प्रसिद्ध महिला साहित्यकार- चित्रा मुद्गल

यह कहानी खानापुर गाँव के चुनाव के माध्यम से लोकतंत्र, जागरूकता और जनचेतना की सशक्त तस्वीर प्रस्तुत करती है। जहाँ एक ओर धनबल, बाहुबल और जातिवाद राजनीति को नियंत्रित करने की कोशिश करते हैं, वहीं दूसरी ओर एक साधारण विधवा मजदूर ‘आशा’ और युवा ‘विकास’ लोकतंत्र के वास्तविक अर्थ को जीवंत करते हैं। यह कथा बताती है कि चुनाव केवल सत्ता प्राप्ति का माध्यम नहीं, बल्कि नागरिक चेतना, संविधान और अपने अधिकारों की रक्षा का उत्सव है।

May 30, 2026 - 13:58
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प्रसिद्ध महिला साहित्यकार- चित्रा मुद्गल
वोट-जाग-गया-था
       यद्यपि साहित्य हो या अन्य कोई क्षेत्र महिलाओं के योगदान को कमतर नहीं आँका जा सकता। आदिकाल से ही साहित्य में महिलाओं का योगदान होता रहा है। महिलाओं ने अपनी लेखनी से समाज को नई दिशा देने के साथ ही नारी सशक्तिकरण को बढ़ावा दिया है। वैदिक काल की नारी मैत्रेयी, गार्गी से लेकर मध्यकाल की मीराबाई, स्वतंत्रता संग्राम कालीन सुभद्रा कुमारी चौहान, आधुनिक काल की कथाकार व उपन्यासकार मन्नू भंडारी, उषा प्रियंवदा, अमृता प्रीतम तथा समकालीन लेखिकाओं में मृदुला गर्ग, ममता कालिया, मैत्रेयी पुष्पा, चित्रा मुद्गल, सूर्यबाला जैसी नारियों ने स्त्री मन की गहराई में उतरकर मनोवैज्ञानिक चित्रण किया है ।
वस्तुत:साहित्य में महिला लेखन की परंपरा स्त्री के सम्मान उसके अधिकार और उसकी पहचान को लेकर रही है। भारतीय साहित्य के हर काल में महिलाएँ अपनी रचनाओं के द्वारा योगदान करती आ रही हैं। महिला लेखिकाओं ने अपने संवेदनाओं, विचारों से सामाजिक, पारिवारिक संघर्षों को वाणी प्रदान की है तथा पितृसत्तात्मक बेड़ियों को तोड़कर नारी सशक्तिकरण को साहित्य के केंद्र में स्थापित किया है।
आधुनिक हिंदी कथा साहित्य की प्रसिद्ध महिला साहित्यकारों में चित्रा मुद्गल का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। समकालीन कहानी लेखिकाओं में चित्रा मुद्गल एक चर्चित नाम है। इनका जन्म १० दिसंबर १९४४ को चेन्नई (तमिलनाडु) में हुआ था। इनका पैत्रक गाँव उन्नाव जिले में स्थित निहाली खेड़ा है। इनके पिता का नाम ठाकुर प्रताप सिंह और माँ का नाम विमला ठाकुर है। उनके पिता ठाकुर प्रताप सिंह एक जमींदार घराने से ताल्लुक रखते थे और माता विमला ठाकुर उत्तर प्रदेश के जनपद प्रतापगढ़ के बयालीस गाँवों के तालुकदार की बेटी थीं। चित्रा जी की प्रारंभिक शिक्षा की शुरुआत मुंबई से हुई बाद में उनको दादाजी के पास उन्नाव के निहाली खेड़ा गाँव भेज दिया गया। वहीं से उनकी पहली,दूसरी, तीसरी और चौथी कक्षा की पढ़ाई पूरी हुई। अपने दादाजी के पास रहकर पढ़ाई करते समय उन्होंने देखा कि उनके घर में काम करने वाले निम्न वर्ग के लोग किस तरह से शोषित और पीड़ित हैं, इसका उनके बालमन पर गहरा प्रभाव पड़ा। अपने बचपन की कई घटनाएँ चित्राजी के मन पर अमिट छाप छोड़ चुकी हैं जो कभी नहीं भुलाई जा सकतीं। उन्हीं घटनाओं के कारण चित्राजी के मन में विद्रोही भावनाएँ बचपन से ही जागने लगी थीं।
        एक बार उनके घर में काम करने वाले भीखू नाम के लड़के को गेहूँ की चोरी को लेकर उनके ताऊ जी ने नीम के पेड़ से बांधकर बहुत पीटा था जिससे उसका शरीर लहुलुहान हो गया था। मार खाते वक्त भीखू की गर्दन बंधी देह एक ओर लुढ़क गई थी। यह दर्दनाक दृश्य देखकर चित्राजी बहुत डर गई थीं । तभी से चित्रा के मन में विद्रोह भाव ने जन्म लिया। वे ‘मेरी प्रिय कथा’ में लिखती हैं- ‘जब वह मेरे जैसा ही है, फिर इसे जो खाना दिया जाता है,वह इतना कम क्यों होता है कि उसे अनाज की चोरी करनी पड़ती है क्योंकि बड़े पापा इसे इतनी निर्दयता से मार रहे हैं।’
 चित्रा जी के पिता ठाकुर प्रताप सिंह भारतीय नौसेना के अधिकारी थे। पिता का तबादला चेन्नई, मुंबई ,गोवा, विशाखापट्टनम आदि स्थानों पर होता रहता था। उनके पिता परिवार के साथ ही सभी जगहों पर जाते थे इसलिए चित्रा जी को भी अनेक स्थानों पर जाने का अवसर मिलता रहता था। अनेक स्थानों पर जाने के कारण चित्राजी का अनुभव भी उतना ही बढ़ता गया। भारत के अनेक स्थानों चेन्नई से लेकर आसाम तक के हिस्सों के लोगों की जिंदगी और उनकी समस्याओं को निकट से देखने का अवसर चित्रा जी को मिला।
 चित्राजी के पिता ठाकुर प्रताप सिंह सामंतवादी विचारधारा के व्यक्ति थे और उनकी माता सीधी-सादी गृहिणी थी। उनके माता-पिता के बीच में हमेशा अनबन ही रहती थी चित्राजी के ही शब्दों में- ‘माँ के साथ पिताजी का व्यवहार असंतोषजनक और बुरा था।’ इसी वजह से चित्रा के मन में माँ के प्रति अधिक लगाव बढ़ा और पिता के प्रति विद्रोह का भाव जगा। चित्रा के पिता ठाकुर प्रताप सिंह अंग्रेजी में रोमांटिक कविताएँ और नाटक लिखते थे। अतः चित्राजी को लेखन कौशल अपने पिता से विरासत में मिला।
चित्रा की पाँचवीं से लेकर आगे की पढ़ाई मुंबई में हुई। जब वह मुंबई के घाटकोपर के हिंदी हाई स्कूल में पढ़ रही थीं तभी नृत्य भी सीखने लगीं। पिता ने उसका विरोध किया किंतु वे नहीं मानीं। चित्रा के पिता चाहते थे कि वह बंदूक चलाना और घुड़सवारी करना सीखें। सन १९६३ में मुंबई के सोमैया कॉलेज विद्या विहार से इंटरमीडिएट की पढ़ाई पूरी की। सन १९६६ में उन्होंने मुंबई के जे.जे. स्कूल ऑफ फाइन आर्ट्स से चित्रकला में डिप्लोमा की डिग्री प्राप्त किया ।
 चित्रा का विवाह संघर्षमय परिस्थितियों में हुआ। उनका विवाह अवध नारायण मुद्गल के साथ हुआ जो कि एक प्रेम विवाह था। अवध नारायण ब्राह्मण थे और चित्रा जी ठाकुर, इसीलिए चित्रा के पिता व परिवार वालों को यह विवाह मंजूर नहीं था। अतएव विवाहोपरांत चित्रा जी को अपना घर तक छोड़ना पड़ा। बाद में ससुराल में भी आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। पति अवध नारायण ने कविता, कहानिय्ााँ लिखना छोड़कर एजेंसियों में विज्ञापन लिखना शुरू किया और चित्रा भी अनुवाद का काम करने लगीं ।
चित्राजी का एक बेटा राजीव और बेटी अपर्णा है। बेटा राजीव भी साहित्य में रुचि रखता है। एक बार एक कार दुर्घटना में बेटी और दामाद की मृत्यु ने चित्रा जी के हृदय को झकझोर दिया,जिसकी याद करके आज भी उनकी आँखें आँसुओं से भर जाती हैं। चित्रा जी कहती हैं- ‘मैं समाज की हर युवा लड़कियों में अपनी ही लड़की देखती हूँ जो अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत है।’  
   
चित्राजी की साहित्यिक यात्रा सन् १९६४ से शुरू हुई। उन्होंने अनेक पत्र-पत्रिकाओं के लिए कहानी, लेख, रिपोर्ट, कविता, समाचार आदि का लेखन किया जो ‘धर्मयुग’, ‘हंस’, ‘रसरंग’, ‘पराग’, ‘सबरंग’, ‘माधुरी’, ‘सारिका’, ‘जनसत्ता’, ‘नवभारत टाइम्स’ आदि में निरंतर प्रकाशित होता रहा। शुरू में पत्र-पत्रिकाओं में लेखन कार्य करते समय विशेष कर कहानी लेखन के लिए तो उनको अपने ही परिवार वालों से बहुत संघर्ष करना पड़ा। इस बात की जानकारी उनके अपने शब्दों में देखने को मिलती है-‘बाकी सारी दुनिया पर लिखो पर खानदान की ओर अपनी उँगली कभी नहीं उठनी चाहिए, वरना....परिणाम बहुत बुरा होगा।’
चित्राजी ने अपने सृजन कार्य में कथा साहित्य पर विशेष बल दिया है। उनका कहना है कि अपने चारों ओर फैले अन्याय, शोषण, अत्याचार, अमानवीयता आदि का खुला प्रतिवाद करने के लिए कथा साहित्य ही एक सशक्त माध्यम है। यही कारण है कि उनके कथा साहित्य में व्यवस्था का क्रूर, अमानवीय और जनविरोधी चरित्र बार-बार उभर कर सामने आता है।
चित्राजी ने ‘आवां’, ‘गिलिगडु’, ‘एक ज़मीन अपनी’, ‘दि क्रसिड़’ आदि उपन्यास लिखे हैं। ‘एक काली एक सफेद’ नामक उपन्यास भी  प्रकाशित हुआ है। उन्होंने ‘माधवी कन्नगी’, ‘मनीमैखले’, ‘जीवन चिंतामनी’ नामक बाल उपन्यास भी लिखे हैं। चित्राजी ने गुजराती, मराठी, अंग्रेज़ी, पंजाबी, आसामी तथा तमिल भाषाओँ से कहानियों का हिन्दी में अनुवाद भी किया है। उनकी ‘गुजरात की श्रेष्ठ व्यंग्य कथाएँ’ नामक पुस्तक बहुचर्चित है।
चित्राजी के ‘जहर ठहरा हुआ’, ‘लाक्षागृह’, ‘अपनी वापसी’, ‘इस इमाम में’, ‘ग्यारह लंबी कहानियाँ’, ‘जंगदब बाबू गाँव आ रहे हैं’, ‘चर्चित कहानियाँ’, ‘मामला आगे बढ़ेगा अभी’, ‘जीनावर’, ‘केंचुल’, ‘भूख’, ‘बयान’, ‘लपटें’, ‘आदि-अनादि (३ भाग) आदि कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। चित्राजी ने ‘असफल दाम्पत्य की कहानियाँ’,‘टूटे परिवारों की कहानी’, ‘दूसरी औरत की कहानी’,‘भीगी हुई रात’,‘पुरस्कृत कहानियाँ’,‘देह दहेरी’, ‘मुन्शी प्रेमचन्द की कहानियाँ’ आदि पुस्तकों का संपादन भी किया है। इसके अतिरिक्त उन्होंने नाटक, शिक्षा संस्थानों में पढ़ाने के लिए साहित्य, दूरदर्शन में कई धारावाहिक सीरियल का निर्माण,फिल्म निर्माण में योगदान आदि सभी में अपनी कार्यकुशलता दिखाई है। चित्राजी ने भारतीय नारी को बहुत निकटता से देखा है। उनका यह मानना है कि भारतीय समाज में नारी का स्थान हमेशा दोयम दर्जे का रहा है। चित्राजी इस स्थिति को तोडना चाहती हैं। उनका संकल्प स्त्री को दोयम दर्जे की स्थिति को समाप्त करके भारतीय समाज में उसे पुरुष के बराबर का दर्जा दिलाना है। यही मूल स्वर उनके कथा साहित्य में बार-बार उद्घाटित होता है कि नारी को उसके मूल अधिकार मिलना चाहिए। यही चित्राजी का हिन्दी साहित्य के लिए प्रदेय है।
चित्रा की कहानियों को पढ़कर यह पता चलता है कि ज्यादा-से-ज्यादा वह नारी की अस्तित्वहीनता `स्व' की पहचान स्त्री विमर्श आदि को उद्घाटित करती हैं। परित्यक्त, विधवा, अशिक्षित, अकेलेपन से कुंठित नारी मनोव्यथा आदि का चित्रण उनकी कहानियों में आधिक पाया जाता है। शहरों ग्रामीण किसी भी अंचल से संबंधित तथा शिक्षित अशिक्षित, निम्न, मध्य, उच्च वर्ग ऐसी सभी स्तर की नारियों की त्रासदी का बखान उनके साहित्य की उपज है। नारी समस्या को लेकर लेखिका अधिक संवेदनशील होती दिखायी देती हैं। इसलिए वह नारी-चेतना की पक्षधर है।
        चित्रा की कहानियों की यह विशेषता है कि हर कहानी नये संकल्प, विचार तथा बदलते नीतिमूल्यों के साथ चलती है। हर कहानी एक जमीन को प्रस्थापित करती है। स्त्री की `स्व' की पहचान, सशक्तीकरण राजनीतिक दो मुहाँपन आदि को अंकित कर पाठकों को विचार करने के लिए मजबूर करती है। चाहे वो `प्रेतयोनि' की `नीतू' हो या `लकडबग्धा' की `पछाहवाली' एक नई धरातल पर कहानी अंकित करती हैं। इस प्रकार चित्रा के विचार, चिंतन में सुधारवादी दृष्टिकोण पाया जाता है।
चित्रा के व्यक्तित्व का और एक पहलू यह है कि स्वभाव से वह जितनी कठोर, विद्रोही हैं उतनी ही उनमें मृदुता, वात्सल्यता की गहरी छाप दिखाई देती है। महाविद्यालयीन जीवन से ही चित्रा ने समाज सेवा में जुट गई। `जागरण', `स्वाधार' जैसी संस्था में महिलाओं के स्वावलंबन के लिए लड़ती रही हैं। `कामगार आघाडी' की वह सक्रिय कार्यकर्ता रही हैं। इससे उनकी व्यापक मानवतावादी दृष्टि अंकित होती है।
चित्रा जितनी संवेदनशील है उतनी ही संघर्षशील भी है। परिवारवालों के विरोध के पश्चात् भी उन्होंने अवध जी से ही विवाह किया। विवाह के पश्चात् महलों की चकाचौंध से विपरीत उन्होंने मुंबई की चाल म्ों भी बिताये। इस प्रकार वह दृढनिश्चयी थी। चित्रा के पिताजी ने भी कई बार उन्हें अलग करने की कोशिश की लेकिन सामंति विचारधारा के पिंजरे से वह पूरी तरह छूट चुकी थी। इस प्रकार उन्होंने अभी तक का सफर आत्माभिमान के साथ करती आई है। चित्रा मुदगल जी को अनेक महत्वपूर्ण पुरस्कारों और सम्मानों से अलंकृत किया जा चुका है ।
उन्हें अब तक निम्नलिखित सम्मान प्राप्त हुए हैं-
१. सन् १९८९ में हिंदी अकादमी द्वारा कहानी संग्रह ‘इस हमाम में’ के लिए साहित्यिक कृति पुरस्कार प्रदान किया गया।
२. सन् १९८७ में हिंदी अकादमी, दिल्ली द्वारा ‘जंगल का राज’ (बाल कथा संग्रह) के लिए बाल साहित्य कृति पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
३. सन् १९८७ में बिहार राजभाषा विभाग द्वारा ‘ग्यारह लंबी कहानियाँ’ के लिए राजा राधिका रमण प्रसाद पुरस्कार दिया गया।
४. इसी कृति ‘ग्यारह लंबी कहानियाँ’ के लिए सन् १९८७ में ही बिहार राजभाषा विभाग द्वारा ‘फणिश्वरनाथ रेणु साहित्य पुरस्कार’ से भी सम्मानित किया गया।
५. सन् १९८६ में राष्ट्रीय एकता और सद्भावना के लिए प्रेक्षा सम्मान प्राप्त हुआ।
६. सन् १९९३ में ‘सर्वहारा आर्ट्स’ संस्था द्वारा साहित्य सम्मान से अलंकृत किया गया।
७. सहस्त्राब्दी का पहला अंतरराष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान (यू.के.) उपन्यास ‘आवां’ के लिए प्रदान किया गया।
८. साहित्य भूषण सम्मान से भी सम्मानित किया गया।
९. कोलकाता स्थित विकास फाउंडेशन द्वारा प्रदत्त विदुला सम्मान से भी उन्हें गौरवान्वित किया गया।
१०. सन् २००२ में मध्य प्रदेश साहित्य द्वारा उपन्यास ‘आवां’ के लिए बीरसिंह देव सम्मान प्रदान किया गया।
११. सन् २००३ में के. के. विदुला फाउंडेशन द्वारा उपन्यास ‘आवां’ के लिए प्रतिष्ठित व्यास सम्मान दिया गया।
१२. सन् २००७ में पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज, चंडीगढ़ के पूर्व छात्रों द्वारा ‘कल्पना चावला अवार्ड’ से सम्मानित किया गया।
     
 हिंदी साहित्य की विख्यात लेखिका चित्रा मुद्गल एक श्रेष्ठ और सशक्त कथा साहित्यकार के रूप में प्रतिष्ठित हैं। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व का अवलोकन करने पर स्पष्ट होता है कि उनके जीवन के विविध आयाम उनके साहित्य में प्रतिबिंबित होते हैं। उनका व्यक्तित्व सरल होते हुए भी अत्यंत विशिष्ट है। उनकी समृद्ध जीवन दृष्टि उनके सफल और सार्थक जीवन का प्रमाण है। उनकी कहानियाँ और उपन्यास समाज की वास्तविकता और उसकी पीड़ादायक स्थितियों का सजीव चित्रण प्रस्तुत करते हैं। उनके व्यक्तित्व की तरह ही उनका साहित्य भी अनेक आयामों को उद्घाटित करता है। व्यापक अनुभवों के कारण उनके लेखन में परिवेश का यथार्थ चित्रण जीवंत रूप में सामने आता है। उनकी संवेदनशीलता, मानवतावादी दृष्टिकोण, अहंकारहीनता और सुधारवादी विचारधारा ने उन्हें हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दिलाई है। ‘स्वधार’ और ‘जागरण’ जैसी संस्थाओं से जुड़ाव के कारण नारी चेतना और स्त्री विमर्श का सशक्त चित्रण उनके उपन्यास ‘आवां’ में विशेष रूप से दिखाई देता है। उनका बहुआयामी व्यक्तित्व पाठकों को आकर्षित करता है और प्रभावित भी करता है। इस प्रकार साठोत्तरी महिला लेखिकाओं में चित्रा मुद्गल का व्यक्तित्व और कृतित्व विशेष रूप से उल्लेखनीय और प्रेरणादायक है।
प्रो. डॉ. दिनेशकुमार

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