एकात्मता के पुजारी-पं.दीनदयाल उपाध्याय

यह आलेख Deendayal Upadhyaya के एकात्म मानववाद, संगठन शक्ति, नैतिक मूल्यों और मानव कल्याण संबंधी विचारों का विश्लेषण करता है। वर्तमान समाज में दिशाहीनता, नैतिक पतन और मानसिक अवसाद जैसी समस्याओं के बीच दीनदयाल उपाध्याय जी के विचार मानवता को सही दिशा प्रदान करते हैं। लेख में उनके जीवन संघर्ष, ईमानदारी, अंत्योदय दृष्टिकोण तथा मानव समाज को एक व्यापक परिवार मानने की भावना को रेखांकित किया गया है। उनके सिद्धांत व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के समन्वित विकास पर आधारित हैं तथा आज भी भारतीय चिंतन के महत्वपूर्ण मार्गदर्शक बने हुए हैं।

May 15, 2026 - 15:49
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एकात्मता के पुजारी-पं.दीनदयाल उपाध्याय
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 हमारे जीवन में अनेक प्रकार के भय हैं, मोह हैं और अनेक अस्पष्ट अवधारणाएं हैं। करणीय व अकारणीय, कर्त्तव्य व त्याज्य के बीच चुनाव करते समय अकसर हम किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो जाते हैं, ठीक वैसे ही जैसे महाभारत में कुरुक्षेत्र की रणभूमि में अर्जुन की हो गई थी। यह स्थिति किसी एक व्यक्ति की नहीं वरन एक विशाल जन समुदाय की है। अन्यथा क्या कारण है कि देश की स्वतंत्रता के ७८ वर्ष पूरे होने के बाद भी भौतिक जगत व तकनीक में नित नए कीर्तिमान स्थापित करने के बाद भी हमें आए दिन समाज में अनेक विसंगतियां देखने को मिलती हैं? हमें गर्व है कि हम भारतीय हैं। हमारे पास एक विशाल जन समूह की शक्ति है जो शिक्षित भी है। दुःख केवल यह है कि इसका एक बड़ा वर्ग दिशाहीनता का शिकार है, विलासिता में अपना जीवन को रहा है या मानसिक अवसाद का शिकार हो रहा है। ऐसी स्थिति में महती आवश्यकता है एक ऐसे प्रेरणा स्रोत की, एक दिग्दर्शक की, जो दिग्भ्रान्त जनमानस को संगठित कर सके, सही दिशा दिखा सके, उनकी प्रेरणा बन सके। ऐसे विषम समय में हमारी दृष्टि जाती है पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी की ओर जो सदेह हमारे बीच उपस्थित न होते हुए भी अपने साथ कर्मों व शिक्षाओं द्वारा हमारा मार्गदर्शन कर रहे हैं और सदा करते रहेंगे। 

संगठन की शक्ति से भला कौन परिचित नहीं। हम सब ने अपने बचपन में बहुत सी कहानियां पढ़ी हैं। आपको वह कहानी भी याद होगी जिसमें एक शिकारी ने मासूम पक्षियों को फंसाने के लिए दाना डालकर जाल बिछाया था। वह जानता था कि दाना खाने के लालच में पक्षी वहां पर जरूर आएंगे और वह उनको पकड़ने में सफल हो जाएगा। आंशिक रूप से वह अपनी योजना में सफल हो भी गया मगर कुशल नेतृत्व की विवेक दृष्टि व संगठन की ताकत के दम पर वह पक्षी समूह जाल के ले उड़ा और जा पहुंचा अपने मित्र मूषक के पास; जिसने देखते ही देखते जाल को कुतर कर अपने साथी पक्षियों को शिकारी की कैद से मुक्त कर दिया।
केवल कथा कहानियों में ही नहीं, हम वास्तविक जीवन में भी संगठन की शक्ति के चमत्कारिक परिणाम देखते हैं। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के एकात्मवाद का यह आधार भी है। वे कहते हैं- निसंदेह हमारा जीवन अनेक प्रकार की विविधताओं से भरा हुआ है किंतु उसके मूल में निहित एकता को खोज निकालने का प्रयास हमने सदैव किया है और यह प्रयास पूर्णतया वैज्ञानिक है।

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कई बार हम अपने घर में कुछ कीमती वस्तुएं कहीं भी रखकर भूल जाते हैं। जरूरत के समय न मिलने पर परेशान भी होते ही हैं। कई बनते हुए कार्य इस कारण से बिगड़ जाते हैं। यही स्थिति आज मानव समुदाय की भी है। हमारे बेशकीमती नैतिक मूल्यों की अमूल्य धरोहर कहीं विलुप्त होती जा रही है। मानव की मानव के प्रति एक निःस्वार्थ निष्ठा की भावना कहीं न कहीं कम हुई है। यह नितांत आवश्यक है कि समय रहते संगठित होकर इस दिशा में कार्य किया जाए। हमारे आदर्श, हमारे अवतार, हमारा सत्साहित्य इस कार्य में हमारा मददगार है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ऐसे ही आदर्श चरित्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं। आपका जीवन काफी कष्टपूर्ण रहा। छोटी-सी उम्र में ही माता-पिता का साया सिर से उठ गया जिसने संघर्षों को बहुत अधिक बढ़ा दिया था। आपकी शिक्षा-दीक्षा भी ऐसी ही विषम परिस्थितियों में हुई। तब भी ध्येय के प्रति लगन, निष्ठा व ईमानदारी आपमें बचपन से ही थी। आपके बचपन की ऐसी ही एक घटना मैं यहां उद्धृत कर रही हूं।
विद्यार्थी काल में आगरा में नानाजी देशमुख और दीनदयाल उपाध्याय जी साथ-साथ रहते थे। एक दिन सुबह-सवेरे वे दोनों मिलकर सब्जी खरीदने के लिए चले गए। वहां जाकर उन्होंने दो पैसे की सब्जी खरीदी। वह सस्ता जमाना था। आज हमें इस बात पर हंसी आ सकती हैं मगर तब एक आने, एक पैसे में भी बहुत कुछ खरीदा जा सकता था। खैर, सब्जी खरीद कर जब वे दोनों घर लौटे तब दीनदयाल जी का ध्यान एक बात की तरफ गया और अचानक वह बोले,'यह तो बड़ी गड़बड़ हो गई। मेरी जेब में चार पैसे थे जिनमें से एक सिक्का खोटा था। लगता है वही सिक्का गलती से मैं सब्जी वाली को दे आया हूं। नानाजी देशमुख बोले- अब क्या करें? 'चलो वापस आकर उसे उसके पैसे देकर आते हैं। वरना उस गरीब का तो बहुत नुकसान हो जाएगा।' कहकर वह नानाजी के साथ वापिस सब्जीवाली के पास गए। उसे पूरा विवरण बताया तब वह बोली, `इतने सारे सिक्कों में से मैं तुम्हारा खोटा सिक्का नहीं ढूंढ सकती। ऐसा करो तुम लौट जाओ। जो हुआ, सो हुआ। कोई बात नहीं।' मगर दीनदयाल जी नहीं माने। बोले, 'हमें अपने सारे सिक्के दे दो। हम ढूंढ लेंगे।' सब्जी वाली मान गई। तब दोनों ने मिलकर सारे सिक्कों में से ढूंढ कर वह खोटा सिक्का निकाला, उसे बदलकर सही सिक्का सब्जीवाली को दिया। तब जाकर उन्हें चैन आया। और बदले में क्या मिला ? उस गरीब की आत्मा से निकली ढेर सारी दुआएं और आशीर्वाद।
ऐसे ही न जाने कितने खोटे सिक्के हम सब अपनी जेब में लेकर घूमते हैं और जाने-अनजाने अपने मित्रों,परिचितों या अजनबियों को दे दिया करते हैं। कोई दूसरा हमें बताए कि हमारा सिक्का खोटा है तो हमें बुरा लगता है मगर पंडितजी के आदर्शों पर चलते हुए हम खुद ही अपने खोटे सिक्कों को अलग कर दें तो कितने ही योग्य और मासूम लोगों को उस हानि से बचा सकते हैं जो हमारी छोटी-छोटी लापरवाहियों के कारण हो सकती है। यदि प्रत्येक व्यक्ति इस दिशा में ध्यान दे और इस हेतु श्रम भी करे तो यह कोई कठिन कार्य भी नहीं। यह श्रम करने को हम तभी तत्पर होंगे जब हम एकात्मवादी होंगे व अन्य प्राणी के दुःख को भी अपना दुःख समझेंगे।

 पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के एकात्म मानववाद के सिद्धांत के अनुसार - संपूर्ण सृष्टि एक चैतन्य शक्ति से निर्मित हुई है। समस्त प्राणियों, पशु-पक्षियों, पेड़-पौधों और हम मानवों में उसी चेतना की शक्ति प्रवाहमान हो रही है। हमारा निर्माण भी इसी से हुआ है और हम संचालित भी इसी के द्वारा होते हैं। इसी चेतन शक्ति का एक अंश हम सबके भीतर मौजूद है जिसे हम आत्मा कहते हैं। इसी नाते हम सब मिलकर एक वृहद परिवार का हिस्सा हैं। इसी नाते हम सब को एक दूसरे का सम्मान करना चाहिए। व्यक्ति जब जन्म लेता है तब वह केवल स्वयं को जानता है। धीरे-धीरे वह अपने परिवार के सदस्यों, समाज, जाति और क्रमिक रूप से राज्य व राष्ट्र से और फिर संपूर्ण विश्व व ब्रह्मांड से अपना जुड़ाव महसूस करता है। कोई भी व्यक्ति जो कोई कार्य करता है वह केवल उसी तक सीमित नहीं रहता वरन ब्रह्मांड के सभी स्तर प्रभावित होते हैं। अतएव यह आवश्यक है कि व्यक्ति अपने व्यक्तिगत स्तर पर किसी भी कार्य को करने से पूर्व इस बात का विचार अवश्य करे कि उसके कार्य द्वारा संपूर्ण विश्व में मानवता किस प्रकार प्रभावित होगी। क्या हमारे कार्य मानव कल्याण की दिशा में होंगे अथवा मानवता की त्रासदी का कारण बनेंगे, यह प्रथम विचारणीय है।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय राष्ट्रीय जीवन दर्शन के निर्माता थे। उनका उद्देश्य स्वतंत्र देश के पुनर्निर्माण के लिए विशुद्ध भारतीय तत्त्व दृष्टि प्रदान करना था। उन्होंने भारत की सनातन विचारधारा को युगानुकूल रूप में प्रस्तुत करते हुए एकात्म मानववाद की विचारधारा दी। उन्हें जनसंघ की आर्थिक नीति का रचनाकार भी माना जाता है। आप पत्रकार व चिंतक होने के साथ-साथ एक लेखक भी थे। आपने अनेक पत्र-पत्रिकाओं एवं पुस्तकों के माध्यम से हिंदी साहित्य को अपना अमूल्य योगदान भी दिया। पंडित दीनदयाल जी के विशाल साहित्य में से कुछ कृतियां हैं: जगद्गुरु शंकराचार्य,सम्राट चंद्रगुप्त,राष्ट्रीय चिंतन,भारतीय अर्थनीति का अवमूल्यन,एकात्म मानववाद,राष्ट्रीय जीवन की दिशा व राजनीतिक डायरी। दीनदयालजी के एकात्म मानववाद व जगद्गुरु शंकराचार्य जी के अद्वैतवाद में बहुत समानता दिखाई देती है।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का संपूर्ण जीवन चरित्र उनके द्वारा मानवता के हित में किए गए कार्य, उनके द्वारा रचा गया संपूर्ण वाङ्मय,ये सभी मील के पत्थर हैं जो मानवता के पथ प्रदर्शक सदा रहेंगे। हमारे माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी ने पंडित जी के आदर्शों को सम्मान देते हुए अनेक योजनाएं भी प्रारंभ की हैं जो उनके एकात्म मानवदर्शन और अंत्योदय दृष्टिकोण के अनुरूप है। अंत्योदय का अर्थ है-समाज के सबसे अंतिम स्तर पर खड़े व्यक्ति के जीवन स्तर को ऊपर उठाना। हम सभी `व्यक्ति से समष्टि' की यात्रा करते हुए दीनदयाल उपाध्याय जी के आदर्शों के अनुरूप अपने जीवन को बनाने का प्रयास करें, यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।  

गीता रस्तोगी 'गीतांजलि' 

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