किराए के फूल

यह व्यंग्यात्मक लेख विद्यालयों में आयोजित होने वाले वार्षिकोत्सवों की चमक-दमक के पीछे छिपी वास्तविकताओं को उजागर करता है। किराए के फूलों, औपचारिक सम्मान समारोहों और दिखावटी व्यवस्थाओं के माध्यम से लेखक आधुनिक समाज की उस मानसिकता पर प्रहार करता है, जहाँ वास्तविक विकास की अपेक्षा प्रदर्शन और छवि निर्माण को अधिक महत्व दिया जाता है। यह लेख शिक्षा व्यवस्था, सामाजिक दिखावे और संस्थागत संस्कृति पर गहरा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

Jun 4, 2026 - 13:35
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किराए के फूल
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विद्यालय का वार्षिकोत्सव था। वह दिन जब शिक्षा कम और सजावट अधिक पढ़ाई जाती है। सुबह से ही परिसर में असाधारण हलचल थी। जिन दीवारों पर साल भर धूल की परत लोकतंत्र की तरह स्थायी रूप से जमी रहती थी, वे आज अचानक राष्ट्रनिर्माण में सक्रिय दिख रही थीं। मुख्य द्वार पर रंगीन कपड़ों की मेहराब खड़ी कर दी गई थी, मानो ज्ञान स्वयं घोड़े पर बैठकर आने वाला हो। भीतर प्रवेश करते ही दोनों ओर गमलों में सजे फूलों की कतार थी—लाल, पीले, बैंगनी—इतने ताजे, इतने चुस्त, इतने प्रसन्न कि उन्हें देखकर सहज ही संदेह हो जाए कि ये इस विद्यालय की मिट्टी में नहीं पले।

माली रामखिलावन पसीने में डूबा एक-एक गमला सीधा कर रहा था। मैंने पूछ लिया, ‘आज तो बगीचा बहुत खिला हुआ है।’ वह मुस्कुराया, ‘साहब, खिला हुआ नहीं है, किराए पर आया है। अपने वाले तो पिछली गर्मी में ही शहीद हो गए थे।’ उसकी आवाज़ में शिकायत नहीं थी, एक गहरी समझ थी। उसने जैसे अनजाने में पूरी व्यवस्था का चरित्र बता दिया—जो दिख रहा है, वह अपना नहीं है; जो अपना है, वह दिखाने योग्य नहीं समझा जाता।
विद्यालय साल भर जिस तंगी में साँस लेता था, उस पर आज उत्सव का लेप चढ़ा दिया गया था। पुस्तकालय की छत टपकती रहती है, प्रयोगशाला में रसायनों की जगह खाली बोतलें सजती हैं, पर मंच पर लाल कालीन बिछाने में कोई कसर नहीं थी। कारण सरल था—आज मुख्य अतिथि पधार रहे थे। मुख्य अतिथि हमारे समय का सबसे सफल पद है। यह पद योग्यता से नहीं, उपलब्धता से मिलता है। जो हर मंच पर समय पर पहुँच जाए, वही समाज का मार्गदर्शक घोषित हो जाता है।
प्राचार्य महोदय मैदान में ऐसे घूम रहे थे जैसे कोई सेनापति युद्ध से पहले मोर्चा देख रहा हो। वे हर पाँच मिनट पर आदेश दे रहे थे—फूलों की लाइन सीधी रहे, बैनर पर नाम की वर्तनी सही हो, बच्चों की तालियाँ एक साथ बजें। एक अध्यापक ने साहस करके याद दिलाया कि छात्रवृत्ति की सूची अभी तक नहीं आई है। प्राचार्य ने उसे ऐसे देखा जैसे उसने कार्यक्रम की पवित्रता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया हो। ‘आज का दिन सकारात्मकता का है,’ उन्होंने कहा। सकारात्मकता का अर्थ शायद यह था कि असुविधाजनक सच को आज छुट्टी दी जाए।
गेट पर अचानक हलचल हुई। सूचना आई—मुख्य अतिथि की गाड़ी मुड़ चुकी है। जिस उत्साह से यह घोषणा हुई, उससे लगा कि इतिहास का पहिया इसी मोड़ पर रुकने वाला है। गाड़ी रुकी, दरवाज़ा खुला, और वे उतरे—स्थायी मुख्य अतिथि। चेहरा परिचित, मुस्कान अभ्यासयुक्त, चाल में वह आत्मविश्वास जो बार-बार सम्मानित होने से स्वतः आ जाता है। उनके उतरते ही तीन लोग एक साथ आगे बढ़े—एक ने माला पहनाई, दूसरे ने गुलदस्ता थमाया, तीसरे ने कैमरा साध लिया। मुस्कान तुरंत सक्रिय हो गई; वह मुस्कान जो शायद सूट की जेब में तह करके रखी जाती है और आवश्यकता पड़ते ही फैल जाती है।

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मंच पर बैठते ही परिचय-पाठ शुरू हुआ। उन्हें महान शिक्षाविद्, समाजसेवी, चिंतक, मार्गदर्शक, प्रेरणास्रोत बताया गया। परिचय इतना लंबा था कि स्वयं मुख्य अतिथि भी क्षणभर के लिए गंभीर हो गए, मानो सोच रहे हों कि वे इतने बड़े कब हो गए। मंच के पीछे खड़े एक शिक्षक ने धीरे से कहा कि यही सज्जन पिछले सप्ताह पड़ोस के विद्यालय में भी मुख्य अतिथि थे। दूसरे ने जोड़ा कि उनसे पहले वाले कार्यक्रम में भी वे ही थे। लगता था मानो एक ही पुष्पगुच्छ अलग-अलग मंचों पर घूम रहा हो, बस रैपर बदलता रहता हो।
गुलदस्तों का अपना जीवन था। एक गुलदस्ता मुख्य अतिथि को दिया गया, फोटो खिंची, तालियाँ बजीं, और जैसे ही कैमरा नीचे हुआ, वही गुलदस्ता चुपचाप वापस ले लिया गया ताकि अगले विशिष्ट अतिथि को सौंपा जा सके। सम्मान का यह पुनर्चक्रण बड़ी दक्षता से चल रहा था। बजट सीमित था, अतिथि असीमित। फूलों को इससे कोई आपत्ति नहीं थी; वे तो स्वयं किराए पर आए थे, उन्हें स्थायित्व की आदत ही नहीं थी।
भाषण आरंभ हुआ। शब्द वही थे जो हर मंच पर उग आते हैं—विद्यालय मंदिर है, बच्चे देश का भविष्य हैं, नैतिक मूल्यों को बचाना होगा। हर वाक्य के बाद तालियों का संकेत मिलता और बच्चे अपनी ड्यूटी निभाते। मंच के पीछे वही बच्चे समोसे की गिनती पर विवाद कर रहे थे। भविष्य और वर्तमान एक ही मैदान में थे, पर एक को माइक्रोफोन मिला था, दूसरे को प्लेट।
धूप तेज हो चली थी। गमलों के फूल धीरे-धीरे झुकने लगे थे। सुबह डाला गया पानी अब स्मृति बन चुका था। मैंने रामखिलावन से पूछा कि उन्हें पानी क्यों नहीं दिया जा रहा। उसने बताया कि ऊपर से आदेश है—मिट्टी गीली दिखेगी तो फोटो खराब आएगा। सूखी मिट्टी पर खड़े ताजे फूल अधिक आकर्षक लगते हैं। मुझे लगा, यही हमारे समय का सौंदर्यशास्त्र है—सूखापन स्वीकार्य है, बशर्ते ऊपर से रंग बना रहे।
विशिष्ट अतिथियों की संख्या बढ़ती गई और मंच की कुर्सियाँ कम पड़ गईं। समाधान यह निकला कि जो अधिक विशिष्ट हों, उन्हें आगे बैठाया जाए। विशिष्टता का पैमाना अस्पष्ट था, पर सब सहमत थे कि वे कम नहीं हैं। परिचय-पत्र पढ़े जाते रहे, सम्मान दिए जाते रहे, और हर सम्मान के साथ कैमरे की क्लिक सुनाई देती रही। ऐसा लगता था कि पूरा कार्यक्रम स्मृति-चिन्हों और फोटो के लिए आयोजित हुआ है; शिक्षा तो मात्र पृष्ठभूमि है।
कार्यक्रम का चरम बिंदु फोटो सेशन था। अब मंच पर आने का असली कारण पूरा हो रहा था। हर व्यक्ति चाहता था कि उसका चेहरा बैनर के नीचे दर्ज हो जाए। मुस्कानें थोक में बंट रही थीं। एक शिक्षक ने मज़ाक में कहा कि अगर फोटो न खिंचे तो कार्यक्रम मान्य नहीं माना जाएगा। सच यही था—दस्तावेज़ ही वास्तविकता है, अनुभव नहीं।

जैसे ही मुख्य अतिथि की गाड़ी परिसर से बाहर निकली, वातावरण में अचानक ढील आ गई। जो चेहरे अभी तक तने हुए थे, वे ढह गए। कुर्सियाँ हटाई जाने लगीं, बैनर समेटा गया, और गमलों को उठाकर ट्रक में रखा जाने लगा। वे फूल, जो सुबह विद्यालय की शोभा थे, शाम तक फिर नर्सरी की संपत्ति हो गए। एक गमला उठाते समय एक टहनी टूट गई। किसी ने कहा, ‘कोई बात नहीं, किराए का है।’ यह वाक्य हवा में देर तक तैरता रहा।
उस क्षण मुझे लगा कि यह सिर्फ फूलों की कथा नहीं है। यह हमारे समय की सामूहिक मानसिकता है। हम संबंध किराए पर लेते हैं, विद्वान किराए पर बुलाते हैं, संवेदनाएँ किराए पर सजाते हैं। संस्थाएँ अब बगीचे नहीं उगातीं; वे इवेंट मैनेज करती हैं। साल भर जिस मिट्टी में पौधे सूखते रहते हैं, उसी मिट्टी पर एक दिन के लिए बाहर से लाए गए फूल रख दिए जाते हैं ताकि फोटो में हरियाली दिखे।
विद्यालय से बाहर निकलते समय गेट खाली था। रंगीन मेहराब आधी उतर चुकी थी। मैदान पर कुछ पंखुड़ियाँ बिखरी थीं, जो शायद ट्रक में चढ़ते समय गिर गई थीं। वे अब किसी की जिम्मेदारी नहीं थीं। मैंने सोचा, शायद यही असली फूल हैं—जो किराए पर नहीं जाते, जो गिरकर भी सच का रंग छोड़ जाते हैं। बाकी सब तो सजावट है—चमकदार, क्षणिक और पूरी तरह उधार।

समाज अब बगीचा नहीं रहा, वह एक विशाल फूलदान बन गया है। यहाँ लोग पनपते कम हैं, सजाए अधिक जाते हैं। जड़ों की चर्चा उबाऊ मानी जाती है, पंखुड़ियों की फोटो वायरल होती है। और जब सजावट का समय समाप्त हो जाता है, तो सब कुछ वापस अपने-अपने गोदामों में चला जाता है—सम्मान, मुस्कान, और वे किराए के फूल, जिन्हें कभी इस मिट्टी ने अपना कहा ही नहीं।

मुक्ति नाथ मिश्र

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