कमान-ए-शाह से गुल किस हदफ को जाते हैं नशेब-ए-हक में जा कर मुझे हल आया
मैं दिल को उस की ताघाफुल-सारा से ले आया और अपने ढाना-ए-वहशत में ज़र-ए-दाम रखा
यही बहुत द मुझे नान ओ आब ओ शाम.ए ओ गुल सफर-नज़ाद था असबाब मुहतसर रक्खा
अजब था घूरूर-ए-शगुफ्त -ए-रूहसारी का प्रयोग करें बहार-ए-गुल को बहुत बे-हुनर कहा उस ने
किताब-ए-उमर से सब हर्फ़ उद गा.ए मेरे कि मुझ असिर को होना है हम-कलाम उस का
मैं चाहता हूं मुझे मशालों के साथ जला कुशादा-तर है अगर खेमा-ए-हवा तुझ पे
यही बहुत द मुझे नान ओ आब ओ शाम.ए ओ गुल सफर-नज़ाद था असबाब मुहतसर रक्खा
कमान-ए-हहान-ए-अफलाक के मुकाबला भी मैं उस से और वो फिर कज-कुला मुझसे हुआ
अत उसी की है ये शाहद ओ शोर की तौफीक वही गलीम में ये नान-ए-बे-जवीन लाया