सामर्थ्यवान वह व्यक्ति नहीं है, जिसके पास अपार धन-संपदा, खेत-खलिहान, नौकर-चाकर और जमीन- जायदाद है, जबकि सामर्थ्यवान वह है, जिसमें कुशल नेतृत्व क्षमता विद्यमान हो तथा जिसका व्यक्तित्व प्रभावशाली व आकर्षक है। कुशल नेतृत्व क्षमता के लिए यह आवश्यक है कि वह दूसरों को शिष्टतापूर्वक सुनें, बुद्धिमत्तापूर्वक उत्तर दें व गंभीरता से विचार करें। कहते हैं कि अगर अंधा व्यक्ति अंधे का नेतृत्व करें तो दोनों खाई में ही गिरेंगे। इसका सीधा तात्पर्य है कि नेतृत्ववान को सुलझे हुए विचारों का होना चाहिए। नेतृत्व वह कला है जो उसके व्यक्तित्व में चार चाँद ही नहीं लगाती वरन वह समाज में उसे एक अलग रुतबा भी अता करती है । नेतृत्ववान व्यक्ति जहाँ खड़ा होता है, दस-बीस लोग चुंबकीय आकर्षण की तरह उसकी तरफ खिंचे चले आते हैं तथा उसके इर्द-गिर्द उसे घेरकर खड़े हो जाते हैं। महिलाओं में भी नेतृत्व क्षमता विद्यमान है और वे कई मौकों पर सफल भी हुई है। आज महिलाएँ कई पुरुष बहुल संस्थानों का प्रतिनिधित्व सफलतापूर्वक कर रही हैं। यदि आप नेता है, मंत्री है , समाजसेवी है, अभिनेता है, कलाकार है, मॉडल है, किसी टीम के कप्तान है, किसी संस्थान, एसोसिएट्स अथवा किसी ट्रस्ट के जवाबदेय पदाधिकारी हैं, घर के मुखिया या परिवार के प्रधान है या किसी शासकीय, निजी संस्थान के कोई उच्च अधिकारी है तो आप कई लोगों का नेतृत्व करते हैं अर्थात आप नेतृत्ववान व्यक्ति को श्रेणी में आते हैं। आज नेतृत्व पर भी संकट के बादल मंडरा रहे है। अच्छा नेतृत्व संकटग्रस्त है ।
कुशल नेतृत्व प्रतिष्ठान को नित नई ऊंचाइयों पर पहुंचाता है, वही नेतृत्व हीनता संस्थान को जीर्ण-शीर्ण अवस्था की ओर ले जाती है। एक अच्छा नेता प्रजा का पोषक होता है, जबकि स्वार्थपरक नेता समाज को दीमक की तरह खोखला कर देता है। आज के नेतृत्व पर भी स्वार्थ, ईर्ष्या अहंकार मद, मोह, लोभ हावी है। ऐसे में कुशल नेतृत्व की तलाश हर संस्थान को रहती है। नेतृत्व के गुण आपको आपकी सही मंजिल तक ले जाकर ही छोड़ते हैं।
मदर टेरेसा, महादेवी वर्मा, लता मंगेशकर, पीटी ऊषा, ऐश्वर्या रॉय, सुष्मिता सेन, हरनाज संधू, रानी लक्ष्मी बाई, अहिल्या बाई, साइना नेहवाल,किरण बेदी,अरुणिमा सिन्हा, मैरी कॉम, भक्ति शर्मा, पूजा ठाकुर, सुभद्रा कुमारी चौहान, मन्नू भंडारी, दीपिका पल्लिकल, रश्मि बंसल, तानिया सचदेव, शकुंतला देवी, सावित्री बाई, सिंधुताई सपकाल, इरोम शर्मिला, लक्ष्मी सहगल, मधुबाला, इंदिरा गांधी, नीरजा, कल्पना चावला, तीजनबाई, चित्रा सिंह ये ऐसे सुविख्यात नाम हैं, जिनके कुशल नेतृत्व में देश ने कला, संगीत, विज्ञान, लोक कला, समाज, पत्रकारिता, लेखन, मॉडलिंग, प्रशासन, अध्यात्म, आर्थिक, राजनीतिक, सूचना प्रौद्योगिकी, खेल, शौर्य, वीरता, पराक्रम सहित विभिन्न क्षेत्रों में सफलता के नए व उच्च आयाम स्थापित किए है। इनकी सफलता से देश का नाम रोशन हुआ व हमने विश्व मंच पर अपनी एक अलग विशिष्ट पहचान बनाई। सफल प्रबंधन व कुशल नेतृत्व के लिए नेतृत्व के इन गुणों का होना नितांत आवश्यक है ।
१. तर्क और निर्णय क्षमता
सफल प्रबंधक के लिए यह आवश्यक है कि वह तर्क करने में शक्तिशाली हो तथा त्वरित निर्णय लेने का उसमें सामर्थ्य हो। कोई बात सही है या नहीं, कोई योजना उचित है या नहीं, कोई निर्णय न्यायसंगत है या नहीं, उसमें स्वविवेक से निर्णय लेने का सामर्थ्य होना चाहिए ।
२. सहयोगी व मार्गदर्शी नेचर
नेतृत्ववान महिलाएँ किसी भी काम को छोटा अथवा बड़ा नहीं समझें, बस काम करता रहें तथा आवश्यकतानुसार अपने अधीनस्थों का सहयोग, उत्साहवर्द्धन व मार्गदर्शन भी करता रहें। अच्छे काम के लिए प्रेरित करें व कोई अच्छा काम करने के उपरांत उसकी प्रशंसा करना भी नहीं भूलें। उसका काम हो सही रास्ता बताना।
३. निष्पक्षता तथा न्यायसंगतता
सफलता की पहली सीढ़ी है, निष्पक्षता से न्याय। उसके साथ प्रतिष्ठान के कई लोगों की भावनाएँ व विश्वास जुड़ा होता है, उसे चाहिए कि वह भाई-भतीजावाद व यारी-दोस्ती से दूर रहकर पूर्ण निष्पक्ष व न्याय के साथ निर्णय करें, जिससे कि उस पर पक्षपात के आरोप न लग सकें ।
४. चापलूसी व चमचागिरी से सावधानी
नेतृत्ववान व्यक्ति सुनें सबकी व करें मन की तथा अपने इर्द-गिर्द पनप रहे कामचोरों, मक्कारों, चापलूसों व चमचों से सदा सावधान रहें क्योंकि ये लोग ही संस्थान का मधुर वातावरण दूषित करते हैं ।
५. दृढ़ इच्छाशक्ति व सेवाभावी
वह जो भी कार्य करें अथवा कोई निर्णय लें उसके पीछे पक्का इरादा व इच्छाशक्ति होनी चाहिए। वह जो भी निर्णय लें सोच विचार कर लें अन्यथा पछताय होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत। उसका व्यक्तित्व सेवाभावी व सहानुभूति से लबरेज होना चाहिए।
६. मुस्कराता चेहरा व मिलनसारिता
एक हंसता मुस्कराता चेहरा सौ मरजों की दवा है। एक मधुर मुस्कान मीलों की थकान चुटकी में दूर कर सकती है। सफल प्रबंधक के लिए जरूरी है कि वह हंसमुख स्वभाव का हो व मिलनसार व्यक्तित्व का हो।
७. प्रयत्नशील व धैर्यवान
नेतृत्ववान व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य से काम लें व निरंतर प्रयत्नशील रहें। पूर्ण ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें व अधिकारों के प्रति सजग रहें।
८. ईमानदार, सामर्थ्यवान व बुद्धिमान
अपने संस्थान वâे प्रति पूर्ण लगन, ईमानदारी से कार्य करते हुए प्रत्येक कार्य में बुद्धि का प्रयोग करते हुए वह संस्थान को होने वाली हानियों से बचा सकता है। काम कितना ही बड़ा व जटिल ही क्यों न हो उसमें उसे आसानी से व आत्मविश्वास के साथ करने का सामर्थ्य होना चाहिए।
९. सकारात्मक सोच व कर्मयोगी
वह मन में नकारात्मक विचारों को त्याग कर सकारात्मक दृष्टिकोण को ही अपनाएँ, सदैव अच्छा सोचें। जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि। कर्म में विश्वास करें व औरों को भी प्रेरित करें। कर्मवान व्यक्ति समाज के लिए प्रेरणापुंज के समान होता है।
१०. सामंजस्य भाव, विनम्रता व स्वस्थता
संस्थान में सभी मिल-जुलकर सौहार्दपूर्ण वातावरण में काम करें, आपसी सामंजस्य बनाकर रखें व ऐसा प्रयास करें कि नियोक्ता व कर्मचारियों के मध्य मधुर संबंध बने रहें। इससे कार्मिकों की कार्यक्षमताओं में वृद्धि होगी। सभी के साथ वह विनम्रतापूर्ण व्यवहार करें तथा वह स्वस्थ भी हो। कहते हैं कि स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन निवास करता है। अच्छे स्वास्थ्य के लिए वह नियमित रूप से व्यायाम, योग, ध्यान, प्राणायाम, सत्संग करे तथा उसकी संगीत व साहित्य में भी रुचि हो ।
११. अवसरवादी व जागरूक
जो समय पर वार करता है, वही मंजिल तक पहुंचता है। संस्थान के हित में उसे समय-समय पर लाभों को भुनाते रहना चाहिए तथा वह जागरुक प्रवृत्ति का हो। क्योंकि सोने वाले के हीरे-मोती भी नहीं बिकते व जागने वाला धूला भी बेचकर मुनाफा कमा जाता है।
१२. समय प्रबंधन
नेतृत्ववान महिलाएँ समय का उचित प्रबंधन कर चलें, क्योंकि कम समय में बहुत सारे काम करना होते हैं। समय के साथ चलें तथा समय की कीमत को पहचान कर आगे बढ़ें।
१३. परिवर्तनशीलता व नवचारिता
परिवर्तन संसार का नियम है परिस्थितियों के अनुसार प्रतिष्ठान की साज सज्जा, कार्यशैली में बदलाव करते रहें। नए - नए प्रयोग कर नवचारिता को बढ़ावा दें। इससे संस्थान में स्वच्छ वातावरण बना रहेगा व कार्यक्षमता में इजाफा भी होगा। किसी शायर की जुबानी-बदला न अपने आपको,जो थे वही रहे, मिलते रहे सभी से मगर अजनबी रहे।
१४. समर्पण व टीम भावना
वह काम के प्रति पूरी तरह समर्पित रहे तथा जरूरत पड़ने पर त्याग करने को भी तत्पर रहे। सभी को साथ लेकर चलें, टीम भावना का विकास करें, क्योंकि संगठन में ही शक्ति है। एक और एक जब साथ होते हैं तो ग्यारह के बराबर होते हैं।
१५. सक्रिय, चतुर व सतर्क
संस्थान में सदा सक्रिय रहकर, दूरदृष्टि रखकर, चतुरता व सतर्कता के साथ काम करें, जिससे कि संभावित हानियों से बचा जा सकें ।
१६. परिश्रमी, उत्साही व आत्मविश्वासी
नेतृत्ववान व्यक्ति मेहनती होना चाहिए, क्योंकि परिश्रम वह चाबी है जो सौभाग्य का दरवाजा खोलती है। वह मन लगाकर पूरी निष्ठा, त्याग, समर्पण,उत्साह व लगन से काम करें वह जो भी काम करे अथवा कोई भी निर्णय ले वह आत्मविश्वास से लबरेज होना चाहिए तथा उसे दूसरों पर भरोसा करना भी आना चाहिए ।
नलिन खोईवाल