"मीरा का कृष्ण के लिए प्रेम"
मीराबाई की कृष्ण के प्रति असीम प्रेम और भक्ति इनकी पहचान बन गई है. इनकी कवितायें कृष्ण के प्रेम और भक्ति में रंग कर और गहरी हो जाती है
"नगरी नगरी फिरा मुसाफ़िर घर का रस्ता भूल गया क्या है तेरा क्या है मेरा अपना पराया भूल गया"
'मीर' मिले थे 'मीरा-जी' से बातों से हम जान गए फ़ैज़ का चश्मा जारी है हिफ़्ज़ उन का भी दीवान करें
"ग़म के भरोसे क्या कुछ छोड़ा क्या अब तुम से बयान करें ग़म भी रास आया दिल को और ही कुछ सामान करें"
"तरासूं अपना ह्रदय हीरा हो जाऊं निभाऊं ऐसा प्रेम "कृष्ण" से मीरा हो जाऊं"
"मगवाऊं धागा सूत का बनाऊं ऐसी डोर एक सिरा "श्याम " मेरा दूजा सिरा मैं हो जाऊं"
"कृष्ण कृष्ण" मन रटे आये न मन को चैन सुन धुन बंशी की जाऊं दिशाएं भूल
"कदम बढे़ फिर बार बस "माधव" की ओर मन का चैन चुरा ले गया वृन्दावन का "नन्द किशोर"
"सुनी सुनाई सब कहे कहे न कोई सच्ची बात तुम ही बताओ अब "मोहन" काटूं कैसे विरह की रात"
"सारा जग छोड़ा "सांवरे" तुमसे लगाई प्रीत धर वैराग मैं गाऊं कृष्ण प्रेम के राग"
"दिवाना दिवाना सब कहे मीरा प्रेम न समझे कोई "मोहन" जाने सिर्फ "मीरा" तो श्याम दिवानी होई।"