आज अस्पतालों में महिला डॉक्टर को देखना कोई बड़ी बात नहीं है। लेकिन १९ वीं शताब्दी में भारत में महिला डॉक्टर को देखना किसी चमत्कार से कम नहीं था। ३१ मार्च १८६५ को जन्मी आनंदीबाई गोपालराव जोशी भारत की शुरुआती महिला चिकित्सकों में से एक थीं। उनका जन्म महाराष्ट्र के एक बेहद रूढ़िवादी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वे अमेरिका में पश्चिमी चिकित्सा में दो वर्षीय डिग्री हासिल करने वाली पहली महिला बनीं।
१९वीं शताब्दी औपनिवेशिक भारत में सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन का दौर था। एक ओर यह ब्रिटिश शासन के प्रति बढ़ते असंतोष का समय था, जिसका परिणाम १८५७ में स्वतंत्रता आंदोलन की शुरुआत के रूप में सामने आया। वहीं दूसरी ओर, वह दौर भी था जब अंग्रेजों ने यहाँ उल्लेखनीय सामाजिक और शैक्षिक सुधार किए, जिनमें अंग्रेजी को शिक्षा का प्राथमिक माध्यम बनाना और बॉम्बे, कलकत्ता और मद्रास जैसे प्रमुख विश्वविद्यालयों की स्थापना करके उच्च शिक्षा पर जोर देना शामिल था। राष्ट्रीय जागरण के इन उथल-पुथल भरे समय में ही आनंदी जोशी (जिन्हें आनंदीबाई गोपालराव जोशी के नाम से भी जाना जाता है) का जन्म हुआ था।
३१ मार्च १८६५ को जन्म के समय उनका नाम पवित्र नदी यमुना के नाम पर रखा गया था। उनके माता-पिता गुणपुत्राव अमृतस्वर जोशी और गंगाबाई जोशी बॉम्बे प्रेसीडेंसी के कल्याण में स्थित एक समृद्ध जमींदार परिवार से थे, हालांकि उनकी संपत्ति धीरे-धीरे कम होती जा रही थी। आनंदी के बचपन के बारे में पर्याप्त दस्तावेजी जानकारी उपलब्ध नहीं है। आनंदी दस बच्चों में छठी संतान थीं, उनके चार भाई (जिनमें से केवल दो ही जीवित रहे) और पाँच बहनें थीं। उनके पिता उनसे विशेष रूप से स्नेह करते थे, क्योंकि वह एक जिज्ञासु और प्रतिभाशाली बच्ची थीं। स्वयं शिक्षित होने के कारण, गुणपुत्राव ने यह सुनिश्चित किया कि उनकी बेटी को उनके महल के एक हिस्से में स्थापित एक विद्यालय में मराठी की शिक्षा मिले। उस समय के प्रचलन के अनुसार, उनकी शादी नौ साल की कम उम्र में ही गोपालराव जोशी से हो गई, जो उसी शहर में डाक क्लर्क के रूप में काम करने वाले २९ वर्षीय विधुर थे। एक स्नेही पिता होने के नाते, गुणपुत्राव ने अपनी बेटी को शादी के उपहार के रूप में खानदानी वस्तुएं, गहने और यहाँ तक कि घर के पवित्र देवी-देवताओं की मूर्तियाँ भी भेंट कीं। शादी के बाद उनके पति ने उनका नाम `आनंदीबाई' रखा। गोपालराव अपने समय से आगे की सोच रखने वाले और सुधारवादी विचारों वाले व्यक्ति थे और उन्होंने आनंदीबाई से इस शर्त पर शादी की थी कि उन्हें अपनी पत्नी को शिक्षित करने की अनुमति दी जाएगी।
गोपालराव एक प्रगतिशील विचारक थे जिन्होंने महिलाओं की शिक्षा का समर्थन किया और चाहते थे कि आनंदी अंग्रेजी और संस्कृत सीखें। शादी के कुछ समय बाद ही वे अलीबाग, फिर कच्छ, सेरामपुर और कलकत्ता (अब कोलकाता) चले गए। गोपालराव ने आनंदी की शिक्षा में गहरी रुचि ली और उन्हें घर पर ही पढ़ाना शुरू कर दिया। यह उनकी एक अपरंपरागत जीवनशैली का हिस्सा बन गया, जिसकी अक्सर आलोचना की जाती थी; यहाँ तक कि जब गोपालराव अपनी पत्नी को शाम की सैर के लिए ले जाते थे, तब भी इसे सामाजिक नियमों का उल्लंघन माना जाता था। उन्होंने आनंदी को एक मिशनरी स्कूल में दाखिला दिलाने की कोशिश भी की, लेकिन सफल नहीं हुए। एक सहायक पति होने के बावजूद, गोपालराव में कुछ कमियाँ भी थीं। वे एक सख्त शिक्षक थे और कभी-कभी आनंदी के पढ़ाई में लापरवाही करने पर उन्हें पीट भी देते थे।
१८७८ में घटी एक दुखद घटना आनंदी के जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई। जब आनंदी १४ वर्ष की थीं, तब उन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया। दुर्भाग्यवश, शिशु दस दिन से अधिक जीवित नहीं रह सका। आनंदी को एहसास हुआ कि वह पुरुष चिकित्सक के साथ सहज महसूस नहीं कर रही थीं, और गर्भावस्था के दौरान उन्हें और भी अधिक कष्ट सहना पड़ा क्योंकि उस समय कोई देशी महिला चिकित्सक उपलब्ध नहीं थीं। शिशु को खोने का दर्द अपार था, लेकिन आनंदी ने स्वयं चिकित्सक बनने का निश्चय किया।
सीमित आर्थिक स्थिति के कारण विदेश में जाकर शिक्षा प्राप्त करना आसान नहीं था और भारत में उस समय महिलाओं के लिए चिकित्सा अध्ययन की सुविधा ही उपलब्ध नहीं थी। ऐसे में विदेश में जाकर शिक्षा प्राप्त करने के अलावा कोई विकल्प भी नहीं था। इसलिए सर्वप्रथम गोपाल राव ने विभिन्न श्रोतों से आर्थिक मदद के लिए प्रयास शुरू किये। गोपालराव ने १८८० में न्यू जर्सी के अपने मिशनरी मित्र रेवरेंड वाइल्डर को पत्र लिखकर एक ऐसे दंपत्ति का मामला प्रस्तुत किया, जो शिक्षा के लिए अमेरिका जाना चाहते थे और जिन पर अत्याचार हो रहा था। मिशनरी ने प्रस्ताव दिया कि दंपत्ति अमेरिका आने से पहले ईसाई धर्म अपना लें, जो उन्हें स्वीकार्य नहीं था। परिणामस्वरूप, उनकी याचिका खारिज कर दी गई। हालांकि, वाइल्डर ने गोपालराव का पत्र और मिशनरियों का जवाब प्रिंसटन मिशनरी रिव्यू में प्रकाशित किया, जिससे कुछ अप्रत्याशित घटनाक्रम हुए। न्यू जर्सी के रोसेल की श्रीमती थियोडिसिया कारपेंटर ने मिशनरी प्रकाशन को यूँ ही पढ़ते समय यह पत्र पढ़ा। वह पत्र से बहुत प्रभावित हुईं और जोशी दंपत्ति को जवाब देते हुए अपनी सहायता की पेशकश की और आनंदी को अपने निवास पर ठहराने की इच्छा व्यक्त की।
श्रीमती कारपेंटर आनंदी के लिए किसी देवदूत से कम नहीं थीं। उनके बीच पत्रों के आदान-प्रदान से श्रीमती कारपेंटर और आनंदी के बीच एक मजबूत रिश्ता बन गया। पत्रों में वे विभिन्न विषयों पर चर्चा करती थीं। श्रीमती कारपेंटर को भारतीय संस्कृति की कोई जानकारी नहीं थी, इसलिए आनंदी उन्हें भारतीय रीति-रिवाजों और धार्मिक परंपराओं के बारे में लिखकर भेजती थीं। आनंदी श्रीमती कारपेंटर को `मौसी' कहकर पुकारती थीं और खुद को उनकी भतीजी मानती थीं, यहाँ तक कि अपने पत्रों पर भी इसी तरह हस्ताक्षर करती थीं। ये पत्र आनंदी के विचारशील मन, उनकी वाक्पटुता और उनके आसपास की सामाजिक परिस्थितियों की झलक दिखाते हैं। जब आनंदी ने पेंसिल्वेनिया के महिला मेडिकल कॉलेज में आवेदन किया, तो पड़ोसियों ने इसका कड़ा विरोध किया। कुछ लोग तो किताबें लेकर चलते समय उन पर पत्थर फेंकते और थूकते भी थे।
१८८३ में, १९ वर्ष की आयु में आनंदी कलकत्ता (अब कोलकाता) से न्यूयॉर्क के लिए चार महीने की लंबी यात्रा पर रवाना हुईं। दो मिशनरी महिलाएं उनके साथ गईं, क्योंकि गोपालराव धन की कमी के कारण उनके साथ नहीं जा सके। अमेरिका पहुँचने पर श्रीमती कारपेंटर ने उनका स्वागत किया, और आनंदी ने गर्मियों का समय रोसेल में उनके परिवार के साथ बिताया, और उसी वर्ष अक्टूबर में पेंसिल्वेनिया के महिला मेडिकल कॉलेज में अपनी पढ़ाई शुरू की। मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई के दौरान भी वह लगातार श्रीमती कारपेंटर को पत्र लिखती रहीं, जो एक विदेशी धरती पर उनकी स्थानीय संरक्षक बन गईं।
आनंदी ने १८८६ में 'आर्य हिंदुओं में प्रसूति विज्ञान' विषय पर शोध प्रबंध लिखकर चिकित्सा की उपाधि प्राप्त की। उनके दीक्षांत समारोह में परिवार के दो सदस्य, गोपालराव और उनकी चचेरी बहन पंडिता रमाबाई, जो एक समाज सुधारक थीं, उपस्थित थे। समाचार पत्रों ने उनकी इस उपलब्धि को पश्चिमी चिकित्सा में चिकित्सा की उपाधि प्राप्त करने वाली भारत की पहली हिंदू महिला के रूप में प्रकाशित किया। यहाँ तक कि इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया ने भी उन्हें स्नातक की उपाधि पर बधाई संदेश भेजा। आनंदी ने न्यू इंग्लैंड क्षेत्र में चिकित्सा का अभ्यास करने के लिए एक और ग्रीष्मकाल रुकने की योजना बनाई थी परन्तु डॉक्टरी की पढाई पूरी करने और परिणाम आने से पहले ही दो भारतीय राज्यों से उन्हें नौकरी के प्रस्ताव मिल गए थे। कोल्हापुर के नवाब ने तीन सौ रुपए महीना और रहने के इंतज़ाम के साथ यह प्रस्ताव भेजा था जिसमें समय-समय पर उसकी तनख़्वाह बढने का आश्वासन भी था। बस शर्त यही थी कि वह राज परिवार की महिलाओं को देखने की फीस नहीं लेगी। इसपर आनंदीबाई ने जवाब लिखा कि सारी शर्तें मंज़ूर हैं लेकिन यह करना मेरे लिए मुश्किल है क्योंकि मेरे शास्त्र इसकी इजाज़त नहीं देते कि मैं ग़रीबों से फीस लूँ और अमीरों को मु़फ्त देखूँ। जब उन्हें महाराष्ट्र के कोल्हापुर स्थित अल्बर्ट एडवर्ड अस्पताल में महिला वार्ड की प्रभारी चिकित्सक नियुक्त किया गया, तो उन्होंने अपने वतन लौटने का फैसला किया।
१८८६ में भारत लौटने पर आनंदी का हार्दिक स्वागत किया गया। उन्होंने अपना लक्ष्य हासिल कर लिया था। उन्होंने न केवल चिकित्सा की उपाधि प्राप्त की, बल्कि इस प्रक्रिया में अपने पूर्व आलोचकों का सम्मान भी अर्जित किया। हालांकि, चिकित्सा के क्षेत्र में काम करने का उनका सपना उनकी खराब सेहत के कारण अधूरा रह गया। भारत की वापसी यात्रा ने उनकी पहले से ही नाजुक सेहत को और बिगाड़ दिया और उन्हें तपेदिक हो गया। उन्हें उनके मायके पूना (अब पुणे) ले जाया गया, लेकिन न तो दवा और न ही प्रार्थना उन्हें ठीक कर सकी। २६ फरवरी, १८८७ को २१ वर्ष की आयु में उन्होंने अंतिम सांस ली, एक ऐसे जीवन का अंत हो गया जिसमें देने के लिए बहुत कुछ था। उनकी लोकप्रियता इतनी प्रबल थी कि उनकी अस्थियों को न्यूयॉर्क के पॉकीप्सी में स्थित पॉकीप्सी रूरल कब्रिस्तान में श्रीमती कारपेंटर के पारिवारिक कब्रिस्तान में दफनाया गया।
आनंदी की विरासत आज भी अनेक रूपों में जीवित है। कैरोलिन वेल्स हीली डैल द्वारा लिखित उनकी जीवनी उनके व्यक्तिगत संबंधों पर आधारित है। काशीबाई कानिटकर द्वारा लिखित एक अन्य मराठी जीवनी उनकी कहानी को एक नारीवादी दृष्टिकोण से प्रस्तुत करती है। श्रीकृष्णा जे. जोशी द्वारा लिखित मराठी उपन्यास में उनके जीवन का काल्पनिक चित्रण किया गया है, जिसे नाटक के रूप में रूपांतरित किया गया और हाल ही में २०१९ में 'आनंदी गोपाल' नामक फिल्म भी बनी। शुक्र ग्रह पर स्थित एक ज्वालामुखीय गड्ढे का नाम उनके सम्मान में 'जोशी' रखा गया है, जिसका व्यास ३४.५ किमी है और यह ५.५ष्ट उत्तरी अक्षांश और २८८.८ष्ट पूर्वी देशांतर पर स्थित है।
उन्हें हमेशा एक बुद्धिमान, आत्मनिर्भर और स्वतंत्र युवती के रूप में याद किया जाएगा, जो दृढ़ राष्ट्रवादी होने के साथ-साथ धर्म के प्रति खुले विचारों वाली और महिलाओं के स्वास्थ्य और शिक्षा के लिए मुखर थीं। आनंदी ने अनगिनत लोगों के विचारों को परिवर्तित करने में सफलता प्राप्त की, जिन्होंने कभी महिलाओं की क्षमताओं पर संदेह किया था, और पीढ़ियों को चुनौतियों से निडर होने के लिए प्रेरित किया।
डॉ. रवीन्द्र दीक्षित