मानवीय संवेदना,प्रगतिशील विचारधारा के पक्षधर उपन्यासकार- रांगेय राघव

रांगेय राघव आधुनिक हिंदी साहित्य के बहुमुखी प्रतिभा संपन्न रचनाकार थे। उन्होंने कविता, कहानी, उपन्यास, रिपोर्ताज, आलोचना, इतिहास, नाटक और अनुवाद के माध्यम से हिंदी साहित्य को समृद्ध किया। ‘घरौंदा’, ‘मुर्दों का टीला’, ‘कब तक पुकारूँ’ और ‘तूफानों के बीच’ जैसी कृतियों ने उन्हें प्रगतिशील और यथार्थवादी साहित्यकार के रूप में स्थापित किया। मानवीय संवेदना, सामाजिक यथार्थ और ऐतिहासिक चेतना उनकी रचनाओं की प्रमुख विशेषताएँ थीं।

May 11, 2026 - 12:26
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मानवीय संवेदना,प्रगतिशील विचारधारा के पक्षधर उपन्यासकार- रांगेय राघव
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रांगेय राघव आधुनिक हिंदी साहित्य के एक सशक्त रचनाकार हैं। इन्होंने कम उम्र में ही कविता,कहानी, उपन्यास (जैसे-घरौंदा,मुर्दों का टीला, कब तक पुकारूँ),रिपोर्ताज (तूफानों के बीच), आलोचना और अनुवाद के माध्यम से हिंदी साहित्य को समृद्ध किया।वे मानवीय संवेदना, यथार्थ और प्रगतिशील विचारों के पक्षधर थे। रांगेय राघव का जन्म १७ जनवरी १९२३ को आगरा, उत्तर प्रदेश में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री रंगाचार्य और माता का नाम श्रीमती कनक वल्ली था। उनके पिता तमिल और माता कन्नड़ थीं। उनकी पत्नी श्रीमती सुलोचना थीं। इनका मूल नाम तिरुमल्लै नंबाकम वीर राघव आचार्य था, किंतु उन्होंने अपना साहित्यिक नाम रांगेय राघव रखा। इनका परिवार मूल रूप से तिरुपति आंध्र प्रदेश का रहने वाला था। उनके परिवार के लोग काफी पहले मथुरा में आकर बस गए थे और भरतपुर के पास ‘वैर’ नामक स्थान में इनकी जमींदारी थी। ‘वैर’ गाँव के सहज सादे ग्रामीण परिवेश में ही उन्होंने रचनात्मक साहित्य का श्रीगणेश किया।
आगरा के सेंट जॉन्स कॉलेज से १९४४ में बी.ए.पास किया। तत्पश्चात आगरा विश्वविद्यालय से एम. ए.करने के बाद १९४८ में ‘श्री गुरु गोरखनाथ और उनका युग’ विषय पर पीएच.डी.की। वे हिंदी के साथ-साथ तमिल, कन्नड़, ब्रज और संस्कृत भाषा के जानकार थे।
रांगेय राघव की सृजन-यात्रा सर्वप्रथम चित्रकला में प्रस्फुटित हुई। सन १९३६-३७ के आस-पास सबसे पहले उन्होंने कविता के क्षेत्र में कदम रखा और संयोग से उनकी रचनात्मक अभिव्यक्ति का अंत भी मृत्यु पूर्व लिखी गई कविता से ही हुआ। उनका साहित्य-सृजन भले ही कविता से शुरू हुआ किंतु एक गद्य लेखक के रूप में ही उनको प्रतिष्ठा मिली। जब वे साहित्य सृजन कर रहे थे तब देश में स्वतंत्रता संग्राम चल रहा था।ऐसे वातावरण में उन्होंने अनुभव किया कि अपनी मातृभाषा हिंदी के माध्यम से ही देशवासियों के हृदय में देश के प्रति निष्ठा और स्वतंत्रता का संकल्प जगाया जा सकता है। सन १९४६ में प्रकाशित ‘घरौंदा’ उपन्यास के जरिए वे एक प्रगतिशील कथाकार के रूप में चर्चित हुए और एक लंबे समय तक वह प्रगतिशील आंदोलन के प्रमुख सूत्रधार रहे।
         कम उम्र में ही उन्होंने १५० से अधिक पुस्तकों का लेखन किया। सन १९४६ में प्रकाशित ‘घरौंदा’उपन्यास ने प्रगतिशील कथाकार के रूप में पहचान दिलाई। सन १९४८ में प्रकाशित ‘मुर्दों का टीला’ जो कि सिंधु घाटी सभ्यता पर आधारित है, उनकी ख्याति का आधार बना। सन १९५७ में ‘कब तक पुकारूँ’ में एक घुमंतू समुदाय, नट और ठाकुरों के बीच संघर्ष को दर्शाया गया है जिस पर दूरदर्शन धारावाहिक भी बना। ‘तूफानों के बीच’ रिपोर्ताज जो बंगाल के अकाल पर आधारित था, उससे भी उनको काफी ख्याति मिली। उन्होंने शेक्सपियर के नाटकों सहित अंग्रेजी और संस्कृत की रचनाओं का हिंदी में अनुवाद किया ।
        आगरा में जन्मे रांगेय राघव ने हिंदीतर भाषी होते हुए भी हिंदी साहित्य के विभिन्न धरातलों पर युगीन सत्य से उपजा महत्वपूर्ण साहित्य उपलब्ध कराया। उन्होंने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्टभूमि पर जीवनीपरक उपन्यासों का लेखन किया। कहानी के पारंपरिक ढांचे में परिवर्तन करके नवीन कथा प्रयोगों द्वारा उसे मौलिक कलेवर में आयाम दिया। रिपोर्ताज लेखन, जीवन चरितात्मक उपन्यास और महायात्रा गाथा की परंपरा डाली। रांगेय राघव हिंदी के उन विशिष्ट और बहुमुखी प्रतिभा वाले रचनाकारों में से हैं जिन्होंने अल्पायु में ही एक साथ उपन्यासकार, कहानीकार, निबंधकार, आलोचक, नाटककार,कवि, इतिहासकार तथा रिपोर्ताज लेखक के रूप में स्वयं को प्रतिस्थापित किया। रांगेय राघव अपनी छोटी-सी जिंदगी में हिंदी गद्य साहित्य को गहराई और व्यापकता प्रदान की,जिससे वे प्रेमचंद के बाद युग-चेता रचनाकार के रूप में जाने जाते हैं। रांगेय राघव काफ़ी लंबे अरसे तक प्रगतिशील आंदोलनों के प्रमुख सूत्रधार रहे। अपने संक्षिप्त साहित्यिक जीवन में १५० के लगभग साहित्यिक कृतियाँ प्रदान कीं। कविता, कहानी, उपन्यास, आलोचना, इतिहास और कला आदि विषयों से सम्बन्धित इनकी अनेक महत्त्वपूर्ण कृतियाँ इनमें शामिल हैं।
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       १९४४ के बंगाल के अकाल के दिनों में भयंकर विभीषिका से आक्रांत प्रदेश की पैदल यात्रा करके उन्होंने जो रिपोर्ताज लिखे, सर्वप्रथम उन्हीं से हिंदी के अनेक साहित्यकारों का ध्यान डॉ. रांगेय राघव की ओर गया था और जब वे `हंस' में प्रकाशित होने प्रारंभ हुए तो साहित्यिक क्षेत्र में रिपोर्ताज-लेखन की परंपरा-सी चल पड़ी।
       सन१९४६ में जब इनका पहला उपन्यास ‘घरौंदे' प्रकाशित हुआ तो उसने भी लेखन-शैली और कथावस्तु के कारण हिंदी के पाठकों और अध्येताओं को अपनी ओर आकृष्ट किया। आपने ५० से अधिक उपन्यास लिखे। ‘भारती के सपूत', `लोई का ताना', `रत्ना की बात', `देवकी का बेटा', `यशोधरा जीत गई', `लखमा की आँखें', `धूनी और धुआँ’ तथा `मेरी भव बाधा हरो' आदि उपन्यास ऐतिहासिक और मिथिकीय इतिहास पर आधारित हैं, जहाँ इन्होंने भारतेन्दु, कबीर, तुलसी, कृष्ण, बुद्ध, विद्यापति, गोरखनाथ और बिहारी आदि से संबंधित चरित्रों को केंद्र रखा है। आपके अन्य प्रमुख उपन्यासों में `मुर्दों का टीला', ‘सीधा-सादा रास्ता’ और `कब तक पुकारूँ’ हैं।
       अप्ाने साहित्यिक जीवन के पूर्व में आपने कहानियाँ अधिक लिखी थीं; ‘देवदासी', `साम्राज्य का वैभव’, `जीवन के दाने', ‘अधूरी सूरत', `समुद्र के फेन', `अंगारे न बुझे', ‘इंसान पैदा हुआ' और `पाँच गधे’ आदि आपकी कहानियों के संग्रह हैं। ‘गदल' शीर्षक आपकी कहानी हिंदी की सर्वोत्तम कहानियों में से एक है। `तूफ़ानों के बीच' आपका एकमात्र रिपोर्ताज है।
  कविता-लेखन में भी आपकी `अजेय खंडहर', `पिघलते पत्थर', ‘राह के दीपक', `रूप की छाया' और ‘मेधावी' आदि कृतियाँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। नाटक और एकांकी भी आपने बहुत लिखे। आपका `विरूढक' नाटक है और `इंद्र-धनुष' पुस्तक एकांकियों संकलन।
        `आधुनिक हिंदी कविता में प्रेम और शृंगार', `आधुनिक हिंदी कविता में विषय और शैली, `काव्य, कला और शास्त्र', ‘काव्य, यथार्थ और प्रगति’, `समीक्षा और आदर्श', `महाकाव्य विवेचन', `प्रगतिशील साहित्य के मानदंड' और तुलसीदास का कथा-शिल्प' आदि सैद्धांतिकी और आलोचना से संबंधित पुस्तकें हैं। ‘प्राचीन भारतीय परंपरा और `इतिहास' तया `भारतीय-चिन्तन' जैसे आपके ग्रन्थ इतिहास से संबंधित हैं। ‘प्राचीन भारतीय परंपरा और इतिहास' के लिए सन १९५१ में `हरजीमल डालमिया पुरस्कार’ मिला।आपने `शेक्सपीयर' के प्रायः सभी नाटकों का हिंदी में सरल और सुबोध अनुवाद किया। संस्कृत के अमर ग्रन्थों ‘ऋतु संहार', `मेघदूत', `दशकुमार चरित', ‘मृच्छकटिकम' और ‘मुद्राराक्षस’ आदि को भी आपने हिंदी पाठकों के लिए सुलभ किया। `गीत गोविंद’ का आपके द्वारा किया गया अनुवाद भी सराहनीय रहा। 
        रांगेय राघव का विपुल साहित्य उनकी अभूतपूर्व लेखन क्षमता को दर्शाता है। जिनके संदर्भ में कहा जाता रहा है कि ‘जितने समय में कोई पुस्तक पढ़ेगा उतने में वे लिख सकते थे। वस्तुतः उन्हें कृति की रूपरेखा बनाने में समय लगता था, लिखने में नहीं। ‘रांगेय राघव सामान्य जन के ऐसे रचनाकार हैं जो प्रगतिवाद का लेबल चिपकाकर सामान्य जन का दूर बैठे चित्रण नहीं करते, बल्कि उनमें बसकर करते हैं। समाज और इतिहास की यात्रा में वे स्वयं सामान्य जन बन जाते हैं। रांगेय राघव ने वादों के चौखटे से बाहर रहकर सही मायने में प्रगितशील रवैया अपनाते हुए अपनी रचनाधर्मिता से समाज संपृक्ति का बोध कराया। समाज के अंतरंग भावों से अपने रिश्तों की पहचान करवाई। सन् १९४२ में वे मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित दिखे थे, मगर उन्हें वादग्रस्तता से चिढ़ थी। उनकी चिंतन प्रक्रिया गत्यात्मक थी। उन्होंने प्रगतिशील लेखक संघ की सदस्यता ग्रहण करने से इनकार कर दिया, क्योंकि उन्हें उसकी शक्ति और सामर्थ्य पर भरोसा नहीं था। साहित्य में वे न किसी वाद से बँधे, न विधा से। उन्होंने अपने ऊपर मढ़े जा रहे मार्क्सवाद, प्रगतिवाद और यथार्थवाद का विरोध किया। उनका कहना सही था कि उन्होंने न तो प्रयोगवाद और प्रगतिवाद का आश्रय लिया और न प्रगतिवाद के चोले में अपने को यांत्रिक बनाया। उन्होंने केवल इतिहास को, जीवन को, मनुष्य की पीड़ा को और मनुष्य की उस चेतना को, जो अंधकार से जूझने की शक्ति रखती है, उसे ही सत्य माना।
       रांगेय राघव ने जीवन की जटिलतर होती जा रही संरचना में खोए हुए मनुष्य की, मनुष्यत्व की पुनर्रचना का प्रयत्न किया, क्योंकि मनुष्यत्व के छीजने की व्यथा उन्हें बराबर सालती थी। उनकी रचनाएँ समाज को बदलने का दावा नहीं करतीं, लेकिन उनमें बदलाव की आकांक्षा जरूर हैं। इसलिए उनकी रचनाएँ अन्य रचनाकारों की तरह व्यंग्य या प्रहारों में खत्म नहीं होतीं, न ही दार्शनिक टिप्पणियों में समाप्त होती हैं, बल्कि वे मानवीय वस्तु के निर्माण की ओर उद्यत होती हैं और इस मानवीय वस्तु का निर्माण उनके यहाँ परिस्थिति और ऐतिहासिक चेतना के द्वंद्व से होता है। उन्होंने लोक-मंगल से जुड़कर युगीन सत्य को भेदकर मानवीयता को खोजने का प्रयत्न किया तथा मानवतावाद को अवरोधक बनी हर शक्ति को परास्त करने का भरसक प्रयत्न भी। कुछ प्रसिद्ध साहित्यिक कृतियों के उत्तर रांगेय राघव ने अपनी कृतियों के माध्यम से दिए। इसे हिंदी साहित्य में उनकी मौलिक देन के रूप में माना गया। ये मार्क्सवादी विचारों से प्रेरित उपन्यासकार थे। भगवतीचरण वर्मा द्वारा रचित ‘टेढ़े-मेढ़े रास्ते’ के उत्तर में ‘सीधा-सादा रास्ता’, ‘आनंदमठ’ के उत्तर में उन्होंने ‘विषादमठ’ लिखा। प्रेमचंदोत्तर कथाकारों की कतार में अपने रचनात्मक वैशिष्ट्य, सृजन विविधता और विपुलता के कारण वे हमेशा स्मरणीय रहेंगे। रांगेय राघव को हिन्दुस्तान अकादमी पुरस्कार (१९५१), डालमिया पुरस्कार (१९५४), उत्तर प्रदेश सरकार पुरस्कार (१९५७ व १९५९), राजस्थान साहित्य अकादमी पुरस्कार (१९६१) तथा मरणोपरांत (१९६६) महात्मा गांधी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
       डॉ. रांगेय राघव एक उत्कृष्ट चित्रकार भी थे। इस प्रकार अनवरत साहित्य सेवा करते हुए कैंसर बीमारी के कारण रांगेय राघव का निधन १२ सितंबर सन १९६२ को बंबई के `टाटा मेमोरियल अस्पताल' में हुआ।
प्रो. डॉ. दिनेशकुमार

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