी नौकरी की वजह से दूसरे शहर में रहता है और हमारी बेटी अपने ससुराल में अपनी घर गृहस्थी में पूरी तरह से रम ग‌ई है।
       आज की संस्कृति या आधुनिकता के मैं खिलाफ नहीं और ना ही मैं इस वर्चुअल वर्ल्ड की विरोधी हूं क्योंकि मैं स्वयं इसका एक हिस्सा हूं लेकिन फिर भी न जाने  क्यों मैं अब तक पूर्ण रूप से इसे अपना नहीं पाई हूं।
       केक काटते और गपशप करते हुए काफी देर हो गई। सुबह गरमा गर्म चाय, इलायची और अदरक की महक से नींद खुली तो देखा साहिल ने नाश्ता रेडी कर लिया है। ब्रेकफास्ट की टेबल पर एक बार फिर साहिल ने मुझे खूबसूरत फूलों का गुलदस्ता भेंट करते हुए जन्मदिवस की बधाई दी और हर बार की तरह इस बार भी डिनर बाहर करने का प्लान बना, वे दफ्तर से जल्दी लौटने का वादा कर के चले गए ।
       मैं भी घर के कामों में जुट गई और जब घर के कामों से फुर्सत हुई तो अपने लिए एक कप चाय बना वरांडे में बैठ अपना वाट्सएप चेक करने लगी तो मैंने देखा बेटा-बहू, बेटी-दामाद, जेठ-जेठानी, देवर- देवरानी सभी रिश्तेदारों और दोस्तों के बधाई संदेश है। सभी ने जन्मदिन की बधाईयां दी है।यह देख मन प्रसन्न हो गया और मैंने चाय पीते हुए सभी को मैसेज का जवाब दिया, फिर मैंने सोचा चलो अब फेसबुक भी देख लिया जाए तो वहां पर भी ढेरों बधाइयां थी,कुछ ऐसे लोगों के भी बधाई संदेश थे जिनसे मैं कभी मिली ही नही, वही हाल इंस्टाग्राम पर था। शुभकामनाएं और बधाइयों की लंबी लिस्ट थी। मैं सभी का संदेश पढ़ उनके जबाव देने लगी।
       यह वर्चुअल वर्ल्ड भी कितनी अजीब है ना…. यहां हम उन लोगों के साथ होते है जिन्हें हम ठीक से जानते तक नही। उन्हें उनके बर्थ डे, एनिवर्सरी और खास अवसरों  पर विश करते हैं जिनसे हमारा कोई नाता नहीं, वैसे इसमें कोई बुराई नही है।
       इन्हीं सब बातों पर विचार करते हुए ना जाने क्यों मेरे मन में यह ख्याल आया कि सबने मुझे मैसेज तो किया किन्तु किसी ने अब तक मुझसे बात नहीं की है। क्या किसी के पास इतना भी वक्त नहीं है कि मेरे इस विशेष दिन पर दो घड़ी मुझसे बात ही कर लें।
        यह कैसी विडम्बना है..? लोग घंटों ऑनलाइन रहते हैं लेकिन उनके पास अपनों के लिए वक्त नही,कुछ ऐसी ही बातों में गोते लगाते हुए मन बीते दिनों के पन्नों को पलटने लगा और मेरे कदम स्वत: ही स्टडी रूम की ओर चल पड़े।
       स्टडी रूम में जाकर मैंने अपनी अलमीरा का वह ड्रावर खोला जिसमें मैंने एक बहुत ही पुराना बक्सा बड़ी हिफाजत से सहेज कर रखा था, इस बक्से में  अनगिनत यादों की महकती खुशबू लिफाफे में बंद थी। उन सब को बिखेर मैं वहीं जमीन पर बैठ गई। आज भी इन ग्रीटिंग कार्ड्स, खत, और अंतर्देशीय पत्रों पर लिखे एक एक शब्दों के एहसास दिल को छू रहे थे। अपनी बेस्ट फ्रेंड मिली का वह कार्ड  देख मन भावविभोर हो उठा जिस पर लिखा था
       “ईस्ट ऑर वेस्ट अवर फ्रेंडशिप इज़ बेस्ट”
       माना अब कार्ड का चलन समाप्त हो गया है, मैसेज भी अब कट, पेस्ट, कॉपी और फारवर्ड होते हैं ,मिली भी अब दूसरे शहर में रहती हैं लेकिन आज के दिन…. आज के दिन तो वह मुझे फोन कर ही सकती थी। यह सोच मेरी आंखें झिलमिला ग‌ई तभी मेरे इस अनमोल खजाने में से मुझे एक और नायाब मोती मिला जो मेरे बच्चों के हाथों से बनाया हुआ कार्ड था जिस पर रंग बिरंगे स्केच पेन और क्रेयॉन से ड्राइंग किया हुआ था और उस पर “हेप्पी बर्थ डे डियर मम्मी” लिखा हुआ था जिसे छोटे छोटे चमकीले स्टार से सजाया गया था।इस खूबसूरत अमूल्य ग्रीटिंग के आगे दुनियां के सारे कीमती से कीमती उपहार फीके थे।
       मैं इन सब में पूरी तरह से खो गई, हर कार्ड,हर खत और हर लिफाफे में आज भी वही आत्मीयता की खुशबू बरकरार थी। पोस्ट कार्ड को देख ख्याल आया,आज प्रायवेसी को लेकर सोशल मीडिया पर कितनी बहस छिड़ी हुई है। हर कोई प्रायवेसी चाहता है। बच्चे माता-पिता से प्रायवेसी चाहते हैं, पति पत्नी प्रायवेसी चाहते है ,हर रिश्ता एक दूसरे से प्रायवेसी चाहता है तभी तो अब अपने हर चीज पर लोग पासवर्ड डाल कर रखते हैं यहां तक कि अपने फोन पर भी, और एक यह पोस्ट कार्ड का जमाना था। आलम यह था कि दिल की बात बेझिझक हम इस पोस्ट कार्ड पर उतार देते थे।
       सच…. जमाना कितना बदल गया है,लोग बदल ग‌ए है। इस डिजिटल वर्ल्ड और वर्चुअल वर्ल्ड ने लोगों के जीने का अंदाज़ ही बदल दिया है, अपनों को अपनों से दूर कर दिया है।
       विचारों के भंवर में मैं कुछ इस तरह गुम हो गई कि वक्त का पता ही नहीं चला। डोरबेल की आवाज से मेरी तंद्रा भंग हुई। मैं अपना बहुमूल्य खजाना समेट वापस उन्हें अलमीरा में संजो, डोरबेल की ओर बढ़ गई, दरवाजा खोला तो सामने साहिल खड़े थे। मुझे देखते ही बोले चलो जल्दी तैयार हो जाओ हमें बाहर चलना है। मैं साहिल के सीने से लगती हुई बोली-
       ” नहीं…. मुझे कहीं नहीं जाना…. मेरा मन नही। मैं घर पर ही कुछ बना लेती हूं”
       “तुम्हें बाहर नही चलना है तो कोई बात नही, हम खाना ऑनलाइन ऑर्डर कर लेते हैं लेकिन तैयार तो तुम्हें फिर भी होना पड़ेगा” साहिल मुस्कुराते हुए बोले।
       मैंने अश्चार्य से कहा-“क्यों…?”
       “अरे भाई आज तुम्हारा पचासवां बर्थ डे है इसे ऐसे ही थोड़े जाने देंगे  “।
         साहिल के मनुहार करने पर जब मैं तैयार हो कर हॉल में आई तो मैंने देखा साहिल लेपटॉप पर कुछ कर रहे हैं। मैं उनके करीब जा बैठी। थोड़ी ही देर में मैंने देखा हमारे दोनों बच्चे और उनकी फैमिली लेपटॉप पर दिखाई दे रहे है फिर कुछ ही पल में मिली भी दिखाई देने लगी ये सब डिजिटल वर्ल्ड और टेक्नॉलॉजी का ही कमाल था कि हम सब अलग अलग शहरों में होते हुए भी ऑनलाइन एक दूसरे को देख पा रहे थे, साथ मिलकर बातें कर रहे थे। मैं इस बात से आज अत्यंत खुश थी कि मेरे अपने मुझ से दूर होते हुए भी आज मेरे इस विशेष दिन पर  मेरे पास है, मेरे साथ है। तभी घर बैठे ऑनलाइन ऑर्डर किया हुआ खाना भी आ गया।
       ये डिजिटल वर्ल्ड और न‌ई टेक्नोलॉजी  का ही एक दूसरा पहलू था जिसे नज़र अंदाज़ कर पाना संभव नहीं है।
-प्रेमलता यदु

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