भारत के धार्मिक एवं सामाजिक पुनरुद्धारकर्ता के रुप में स्वामी विवेकानन्द
स्वामी विवेकानंद भारत माता की गोद जन्मे एक ऐसे युगपुरुष हैं, जिन्होंने भारत के गौरव को विश्व के कोने-कोने तक पंहुचाने का कार्य किया है। भारत की इस महान विभूति को वैश्विक स्तर पर उनके उपदेशों, शिक्षाओं, आध्यात्मिक चेतनाओं तथा सामाजिक पुनरुद्धार के लिए जाना जाता है। यद्यपि लोग सामान्यतया स्वामी विवेकानंद जी को एक संत व हिन्दू धर्म पुनर्जागरणकर्ता के रुप में मानते हों, किन्तु वास्तविक रुप में स्वामी जी हिन्दू धर्म के महान मर्मज्ञ होने के साथ ही साथ एक श्रेष्ठ समाज सुधारक भी हुए हैं।
उननीसवीं सदी (१२ जनवरी सन १८६३ ई०) के जिस काल खण्ड में स्वामी विवेकानंद (नरेन्द्र नाथ) जी का प्रादुर्भाव हुआ, उस समय भारतीय समाज एक संक्रमण काल से गुजर रहा था। देश के नागरिक ब्रिटिस मिशनरियों के मकड़जाल और अंग्रेजों की औपनिवेसिक मंशा के साथ ही साथ दमनकारी नीतियों के चंगुल में जीवन तथा भारत के आध्यात्मिक अस्तित्व को बनाये रखने हेतु जद्दोजहद करने के लिए विवश थे। समाज को विभिन्न प्रकार की भ्रांतियां एवं भटकाव की स्थितियां घेरे हुए थी और सामाजिक ताना-बाना अंधविश्वास, आडंबर व कुरीतियों की जंजीरों से मुक्त होने के लिए छटपटा रहा था। इस विकट काल में भारत के धार्मिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक पुनरुद्धारकर्ता के रुप में स्वामी विवेकानन्द जी ने किस प्रकार अपना योगदान किया, संक्षेप में इसे नीचे दिए वर्णन से समझा जा सकता है-
समाज को शिक्षित करने में स्वामी विवेकानंद जी का योगदान-
स्वामी विवेकानंद जी भरतीय समाज को सबसे पहले शिक्षित करना चाहते थे, उनका लक्ष्य लोगों को चरित्र निर्माण और व्यक्तित्व के सर्वागींण विकास की शिक्षा प्रदान करना था। शिक्षा से संबधित अपनी अवधारणा में उन्होने स्पष्ट किया है कि शिक्षा मनुष्य के उन गुणों एवं कौशलों का विकास है, जो मनुष्य में पहले से ही अन्तर्निहित हैं। अर्थात हर व्यक्ति में योग्यताओं व कौशलों का अपार भण्डार अन्तर्निहित है, आवश्यकता सिर्फ उनकी पहचान कर उपयोग में लाने की है। स्वामी जी का सपना राष्ट्र को आत्मनिर्भर बनाने का था और शिक्षा के बिना राष्ट्र को आत्मनिर्भर बनाना एक कल्पना मात्र थी। स्वामी विवेकानंद जी ने जहां एक ओर भारतीय समाज को जागरुक कर सामाजिक उन्नति की तरफ ध्यान देने के लिए प्रेरित करने का कार्य किया, वहीं दूसरी ओर शिक्षा को सर्वसुलभ बनाने के लिए अभूतपूर्व प्रयास किए, जिससे कि समाज में व्याप्त अंधविश्वास, गरीबी और अज्ञानता को दूर किया जा सके। साथ ही उन्होनें महिला शिक्षा का पुरजोर पक्ष लिया और महिलाओं का सशक्तिकरण कर उन्हे समाज की मुख्यधारा में लाने और सम्मानजनक जीवन के लिए विभिन्न सुधारात्मक कार्यों को अंजाम दिया।
मानवता के निस्वार्थ सेवक- स्वामी विवेकानंद जी का सम्पूर्ण जीवन मानवता की सेवा एवं उत्थान के लिए समर्पित रहा है। देश के कोने-कोने तक भ्रमण के दौरान लोगों की गरीबी, लाचारी और कष्टों को देखकर उनका मन द्रवित हो उठा और वे लोगों को इन हालातों से ऊपर उठाने के लिए कृत संकल्प हुए। असहाय, दीन-दुखियों और गरीबों के सशक्तिकरण व उत्थान के लिए उन्हाने अपना मूल मन्त्र `नर सेवा, नारायण सेवा‘ के रुप में प्रस्तुत किया और अपने उपदेशों में इस बात पर विशेष बल दिया कि दीन-दुखियों और गरीबों की निस्काम भाव से की गई सेवा ही सच्ची ईश्वर सेवा है। उनके द्वारा समाज के पिछड़े और कमजोर वर्ग के स्वाभिान और आत्मबल को जगाने का आहृान किया गया जिससे कि वे आत्मनिर्भर होकर सम्मानजनक जीवन यापन कर सकें तथा स्वयं के साथ ही साथ समाज के लिए योगदान करने में भी सफल हो सकें। मानवता की सेवा के उद्देश्य से स्वामी विवेकानंद जी के द्वारा स्थापित की गई संस्था राम कृष्ण मिशन आज भी स्वामी जी के सपनों एवं विचारों के अनुरुप सामाजिक उत्थान तथा मानवता की सेवा के क्षेत्र में अपना अतुलनीय योगदान कर रही है। स्वामी विवेकानंद जी भारत ही नहीं बल्कि समस्त वैश्विक मानवता के लिए एक श्रेष्ठ तथा निस्वार्थ सेवक सावित हुए हैं।
समाज के सच्चे उत्थान एवं पुनरुद्धारकर्ता-
अशिक्षा तथा अज्ञानता के कारण भारतीय समाज में तरह-तरह की कुरीतियां एवं सामाजिक कुप्रथाएं प्रचलित थी। अधिकांश लोग अज्ञानतावश अपने मनुष्य होने तक के बोध को नहीं समझ पा रहे थे और वे जैसे-तैसे अपनी उदरपूर्ति करने की समझ तक ही सीमित रहकर जीवन यापन के लिए विवश थे। समाज की दशाओं के उन्मूलन के लिए स्वामी विवेकानंद जी ने वृहद स्तर पर सामाजिक शिक्षा एवं जन जागरुकता पर विशेष बल दिया और समाज में स्वयं को जानो का संदेश संचारित किया। मेरा स्वयं का भी मानना है कि लोगों के खोये हुए आत्मज्ञान तथा सोई हुई शक्ति को जगाए बिना किसी समृद्ध समाज की कल्पना करना एक भ्रम मात्र ही है। यद्यपि सामाजिक बुराइयों व कुप्रथाओं के उन्मूलन तथा समाजिक उत्थान के लिए स्वामी विवेकानंद जी से पूर्व ब्रह्म समाज के संस्थापक राजा राम मोहन राय, ईश्वर चंद्र विद्यासागर एवं स्वामी दयानंद सरस्वती जैसे महान समाज सुधारकों के द्वारा भी विभिन्न कार्य किए जा चुके थे अथवा किए जा रहे थे लेकिन स्वाम्ाी विवेकानंद की समाज सेवा का तरीका इन सभी से बिल्कुल अलग रहा है, स्वामी विवेकानंद जी की सामाज सेवा किसी एक सामाजिक कुरीती तक सीमित नहीें रही बल्कि उन्होने समाज के समूल उत्थान, सशक्तिकरण तथा मानव के सर्वांगंीण विकास के साथ ही साथ स्वाभिमान एंव गौरव की अनंत अनुभूति के लिए समाज का मार्ग प्रशस्त करने का कार्य किया है।
महान दार्शनिक एवं आध्यात्मिक राष्ट्रवाद के प्रवर्तक- स्वामी विवेकानंद सही मायने में महान दार्शनिक होने साथ ही साथ भारत के आध्यात्मिक राष्ट्रवाद के प्रवर्तक भी थे। उन्होने न केवल भारतीय आध्यात्मिकता और धर्म-शास्त्रों में उल्लिखित बातों को प्रमाणिकता के आधार पर आध्ुानिक विज्ञान के साथ जोड़कर लोगों में हिन्दू धर्म के प्रति आस्था व विश्वास की पुनर्स्थापना की बल्कि देश के नागरिकों में राष्ट्रवाद की नई चेतना जगाकर अपने देश और धर्म की रक्षा के लिए त्याग, समर्पण एवं बलिदान करने की भावना का भी विकास किया। स्वामी विवेकानंद जी ने अपने जीवन को राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता को अक्षुण बनाए रखने के प्रयासों में ही व्यतीत किया है। भारतभूमि में जन्में स्वामी विवेकानंद कोई साधारण मानव नहीं थे, उनके अतुलनीय योगदानों को लेख लिखकर व्यक्त करना असंभव सा प्रतीत होता है। कृतज्ञ राष्ट्र उन्हें धर्म और संस्कृति के पुनरुत्थान तथा राष्ट्र की गरीमा और गौरव को नई पहचान दिलाने के लिए भारत के इतिहास में हमेशा स्मरण किया जाता रहेगा।
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राष्ट्र के नेतृत्वकर्ता एवं युवाओं के आदर्श मार्गदर्शक-
स्वामी विवेकानंद जी राष्ट्र के युवाओं के लिए एक श्रेष्ठ एवं आदर्श मार्गदर्शक हुए हैं। क्योंकि उन्होने युवाओं को अपनी शक्ति, बुद्धि, विवेक एवं कौशलों का उपयोग राष्ट्र के निर्माण, स्वाभिमान तथा गौरव को बढ़ाने के लिए आह्नान किया है। उन्होने युवाओं के चरित्र निर्माण की शिक्षा, राष्ट्रभक्ति व समाज सेवा की भावना पर मुख्य रुप में बल दिया है। क्योंकि वे इस बात को भली-भांति जानते थे कि उत्तम आचरण तथा श्रेष्ठ चरित्र वाले य्रुवा ही राष्ट्र के उत्थान एवं युग परिवर्तनकर्ता सावित हो सकते हैं। युवा ही किसी राष्ट्र के कर्णधार और सुयोग्य नायक होते हैं, उन्ही के दम पर कोई राष्ट्र उन्नति के शिखरों तक पंहुच सकता है। इसलिए युवा जितने सशक्त, सुशिक्षित, कर्मठ, राष्ट्रभक्त तथा आत्मबल से परिपूर्ण होंगे, राष्ट्र उतना ही ताकतवर एवं प्रगति की ओर अग्रसर होगा। स्वामी विवेकानंद जी चाहते थे कि देश का हर युवा युगनिर्माता बने इसी ध्येय से उन्होने केवल भारत ही नहीें अपितु समस्त विश्व के युवाओं का मार्गदर्शन करते हुए ११ सितंबर १८९३ को शिकागो अमेरिका में आयोजित विश्वधर्म सम्मेलन में अपने ओजस्वी तथा ऐतिहासिक संबोधन में भारत की धार्मिक विरासत कठोपनिषद की सूक्ति से प्रेरित अपना एक मन्त्र दिया- `उठो, जागो और तब तक मत रुको, जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।’ ऐसे महान व्यक्तित्व के धनी स्वामी विवेकानंद जी अनंतकाल तक केवल युवाओं के लिए ही नहीं बल्कि संसार के सभी मनुष्यों के आदर्श मार्गदर्शक व प्रेरणापुंज के रुप में कार्य करते रहेंगे।
स्वामी विवेकानंद जी देश के एक ऐसे राष्ट्र नायक थे, जिन्होने तत्कालीन भारतीय समाज के हर पहलू का भली-भांति अध्ययन व अनुभव किया तथा भारत की हर रीति-नीति एवं परिस्थिति को गहराई से जानने व समझने के लिए पूरे देश में जगह-जगह भ्रमण कर लोगों से मिले। देश की परिस्थितियों से रुबरु होने के पश्चात उन्होने समाज के हर तबके एवं वर्ग के लोगों में आत्मचेतना एवं आत्मबल को जगाने का महत्वपूर्ण कार्य किया तथा उन्हें राष्ट्र की उन्नति, स्वाभिमान एवं सशक्तिकरण के कार्य में यथाशक्ति योगदान देने के लिए एकजुट किया। अपनी शिक्षाओं, संबोधनोें तथा उपदेशों के माध्यम से स्वामी विवेकानंद जी के द्वारा देश के नागरिकों को भारत के प्राचीन वैभव को स्मरण कराते हुए अनादि काल से सुविख्यात राष्ट्र की गौरवमयी आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत को पाश्चात्य धर्मों की भ्रमित करने वाली प्रवृतियों से सुरक्षित एवं अक्षुण बनाए रखने के लिए आह्नान किया। स्वामी विवेकानंद जी के जीवन एवं कार्यों के अध्ययन से हमें ज्ञान होता कि वे राष्ट्र के न केवल आध्यात्मिक व धार्मिक संस्कृति के संवाहक तथा पुनर्स्थापक हुए हैं अपितु वे एक ऐसे दिव्य पुरुष थे जिन्होने भारतीय समाज को एक नई दिशा देने का अभूतपूर्व कार्य किया है।
राष्ट्रीय युवा दिवस २०२६ के अवसर पर युगपुरुष स्वामी विवेकानंद जी को हृदय की अनंत गहराईयों से नमन।
डाॅ. नेत्रमणि बडोनी
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