वसीयत बनाम नसीहत
यह भावपूर्ण लेख जीवन के 71वें वसंत पर खड़े एक संवेदनशील मनुष्य की आत्मस्वीकृति और अनुभवों की विरासत है। लेखक अपने उत्तराधिकारियों को धन-दौलत या संपत्ति नहीं, बल्कि संस्कार, सद्भाव, संवेदना, मानवता और जीवन मूल्यों की अमूल्य पूंजी सौंपना चाहता है। लेख में जीवन की नश्वरता, मानवीय रिश्तों की गरिमा, आध्यात्मिक चेतना और सद्कर्मों के महत्व को अत्यंत मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
इस २४ फरवरी को ७१ वाँ वसंत पार कर रहा हूँ। अवतरण भी वसंत ऋतु में ही हुआ है। वसंत की यह अविरल लंबी यात्रा `बस अंत' के कगार पर पहुंच चुकी है । अगले पड़ाव पर प्रस्थान के पूर्व विरासत की निशानी बतौर कुछ वसीयत उत्तराधिकारियों को सौंपने का ख्याल कई बार मन में आता है। नियति ने धन दौलत,जमीन जायजाद की जगह भावना,विचारों,संवेदना और समर्पित श्रद्धा भक्ति की विपुल पूंजी से संपन्न रखना ज्यादा उचित समझा। इसलिए परम्परा अनुसार उत्तराधिकारियों को वसीयत में देने के लिए मेरे पास नसीहत के अलावा कुछ शेष नहीं है। लगता है इससे हितकारी उनके लिए कुछ और हो भी नहीं सकता। मुझे इस संदर्भ में अपने पिता एवं चाचा की उक्ति याद आती है। जो वो अक्सर कहा करते थे कि अच्छा हुआ उनके पिता (मेरे बाबा) कोई धन सम्पत्ति जमीन जायजाद नहीं छोड़ गये जिसके कारण भाइयों के प्रेम व्यवहार में कभी विवाद और मतभेद आड़े नहीं आये। उनकी उसी परम्परा का अनुगामी मैं अक्सर कहा करता हूँ कि मुझे अपने माँ बाप से विरासत में सिर्फ संस्कार ही मिले हैं। वही मेरी अनमोल पूंजी है कोई बड़ी से बड़ी संपत्ति धन दौलत जायजाद से उनका मुकाबला नहीं हो सकता। अब मैंने पीढ़ीगत परम्परा का पालन करते हुए समय पर `वसीयत में नसीहत' का उपहार अपने उत्तराधिकारियों को सौंपने का यह निर्णय अपने ७१ वें वसंत की बेला में लिया है। निर्णय तो ले लिया पर समझ नहीं आ रहा कैसे कहाँ से शुरुआत करूं? क्योंकि बदलते सांस्कृतिक परिवेश में नसीहत शब्द इतना बेमानी हो गया है कि कोई लेना नहीं चाहता। नसीहत देने वाले हर कदम पर मिल जायेंगे। खैर लेने और देने से ज्यादा समझने और समझकर अपनाने की बात है। जिसे मेरे उत्तराधिकारी मेरी वसीयत में नसीहत की मान्यता दे सकते हैं। यह मेरे बाद उनके विवेक और स्वेच्छा का विषय होगा। यहां बस एक इशारे की प्रस्तावना तुलसीदास जी की इन पंक्तियों से करना चाहूंगा।
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`बड़ें भाग मानुष तनु पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा।।
साधन धाम मोच्छ कर द्वारा। पाइ न जेहिं परलोक सँवारा।।
अर्थ: बहुत भाग्य से यह मनुष्य शरीर मिलता है, जिसे सभी ग्रंथों ने देवताओं के लिए भी दुर्लभ बताया है। `यह शरीर साधना का घर और मोक्ष का द्वार है, इसे पाकर भी जिसने सद्कर्म सद्भावना और सद्विचार के साथ ईश्वर की उपासना नहीं किया, उसने अपना परलोक नहीं सँवारा और अपना सबसे बड़ा अवसर खो दिया'। उपसंहार में उल्लेख करना चाहूंगा कि वसीयत धन सम्पत्ति और पूंजी की होती है इसलिए इसलिए नसीहत में भी इसका कुछ उल्लेख होना चाहिए। जिसे मैं स्व नीरज जी की इन पंक्तियों से उल्लेखित कर के साथ मेरी कथित वसीयत का समापन करना चाहूंगा।
`नीरज से बढ़कर और धनी कौन है यहां,
उसके जिगर में पीर है सारे जहान की...!
सच में किसी की मदद के लिए आगे आये हाथों का कद हमेशा प्रार्थना के लिए जुड़े हाथों से बहुत बड़ा होता है । आशा है वे सभी सब कुछ समझ जावेंगे जिन्हें मुखातिब कर मैंने यह लेख सृजन किया है ।.
अशोक श्रीवास्तव
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