शकील बदायूनी की  बेहतरीन शायरी प्रसिद्ध फ़िल्म गीतकार  और शायर

ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया जाने क्यूँ आज तेरे नाम पे रोना आया

कैसे कह दूँ कि मुलाक़ात नहीं होती है रोज़ मिलते हैं मगर बात नहीं होती है

उन का ज़िक्र उन की तमन्ना उन की याद वक़्त कितना क़ीमती है आज कल

मुझे दोस्त कहने वाले ज़रा दोस्ती निभा दे ये मुतालबा है हक़ का कोई इल्तिजा नहीं है

उन्हें अपने दिल की ख़बरें मिरे दिल से मिल रही हैं मैं जो उन से रूठ जाऊँ तो पयाम तक न पहुँचे

मोहब्बत में मिलते हैं शिकायत के मज़े  मोहब्बत जितनी बढ़ती है शिकायत होती जाती है

दिल की बर्बादियों पे नाज़ाँ हूँ फ़तह पा कर शिकस्त खाई है

दिल की तरफ़ 'शकील' तवज्जोह ज़रूर हो ये घर उजड़ गया तो बसाया न जाएगा

वो हवा दे रहे हैं दामन की हाए किस वक़्त नींद आई है

न पैमाने खनकते हैं न दौर-ए-जाम चलता है नई दुनिया के रिंदों में ख़ुदा का नाम चलता है