चारदीवारी के पार

यह कहानी सीमा नाम की एक ऐसी स्त्री की है, जो समाज, रिश्तों और अपेक्षाओं की अदृश्य चारदीवारी में स्वयं को खो चुकी थी। हर भूमिका में स्वयं को परखते-परखते वह यह मान बैठी थी कि वह कभी पर्याप्त नहीं हो सकती। लेकिन एक दिन आत्ममंथन के क्षण में उसे एहसास होता है कि रिश्तों को निभाने के लिए स्वयं को मिटा देना आवश्यक नहीं। वह अपने भीतर आत्मसम्मान का एक नया द्वार खोलती है और पहली बार स्वयं को पूर्ण रूप में स्वीकार करती है। यह कथा हर उस स्त्री की आवाज़ है, जो दूसरों को निभाते-निभाते स्वयं को भूल जाती है।

May 28, 2026 - 14:00
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चारदीवारी के पार
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नाम जैसा ‘सीमा’ पर अंतर्मन से वह सीमित नहीं थी ।
पर सीमा क़ैद थी, किसी कारागार की कठोर दीवारों में नहीं,
बल्कि अपने ही अंतर्मन की अदृश्य चारदीवारी में। वहाँ रोशनी तो थी पर मन में अंधकार , एक ऐसा अंधकार जिसनें सीमा को डरा कर रखा था ।
उसकी यह चारदीवारी ईंट-पत्थर से नहीं बनी थी, यह बनी थी अपेक्षाओं से,कर्तव्यों से,और उन अनगिनत वाक्यों से,
जो जीवन भर उसके अस्तित्व पर लिखे जाते रहे , तुम्हें ऐसा करना चाहिएष्ठ.तुम्हें ऐसा होना चाहिएष्ठतुम्हें यह सीखना चाहिए, तुम्हें यह समझना चाहिएष्ठ इत्यादि इत्यादि।

घूम फिर कर हर क्षण वह स्वयं को कठघरे में खड़ा पाती।   
कभी एक बेटी के रूप में, कभी बहन के रूप में, कभी पत्नी के रूप में, कभी बहू, कभी माँ के  हर भूमिका में, हर नजरिए में
वह स्वयं को परखती,और हर बार निर्णय एक ही निकलता
वह पर्याप्त नहीं थी। फिर स्वयं से सवाल भी करती ‘क्या सच में मैं पर्याप्त नहीं?

सीमा को लगता,संसार पहाड़ की तरह अडिग है,
और रिश्ते समुद्र की तरह अथाह जिसमें उतरते ही उसकी साँसें कभी अटकने लगती, कभी बोझिल होने लगती थीं।

वह जितना संभालने का प्रयास करती, रिश्ते उतने ही उसकी मुट्ठियों से रेत की तरह फिसल जाते, मानो वे थामे नहीं जा सकते, सिर्फ निभाए जाते हों और निभाने की कीमत वह स्वयं बन चुकी थी।

धीरे-धीरे उसके भीतर एक धारणा पनपने लगी और अंदर ही अंदर जड़ पकड़ने लगी कि असफलता उसका स्वभाव है, और आत्मविस्मरण उसका भाग्य।

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फिर एक दिन,जीवन ने उसे क्षण भर का विराम दिया।
कोई चमत्कार नहीं, कोई बड़ा संकेत नहीं बस उसने पहली बार
अपने जीवन को दूर से देखा, जैसे उसने सब चीज़ों को बिंदु जैसा बनाकर स्वयं को एक बड़े गोले में रखा। 

और तभी उसने समझा रिश्ते गणित के सूत्र नहीं हैं,जहाँ हर उत्तर एक-सा हो, वे भिन्नप्रकार के व्यंजन हैं।हर व्यक्ति की रुचि भिन्न,हर अपेक्षा का स्वाद अलग।

कोई मिठास चाहता है, कोई चटपटापन, कोई तीखापन, कोई केवल अपनी पसंद का नमक।

और सीमा, एक ही निस्वार्थ हाँडी में सबके स्वाद पकाने का दंभ पाले बैठी थी। उस दिन वह टूटी नहीं। उस दिन वह खुली । खुली अपने सोच के दायरे से जहां उसने जंग लगाकर बैठी थी सालों से।

उसने जाना कि स्वयं को निरंतर कुचलकर किसी को संतुष्ट नहीं किया जा सकता। और जो स्त्री स्वयं को ही खो दे, वह किसी रिश्ते को क्या बचा पाएगी?

उसने साहस के साथ अपने मन की चारदीवारी पर एक द्वार अंकित किया।

उस द्वार पर कोई अलंकरण नहीं, कोई क्षमा-याचना नहीं थी। सिर्फ एक स्पष्ट वाक्य, यहाँ से आत्मसम्मान प्रवेश करता है।

अब सीमा सबके लिए उपलब्ध है, पर आत्मविसर्जन की कीमत पर नहीं। वह रिश्ते निभाती है, पर अपने अस्तित्व को गिरवी रखकर नहीं।

चारदीवारी आज भी है, पर अब वह कारागार नहीं, वह उसकी मर्यादा है और उसी मर्यादा के भीतर सीमा ने स्वयं को पहली बार पूर्ण पाया , स्वयं को चारदीवारी में क़ैद नहीं , चारदीवारी के पार पाया और सीमा ने सबसे पहले स्वयं का स्थान रखा फिर ही उसके आगे कुछ....

अंकिता साहिबा

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