चुनाव
यह कहानी खानापुर गाँव के चुनाव के माध्यम से लोकतंत्र, जागरूकता और जनचेतना की सशक्त तस्वीर प्रस्तुत करती है। जहाँ एक ओर धनबल, बाहुबल और जातिवाद राजनीति को नियंत्रित करने की कोशिश करते हैं, वहीं दूसरी ओर एक साधारण विधवा मजदूर ‘आशा’ और युवा ‘विकास’ लोकतंत्र के वास्तविक अर्थ को जीवंत करते हैं। यह कथा बताती है कि चुनाव केवल सत्ता प्राप्ति का माध्यम नहीं, बल्कि नागरिक चेतना, संविधान और अपने अधिकारों की रक्षा का उत्सव है।
फरवरी का महीना। ठंड का मौसम था। गाँव चारों ओर से कोहरे में समाया था। चुनाव की खबर से सब ओर हलचल मची थी। तहसील का गाँव होते हुए भी खानापुर कोई बड़ा गाँव नहीं था, पर लोकतंत्र के नक़्शे पर उसकी एक छोटी-सी बिंदी थी। चारों ओर फैले खेत, कच्ची पगडंडियाँ, बीचोंबीच पीपल का पुराना पेड़ और उसके नीचे टूटा हुआ चबूतरा। इसी चबूतरे पर हर पाँच साल में लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव उतर आता था, चुनाव। इस बार भी वैसा ही चुनाव का उत्सव होने वाला था। इस बार पिछले साल से कुछ अलग होने वाला था। चुनाव सिर्फ नेताओं का नहीं, लोगों की चेतना का चुनाव बनने वाला था।
मंगलवार के दिन गाँव में सरकारी जीप आयी। उनके आने के बाद ढोल नहीं बजे, पर लोगों को पता चल गया था, नाम जोड़ने-घटाने का काम शुरू हो गया है। पाठशाला के कमरे में मतदान केंद्र अधिकारी विश्वास बैठा था। सरल सीधे कपड़े, मोटी फ़ाइल और चेहरे पर जिम्मेदारी का भार ले के। कतार में खड़ी थी आशा। एक विधवा, खेत मज़दूर। उसका नाम पिछली मतदान सूची से ग़ायब था। आशा ने विश्वास से पूछा ‘मेरा नाम क्यों काट दिया मतदान सूची से?’ विश्वास ने चश्मा ठीक करके थोड़ा रुककर कहा ‘आपका पति मर गया है, शायद...’ उसकी बातों से आशा की आँखें भर आयी। बहते आंसू पोंछते हुए आशा बोल पडी़, ‘पति मरा है, मैं नहीं मरी।’
विकास शहर में पढ़ाई कर खानापुर अपने गाँव वापिस लौटा था। राजनीति विज्ञान में अव्वल नंबर से पास हुआ था। उसके लिए चुनाव सिर्फ मतदान प्रक्रिया नहीं, संविधान की आत्मा थी। उसने देखा, लोगों के नाम कट रहे हैं, उनके मन में डर फैलाया जा रहा है, लोगों में शराब बाँटी जा रही है। गाँव का यह दृश्य उसके लिए डरावना था। बदलते गाँव के माहौल को देखकर विकास ने तय किया, ‘इस बार मैं सिर्फ़ वोट नहीं दूँगा, वोट की रक्षा करूँगा।’
गाँव में प्रत्याशियों के नाम के निवेदन भरना शुरू हुए। गाँव के बड़े दो लोग चुनाव में अपने पैसों के दम पर खड़े हुए थे। पलटू राम और फेंकू राम। पलटू राम के पास पैसों की कमी नहीं थी। उसे अपने पैसों और बाहुबल पर गर्व था। सत्ताधारी दल में होने के कारण उसको अपनी जीत का अंदाजा था। जाति के आधार पर वह चुनाव लड़ना बखूबी जानता था। फेंकू राम विपक्ष दल का था। भाषण देना और वादे करने में उसका कोई हाथ नहीं पकड़ सकता था। आंदोलन और लोगों से वादे करने के कारण उसे गाँव के सभी लोग अच्छे से पहचानते थे। इन बड़े लोगों के बीच चुनाव के लिए गाँव की अनपढ़, विधवा, खेत मजदूर आशा भी चुनाव प्रक्रिया में खड़ी थी। उसको चुनाव में दिलचस्पी नहीं थी। फिर भी विकास और गाँव के युवाओं के आग्रह पर वह चुनाव लड़ने के लिए राजी हुई थी। गाँव के बाकी लोग उसको हँसने लगे थे। उन्हीं हंसी के बीच गाँव का एक व्यक्ति बोला, ‘औरत चुनाव लड़ेगी?’
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तहसील कार्यालय के बाहर नामांकन की भीड़ लगी थी। जुलूस, नारों से पूरा मोहल्ला भरा था। आशा साड़ी में, काँपते हाथों से काग़ज़ थामे खड़ी थी। किसी ने पीछे से फुसफुसाया, ‘नामांकन वापस ले ले, नहीं तो अंजाम बुरा होगा।’ विकास उसके साथ खड़ा था। आशा को धैर्य देते हुए विकास कहता है, ‘डरो मत, संविधान तुम्हारे साथ है।’ नामांकन का काम पूरा हुआ। खानापुर के इतिहास में पहली बार लोकतंत्र ने स्त्री स्वर में अपने दस्तख़त किए थे।
अगले ही दिन गाँव में दो तरह के प्रचार चल रहे थे। एक ओर नोट, शराब, कंबल, तो दूसरी ओर संवाद, सवाल, संविधान। पलटू राम की गाड़ी से नोट बँट रहे थे। लोग नोट लेते भी थे, पर सोचने लगे थे, अगर पलटू राम हार गया तो पैसें वापिस ले सकता है। डराना, धमकाना वह अच्छें से जानता था। आशा पैदल चलती अपना प्रचार कर रही थी। ‘मैं कोई वादा नहीं करती, बस इतना कहती हूँ, आपका वोट आपका है।’ आशा का यही वाक्य पूरे गाँव में गूँजने लगा था।
गाँव में प्रचार के समय जिला अधिकारी, पुलिस, पर्यवेक्षक आए थे। आचार संहिता लागू हुई। पहली बार पलटू राम को रोका गया। ‘आप प्रचार का समय समाप्त होने के बाद प्रचार नहीं कर सकते।’ यह दृश्य गाँव ने पहली बार देखा था। पहिली बार गाँव के लोगों को कानून, पैसों की ताक़त से बड़ा दिखा था।
मतदान के पहिली रात गाँव में अजीब सन्नाटा था। किसी के घर डर, किसी के घर उम्मीद। विकास जाग रहा था। गाँव को बदलना चाहता था। उसी रात उसे सूचना मिली, ‘कुछ लोग फर्जी वोट डालने वाले हैं।’
मतदान के दिन सुबह सात बजे ही मतदान केंद्र खुला। पहली प्रत्याशी थी, आशा। ईवीएम पर उँगली रखकर आशा बोली, ‘ये सिर्फ़ बटन नहीं, मेरी ज़िंदगी है।’ मतदान केंद्र पर बूढ़े लोग, महिलाएँ और पहिली बार मत देनेवाले युवाओं की भीड़ थी। लोकतंत्र में एक-एक करके सभी लोग हिस्सा ले रहे थे। गाँव के लोगों में परिवर्तन की किरण थी।
मतदान केंद्र पर दोपहर में हंगामा शुरू हुआ। कुछ लोग जबरन वोट डालना चाहते थे। इसकी खबर पहले ही विकास को थी। विकास सामने आया। उनका विरोध करने लगा। उनके बीच हाथापाई शुरू हुई। पुलिस आयी। कुछ देर के लिए मतदान रोका गया। सब माहौल शांत होने के बाद फिर से मतदान शुरू हुआ। पहली बार पूरा गाँव देख रहा था, लोकतंत्र लड़कर बचाया जा सकता है।
मतगणना की प्रक्रिया शुरू हुई। इस बार मतदान Dास्सी प्रतिशत होकर गाँव में रिकार्ड हुआ था। आशा रो पड़ी। ‘इतने लोग मुझ पर नहीं, अपने वोट पर भरोसा कर रहे हैं।’ मतगणना टी.वी., रेडियो, मोबाइल पर देखने में गाँव के लोग व्यस्त थें। पहली फेरी में पलटू राम आगे था। दूसरी फेरी में फेंकू राम, तीसरी फेरी में आशा। गाँव की साँसें थमी थीं। गाँव के लोग पहिली बार इतनी दिलचस्पी से चुनाव प्रक्रिया से जुड़े थे। मतदान का परिणाम घोषित हुआ। अंतिम घोषणा हुई, आशा विजयी। गाँव में चारों ओर सन्नाटा छाया था। फिर चारों ओर शोर मचा। किसी ने कहा, ‘ये कैसे हुआ?’ उत्तर साफ़ था, वोट जाग गया था।
चुनाव जीतने के बाद आशा ने शपथ ली, ‘मैं सत्ता नहीं, सेवा करूँगी।’ विकास मुस्कुराया। उसे लगा, ‘लोकतंत्र किताबों से निकलकर गाँव तक आ गया है।’
खानापुर गाँव अब भी गरीब है, पर लोगों में चेतना अमीर हो चुकी है। चुनाव खत्म हो गया था, पर लोकतंत्र की शुरुआत हुई थी।
‘चुनाव’ सिर्फ एक गाँव की कहानी नहीं, बल्कि हर उस नागरिक की कहानी है, जो समझता है, वोट देने से बड़ा काम है, वोट को समझना।
अविनाश दिलीप कांबळे
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