सूरज ढल रहा था और लंदन शहर पर कोहरे की चादर गहरी होती जा रही थी। १९०७ की उस ठंडी शाम को, हाइड पार्क के एक कोने में भारतीयों और यूरोपीय लोगों का एक छोटा समूह इकट्ठा हुआ था। उनके चेहरों पर एक प्रकार की जिज्ञासा और थोड़ा डर था। समूह के मध्य में एक चमकदार, साड़ी पहने महिला खड़ी थी। उसका नाम भीकाजी कामा था।
भीकाजी एक असामान्य महिला थीं। एक धनी पारसी परिवार में जन्मी, उन्होंने उत्कृष्ट शिक्षा प्राप्त की थी। बचपन से ही उनमें अपने देश के प्रति प्रेम और समाज में व्याप्त असमानता के प्रति तीव्र आक्रोश था। शादी के बाद उन्होंने खुद को समाज सेवा के लिए समर्पित कर दिया। लेकिन, उन्हें जल्द ही यह एहसास हो गया कि अकेले समाज सेवा से भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्त नहीं कराया जा सकता।
उन्होंने भारत को स्वतंत्रता दिलाने के लिए विदेश में रहते हुए क्रांति का रास्ता चुना। वह लंदन में ‘इंडिया हाउस’ के माध्यम से भारतीय क्रांतिकारियों से जुड़ी थीं। वह श्यामजी कृष्ण वर्मा और विनायक दामोदर सावरकर जैसे देशभक्तों की मित्र बनीं और उनके विचारों ने उन्हें और मजबूत किया।
भीकाजी सोराबजी पटेल का जन्म २४ सितम्बर १८६१ को मुम्बई शहर के एक संपन्न घर में हुआ था। एक प्रतिष्ठित पारसी परिवार में जन्मे उनके पिता सोराबजी पटेल एक सफल व्यवसायी थे। भीकाजी का बचपन शहर के समृद्ध वातावरण में सुरक्षित बीता। उनकी शिक्षा एलेक्जेंड्रा गर्ल्स नेटिव इंस्टीट्यूट में हुई, जहां उसने अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा प्राप्त की और दुनिया के बारे में उनका दृष्टिकोण व्यापक हो गया। वह छोटी उम्र से ही बुद्धिमान थीं और उनके दिल में देशभक्ति की ज्वाला धधकती थी।
१८८५ में भीकाजी ने रुस्तम कामा से विवाह किया। यद्यपि उनका वैवाहिक जीवन पारंपरिक था, फिर भीकाजी की महत्वाकांक्षाएं घर की चारदीवारी तक सीमित रहने को तैयार नहीं थीं। शीघ्र ही, १८८६ में, मुम्बई में प्लेग की महामारी फैल गयी। शहर में मौत का सिलसिला शुरू हो गया और लोगों में भय का माहौल पैदा हो गया। ऐसी स्थिति में भीकाजी कामा ने स्वयं को समर्पित कर दिया। वे प्लेग के रोगियों की सेवा करती थीं और उनका दर्द कम करने की कोशिश करती थीं। वे दिन-रात मरीजों की सेवा में लगी रहती थीं, उन्हें सहयोग देती थीं।
मरीजों की सेवा करते समय भीकाजी भी प्लेग की चपेट में आ गईं। वे मृत्यु के द्वार तक पहुंच गई थीं, लेकिन अपनी इच्छाशक्ति और मजबूत प्रतिरक्षा के कारण वे प्लेग पर विजय प्राप्त कर जीवित बच गईं। डॉक्टर ने उन्हें आराम करने और शारीरिक आराम के लिए लंदन जाने की सलाह दी। भीकाजी १९०२ में लंदन पहुंच गईं, लेकिन उनका मन शांत नहीं था। लंदन में उनकी मुलाकात पंडित श्यामजी कृष्ण वर्मा, लाला हरदयाल और दादाभाई नौरोजी जैसे क्रांतिकारी विचारकों से हुई। इस मुलाकात ने उनके जीवन को एक नई दिशा दी। उन्होंने दादाभाई नौरोजी के साथ सचिव के रूप में काम किया, जिससे उन्हें भारतीय राजनीति और ब्रिटिश नीतियों की जानकारी मिली।
लंदन में रहते हुए भीकाजी कामा ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रूप से भाग लेना शुरू कर दिया। उन्होंने कई बैठकों और विरोध प्रदर्शनों में भाग लिया और अपने भाषणों से लोगों को जागरूक किया। उनकी आवाज लंदन की सड़कों तक गूंज उठी, जिससे भारतीय स्वतंत्रता की मांग और मजबूत हो गई। भीकाजी कामा ने भारतीय स्वतंत्रता का संदेश न केवल ब्रिटेन में, बल्कि प्रâांस, जर्मनी और अमेरिका में भी पहुंचाया। उन्होंने कई अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में भाग लिया और भारत की स्वतंत्रता की वकालत की। उनके ओजस्वी भाषणों और उनकी देशभक्ति को देखकर कई विदेशी नागरिक भी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सहयोग देने के लिए तैयार हो गये।
वर्ष १९०७। यूरोपीय महाद्वीप पर बड़ी उथल-पुथल चल रही थी। औद्योगिक क्रांति के कारण दुनिया तेजी से बदल रही थी और इसका असर भारत पर भी पड़ रहा था। ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीयों को कई समस्याओं का सामना करना पड़ा। ऐसी स्थिति में कुछ देशभक्तों ने विदेश जाकर भारत की स्वतंत्रता के लिए प्रयास किया। ऐसी ही एक प्रतिभाशाली और साहसी महिला हैं भीकाजी कामा।
अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन २२ अगस्त १९०७ को जर्मनी के स्टटगार्ट शहर में आयोजित किया गया था। दुनिया भर के समाजवादी विचारक और कार्यकर्ता एक साथ आये थे। इस सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व भीकाजी कामा ने किया। उनका उद्देश्य भारत की स्वतंत्रता की आवाज को दुनिया तक पहुंचाना था। सम्मेलन स्थल पर सुबह से ही चहल-पहल चल रही थी। विभिन्न देशों के प्रतिनिधि अपनी-अपनी विचारधाराओं और समस्याओं पर चर्चा कर रहे थे। माहौल गंभीर और विचारशील था। ठीक उसी समय, भीकाजी कामा आत्मविश्वास से पोडियम पर चढ़ गईं। उनके हाथ में तिरंगा झंडा था- भारत का झंडा!
इस सम्मेलन में भीकाजी कामा ने भारत का राष्ट्रीय ध्वज फहराया। यह क्षण भारत के इतिहास में महत्वपूर्ण था। उन्होंने जो झंडा फहराया वह तिरंगा था, जिसमें हरा, पीला और लाल रंग शामिल था। इस ध्वज पर देवनागरी लिपि में ‘वन्दे मातरम’ लिखा हुआ था।
उन्होंने यह झंडा अकेले नहीं बनाया। इसे तीन लोगों ने तैयार किया थारू स्वातंत्र्यवीर सावरकर, पंडित श्यामजी कृष्ण वर्मा और भीकाजी कामा। झंडे पर तीन रंग थेरू हरा, पीला और लाल। हरा रंग उत्साह और समृद्धि का प्रतीक है, पीला रंग विजय का प्रतीक है और लाल रंग शक्ति और बलिदान का प्रतीक है। हरे रंग की पट्टी पर आठ कमल के फूल थे, जो उस समय भारत के आठ राज्यों का प्रतिनिधित्व करते थे। लाल पट्टी में सूर्य और चंद्रमा अंकित थे, जो भारत की प्राचीन संस्कृति और स्थायी अस्तित्व का प्रतीक थे। ध्वज के मध्य में देवनागरी लिपि में ‘वंदे मातरम’ लिखा था, जिसका अर्थ है ‘मैं अपनी मातृभूमि को सलाम करता हूँ’।
भीकाजी कामा ने ध्वज फहराया और श्रोताओं को संबोधित करना शुरू किया। उनकी आवाज आत्मविश्वास से भरी और जोशपूर्ण थी। उन्होंने कहा, ‘आज मैं आपके सामने अपने स्वतंत्र भारत का तिरंगा झंडा फहरा रही हूं। यह ध्वज उन बहादुर और निडर लोगों का प्रतीक है, जिन्होंने अपनी मातृभूमि के लिए अपना सब कुछ बलिदान कर दिया। यह ध्वज बलिदान, बहादुरी और देशभक्ति का प्रतीक है।’
उन्होंने आगे कहा, ‘यदि इस सम्मेलन में उपस्थित आप लोग खुद को स्वतंत्रता प्रेमी कहते हैं, तो स्वतंत्र भारत के प्रतीक इस तिरंगे को नमन करें, जिसे मैं आपका विरोध करते हुए यहां फहरा रही हूं!’
उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में भारत ब्रिटिश शासन के अधीन कष्ट झेल रहा था। १८५७ के स्वतंत्रता संग्राम की बुझी हुई ज्वाला को पुनरू प्रज्वलित करने के लिए अनेक देशभक्त अपने प्राणों की आहुति दे रहे थे। मैडम भीकाजी कामा इन स्वतंत्रता सेनानियों में से एक थीं।
मई १९०७, लंदन. सावरकर ने ‘इंडिया हाउस’ में १८५७ के स्वतंत्रता संग्राम के स्वर्ण जयंती समारोह का आयोजन किया था। सावरकर ने उस विद्रोह की सराहना की, जिसे ब्रिटिश सरकार ने महज ‘सैनिकों का विद्रोह’ कह कर दबा दिया था और इसे ‘भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम’ बताया। इसी ‘इंडिया हाउस’ में सावरकर ने ‘१८५७ का स्वतंत्रता संग्राम’ नामक पुस्तक लिखी थी। इस पुस्तक के प्रकाशन में मैडम कामा की महत्वपूर्ण भूमिका रही। नासिक में क्रांतिकारी अनंत कन्हेरे ने जिला कलेक्टर जैक्सन की हत्या कर दी। अंग्रेजों ने सावरकर पर हत्या के लिए लंदन से भेजी गई बंदूक का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया और उन्हें गिरफ्तार कर लिया। सावरकर को ‘एसएस मौर्य’ जहाज पर भारत लाया जा रहा था। जब जहाज प्रâांस के मार्सेलिस बंदरगाह पर खड़ा था, तो सावरकर ने शौचालय के रास्ते समुद्र में छलांग लगा दी। योजना यह थी कि तट पर पहुंचते ही उन्हें अगवा कर लिया जाएगा। हालाँकि, मैडम कामा और वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय के पहुंचने से पहले ही ब्रिटिश सैनिकों ने सावरकर को पकड़ लिया और उनकी योजना विफल हो गई।
जब मैडम कामा को सावरकर की गिरफ्तारी की खबर मिली तो वे बहुत दुखी हुईं। लेकिन वे हतोत्साहित नहीं हैं। उन्होंने तुरंत मार्सेलिस के मेयर जीन जोरे से संपर्क किया और उन्हें पूरी कहानी बताई। उन्होंने जोरे से दृढ़तापूर्वक कहा, ‘ब्रिटिश पुलिस द्वारा प्रâांसीसी धरती पर सावरकर की गिरफ्तारी प्रâांस का अपमान है।’ उनके प्रयासों के कारण ही यह समाचार पेरिस के समाचार पत्र ‘ले टैन’ में प्रकाशित हुआ। सावरकर की अवैध गिरफ्तारी की खबर दुनिया भर में फैल गई और ब्रिटिश सरकार को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदनामी का सामना करना पड़ा।
मैडम कामा ने स्थिति का आकलन किया। वह जानती थी कि ब्रिटिश सरकार सावरकर पर कठोर मुकदमा चलाएगी। उन्होंने तुरंत मुंबई स्थित वकील जोसेफ बैपटिस्टा को एक टेलीग्राम भेजकर सावरकर से मिलने का अनुरोध किया। इसके बाद मैडम कामा स्वयं पेरिस स्थित ब्रिटिश दूतावास पहुंचीं और ब्रिटिश राजदूत को लिखित बयान दिया। इसमें उन्होंने साफ लिखा था, ‘पिस्तौल भारत भेजने की जिम्मेदारी सावरकर की नहीं, मेरी है। मैंने ही चतुर्भुज अमीन के साथ मिलकर वह पिस्तौल भारत भेजी थी।’ यह मैडम कामा के साहस, धैर्य और देशभक्ति का एक महान उदाहरण था।
इस घटना के बाद मैडम कामा स्वतंत्रता संग्राम में और अधिक सक्रिय हो गईं। उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लिए समर्थन जुटाने हेतु यूरोप और अमेरिका की यात्रा की। उन्होंने कई सभाओं और सम्मेलनों में भाषण दिए, लोगों को भारत में ब्रिटिश शासन के अत्याचारों के बारे में बताया और उनसे भारत को स्वतंत्रता दिलाने में मदद करने की अपील की।
भीकाजी कामा ने ‘वन्दे मातरम’ नामक समाचार पत्र शुरू किया। इस समाचार पत्र के माध्यम से उन्होंने विदेशों में भारतीय क्रांतिकारियों के विचारों को पहुंचाया। उन्होंने ब्रिटिश सरकार की कड़ी आलोचना की और उसकी अन्यायपूर्ण नीतियों को उजागर किया। ‘वंदे मातरम’ समाचार पत्र ने विदेशों में भारतीयों में देशभक्ति की भावना जागृत की तथा उन्हें स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया।
वर्ष १९०९, पेरिस। बाहर ताजी हवा की खुशबू और प्रकृति के ठंडे रंग थे। इस यूरोपीय शहर में विद्रोह हुआ था, जो वहां की शांति के लिए खतरा था। मैडम कामा, जो अपने सामाजिक सुधार और स्वतंत्रता आंदोलन के लिए जानी जाती थीं, के हृदय में एक तीव्र जुनून था। उन्होंने शांत रहने की कोशिश की, क्योंकि उनका जीवन इसी पर निर्भर था, लेकिन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की स्मृति लगातार उनव्ाâे दिमाग में घूमती रही। उसके विचार वहाँ उमड़ रहे थे। मदनलाल ढींगरा, एक अन्य योद्धा जो ब्रिटिश राजा की प्रतिकृति बना रहा था, ने लंदन में कर्जन वाइली की गोली मारकर हत्या कर दी। उस घटना ने भारत में क्रांतिकारी गतिविधियों में एक नई ऊर्जा का संचार किया था। इन सब बातों में कामा का दिमाग तेजी से घूम रहा था। वह अपनी पत्रिका के लिए ‘मदन तलवार’ नाम का उपयोग करने जा रही थीं, जिसे उन्होंने ढींगरा की स्मृति को समर्पित करने का निर्णय लिया।
इस पेरिसियन कैफे में, जहां उन्हें साथी क्रांतिकारियों के आंदोलन का नेतृत्व करने की प्रेरणा मिली थी, उन्होंने सोचा कि कैसे अपने विचारों और संघर्षों को दूसरों तक पहुंचाया जाए। उन्होंने खुद से पूछा, ‘हम दुनिया भर के अन्य क्रांतिकारियों को कैसे प्रेरित कर सकते हैं?’
उसने तुरंत अपने विचार कागज पर उतारने शुरू कर दिये। उन्होंने लिखा, ‘भारत की आजादी के लिए आंदोलन चल रहा है, यह अभी तक रुका नहीं है। भारत के लिए अपना जीवन बलिदान करने वाले मदनलाल ढींगरा का स्थान सदैव हमारे दिलों में रहेगा।’और उसी क्षण, उसके मन में एक विचार आया। उन्होंने निर्णय लिया कि अब समय आ गया है कि अपनी आवाज को व्यापक स्तर पर उठाया जाए। कामा एक प्रेरणादायक नेता बन गईं और उन्होंने अपनी पत्रिका का पहला अंक प्रकाशित किया। अपने लेखों में उन्होंने न केवल क्रांतिकारियों की कहानियां बताईं, बल्कि भारत के लोगों से स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए एकजुट होने का आह्वान भी किया।
१९१० में मैडम कामा पेरिस में अपने घर में थीं और नई भावनाओं का अनुभव कर रही थीं। वह भारत में क्रांतिकारियों को मदद के लिए पत्र लिखते-लिखते थक गयी थीं। वह जानती थीं कि लंदन में जो कुछ भी हो रहा है, वह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को गति देगा।
प्रथम विश्व युद्ध छिड़ने के बाद भीकाजी कामा ने स्वयं को पेरिस के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने भारतीय सैनिकों के लिए सहायता एकत्र की और घायल सैनिकों की सेवा की। उनके काम को देखकर कई लोग उनकी सहायता के लिए आगे आए और सैनिकों के लिए आवश्यक सुविधाएं प्रदान करने के लिए एकजुट हुए।
भीकाजी कामा ने होमरूल आंदोलन में सक्रिय भाग लिया और ‘स्वराज्य’ की मांग की। उन्होंने कई स्थानों पर भाषण दिए और लोगों को स्वराज्य का अर्थ समझाया। उनके प्रभावशाली भाषणों ने कई लोगों को होम रूल आंदोलन में शामिल होने के लिए प्रेरित किया और उन्हें स्वशासन के लिए लड़ने के लिए प्रेरित किया।
मैडम कामा १९३५ में भारत लौट आईं और अपना शेष जीवन समाज सेवा में बिताया। १३ अगस्त १९३६ को ७४ वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। मैडम कामा ने अपना जीवन भारत की स्वतंत्रता के लिए समर्पित कर दिया। वह एक महान देशभक्त, साहसी महिला और समर्पित सामाजिक कार्यकर्ता थीं। भारतीय इतिहास में उनके योगदान को सदैव याद रखा जाएगा। वे सिर्फ एक व्यक्ति नहीं थीं, वे एक विचार थीं, एक प्रेरणा थीं, जिन्होंने कई पीढ़ियों को देश की सेवा करने के लिए प्रोत्साहित किया।
भीकाजी कामा का जीवन संघर्षपूर्ण था। उन्होंने विदेश में रहते हुए भी भारत की स्वतंत्रता के लिए अथक प्रयास किया। उनका योगदान भारतीय इतिहास में सदैव अमर रहेगा। वह एक महान देशभक्त, सामाजिक कार्यकर्ता और क्रांतिकारी थीं।
डाॅ. प्रमिला वर्मा