भगवान श्री कृष्ण जी ने गीता में कहा है कि 'ऋतुओं में मैं वसंत हूँ'। श्रीमद्भगवद् गीता के अध्याय १० के श्लोक ३५ में भगवान श्री कृष्ण अपनी विभूतियों का वर्णन करते हुए कहते हैं कि -
बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहं ।
मासानां मार्गशिर्षो त्र्हम् ऋतूनां कुसुमाकरः।।
अर्थात मैं महीनों में सर्वश्रेष्ठ मार्गशीर्ष का महीना हूं और ऋतुओं में सर्वश्रेष्ठ वसंत ऋतु हूँ। वसंत ऋतु को छह ऋतुओं में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है क्योंकि इसकी उत्पत्ति कामदेव के कारण हुई है तो इसे कामदेव का पुत्र कहा गया है। पौराणिक कथाओं के अनुसार शिवजी का तप भंग कर माता पार्वती से मिलाने के लिए कामदेव ने वसंत ऋतु उत्पन्न किया था। वसंत ऋतु को ऋतुराज भी कहा गया है क्योंकि सभी ऋतुओं ने वसंत ऋतु को अपने सर्वश्रेष्ठ अंशों में से कुछ अंश प्रदान किए हैं। सर्दी के बाद वसंत ऋतु का आगमन होता है तो उसका कुछ अंश मलयज में ठंडक का आभास दिलाता है जो पुष्पों को प्रस्फुटित और पल्लवित होने के लिए आवश्यक है। वहीं वसंत ऋतु के बाद ग्रीष्म ऋतु आती है इसलिए दोपहर की हवा में थोड़ी गर्माहट भी होती है। पर इस कोमल गर्माहट में कलियां प्रस्फुटित होकर अपनी सुगंध बिखेरती हैं। पलाश और सेमल से वन दहकते हैं तो महुवे और आम्र मंजरी की भीनी खुशबू वातावरण में मादकता भरती है। ठीक इसी प्रकार जिस तरह वर्षा ऋतु में हरियाली होती है उसी तरह वसंत ऋतु में नई कोपलें फूटती हैं और वन प्रदेश पतझड़ के बाद हरा भरा हो जाता है। वसंत ऋतु में प्रकृति अपने सुंदरतम रूप में प्रकट हो नव जीवन पाती है इसलिए इसे ऋतुराज कहा जाता है।
भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि जिस प्रकार ऋतुओं में ऋतुराज सर्वश्रेष्ठ है ठीक इसी प्रकार प्रकृति की सबसे सुन्दर और उत्कृष्ट वस्तुएं उनके ही दिव्य स्वरूप का प्रतिनिधित्व करती हैं। प्रकृति के सभी श्रेष्ठ तत्व उनके ही अंश हैं। भगवान श्री कृष्ण जी ने वसंत को ऋतुओं में सबसे प्रिय बताया है क्योंकि इस समय धरती में नव जीवन का संचार होता है। पतझड़ से सूनी शाखों पर नव कोपलें पल्लवित होती हैं तो आम्र,महुवा,सेमल,पलाश, सरसों और साथ ही श्वेत पुष्पों से श्रृंगार कर धरती दुल्हन की तरह सजती है, अपने प्रियतम ऋतुराज का स्वागत करने को। जिस प्रकार नव कोपलों, नव पुष्पों का उद्भव होता है ठीक इसी तरह यह समय नई शुरुआत और ज्ञान का प्रतीक है क्योंकि हम वाग्देवी सरस्वती की अर्चना करते हैं। महाकवि कालिदास जी ने अपने काव्य ऋतुसंहार में वसंत ऋतु के सौंदर्य का वर्णन बहुत मादक ढंग से किया है ...
प्रफुल्लचूतांकुर तीक्ष्णसायको
द्विफेरमाला - विलसद्वनुर्गुणः।
मनांसिमेत्वम् सुरतप्रसंगिना
वसन्तयोद्धा समुपागतः प्रिये।।
यहां पर वसंत को योद्धा कहा गया है जो सुरत प्रेमी रसिकों के हृदय को भेदने के लिए आम्र की खिली हुई मंजिरियों के तीखे बाण के साथ, अपने पुष्प धनुष पर, भ्रमर पंक्तियों की प्रत्यंचा चढ़ा कर आया है।
जिस प्रकार वसंत के सौंदर्य का वर्णन करने के लिए शब्द कम पड़ जाते हैं ठीक उसी प्रकार भगवान श्री कृष्ण जी के दिव्य स्वरूप का वर्णन करना कठिन कार्य है क्योंकि वह पृथ्वी के श्रेष्ठ पुरुष हैं।
एक तरह से देखा जाए तो पतझड़ जिस तरह निराशा का प्रतीक है वहीं पतझड़ के बाद नव कोपलों का फूटना नई उमंग, नई आशा, नई शुरुआत का प्रतीक है। भगवान श्री कृष्ण अर्जुन के सामने अपने दिव्य स्वरूपों का वर्णन करते हुए कहते हैं कि वे सर्वव्यापी हैं। प्रकृति का प्रत्येक कण उनका अंश है। वे सर्वत्र विद्यमान हैं, सर्वशक्तिमान तथा सृष्टिकर्ता हैं। वे स्वयं कहते हैं कि मैं ऋतुओं में वसंत हूँ; क्योंकि वसंत सभी ऋतुओं में सर्वश्रेष्ठ है तथा उत्साह,सकारात्मकता और सृजन से भरपूर है। ठीक उसी प्रकार भगवान श्री कृष्ण जी भी देवताओं में सबसे ऊपर और प्रकृति में सबसे सुन्दर हैं इसलिए वे वसंत का ही स्वरूप हैं और जो उनके शरणागत होता है उसे अजेय कर देते हैं। जिस प्रकार पतझड़ के बाद वृक्ष अडिग, अजेय खड़े रहते हैं नई कोपलों का स्वागत करने को, ठीक उसी प्रकार जब मनुष्य के मन में नई आशा, नई ऊर्जा का संचार होता है तो वो कभी हार नहीं मानते। अर्थात ईश्वर उन्हें हारने नहीं देते। यही गीता का सार है।
नमिता स्मृति मिश्रा