“पलायन : अधूरे सपनों और टूटते लोकजीवन की दर्दभरी दास्तान”

यह कहानी गाँव के लोकजीवन, लोककला, गरीबी और महानगरों की ओर बढ़ते पलायन की मार्मिक गाथा है। रामप्रसाद एक प्रतिभाशाली लोक कलाकार था, जो परिवार की जिम्मेदारियों और कर्ज के बोझ से मजबूर होकर दिल्ली कमाने जाता है, लेकिन वापस केवल उसकी मौत की खबर आती है। कहानी ग्रामीण संस्कृति के पतन, मजदूर जीवन की त्रासदी और एक परिवार के टूटते सपनों को बेहद संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत करती है।

May 25, 2026 - 15:44
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“पलायन : अधूरे सपनों और टूटते लोकजीवन की दर्दभरी दास्तान”
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    सावन का महीना था, आसमान में मेघ उमड़- घुमड़ रहे थे।  धरती मानो हरे रंग के परिधान धारण किया हो,खेतों की हरियाली चरमोत्कर्ष पहुँच गयी थी। रह-रह कर बिजली चमक रही थी, वर्षा  के बुंदों से वातावरण को बहुत ही सुहाना बना दिया था। खेतों में धान की रोपाई चल रही थी, खेतों में काम करने वाली मजदूर स्त्रियाँ कजरी के मधुर गीत गा  रही थी।
   ऐसे वातावरण में खेतों में धान की रोपाई चल रही थी.. मजदूर स्त्रियाँ कजरी के गीत गा रही थी। सम्पूर्ण वातावरण  मन को प्रफुल्लित कर रहा था। शिवनाथ धान की रोपाई करने  के बाद प्रकृति के मनोहर छटा आंनद ले रहा थे थकान के बाद आराम करते हुए  मधुर गीतों आंनद ले रहे थे इसका एहसास तो गाँव में ही  किया जा सकता है।
इसी बीच उसका भतीजा महेश शिवनाथ को खोजते हुए खेत आ गया। उसके चेहरे घबराहट झलक रही थी, लेकिन उस समय वह कुछ बताना नहीं चाहता था। महेश बहुत धैर्य के साथ  कहा, `चाचा चलिये  दिल्ली से फोन आया है' शिवनाथ कहा, `महेश सब ठीक है राम प्रसाद क्या हाल चाल है'?
लेकिन बातचीत में उलझा कर उन्हें घर ले आया। शिवनाथ घर आंगन में खाट पर बैठ गये। आंगन में सन्नाटा पसरा था, अब शिवनाथ को लगने लगा कि कोई अनहोनी घटना तो नहीं हो गयी हैं !
लेकिन सच्चाई को कब तक छिपाया जा सकता है। महेश बताया कि `दिल्ली से सुरेश ने फोन किया था कि राम प्रसाद बीस फूट खंभे पर चढ़कर वेल्डिंग कर रहा था, उसका संतुलन बिगड़ गया जिससे रामप्रसाद निचे गिर गया `फिर महेश आगे कुछ कहने का साहस नहीं जूटा पा रहा था। शिवनाथ  डरे सहमें से बोले,`क्या हुआ राम प्रसाद को' महेश अपने आप को सम्हालते बोला‌ `चाचा राम प्रसाद अब इस दुनिया में नहीं रहा'।

शिवनाथ पर दुख का पहाड़ पड़ा उसके आंखों के सामने अंधेरा छा गया, वह सिसक-सिसक कर रोने लगे। उसके आंखों अश्रु की धारा फूट पड़ी, उसे अब कौन समझाए, कोई भी कुछ बोलने का साहस नहीं कर पा रहा था धीरे-धी रे आंगन में गाँव के लोग एकत्रित होने लगें। गांव में तेजी से राम प्रसाद की मौत की खबर फैल गयी। गांव भर के लोग इस घटना से बहुत दुखी थे। शिवनाथ पर जो गुजर रहा था वह पीड़ा तो वही समझ रहा था। लोग बाब्ग आपस में धीरे-धीरे संवेदना व्यक्त कर रहे थे। इतने में  बरसात होने लगी, आसमान भी रो रहा हो। रामप्रसाद को आर्थिक समस्या और गरीबी से जूझते परिवार के लिए अपने उत्तरदायित्व को पूरा जो करना था, लेकिन अब तो अधूरा ही रह गया कर्ज से मुक्ति  कौन करायेगा अब बहू और बच्चों कौन सहरा बनेगा,लोगों के पास सहानुभूति के शब्दों के अतिरिक्त और क्या दे सकते थे। दूसरी ओर राम प्रसाद की पत्नी चीख-चीखकर रोने रही थी, गांव की स्त्रियाँ उस समझाने में लगी चारों ओर मातम पसरा थी यहाँ पर एकत्रित लोग समझाने के सिवाय क्या कर सकते थे?
अब तो शिवनाथ और उनकी बहू इस शोक का कोई अंत नहीं था। अब तो रामप्रसाद हमेशा-हमेशा के उनसे बिछुड़ गया था दिल्ली रुपये कामने के लिए गया था लेकिन अब वह कभी भी नहीं दिखेगा।
इसी बीच किसी ने शिवनाथ के गोद में उसके  दो वर्षिय पोते को रख दिया समझाते हुए कहा,`शिवनाथ अपने पोते में राम प्रसाद की छवि देखो, अब इसे देखकर संतोष  कर लो।
बचपन में राम प्रसाद बहुत ही चंचल स्वभाव का था। शिवनाथ उसके प्रवृत्ति से परेशान हो जाया करते थे वह बाग-बगीचे घुमा करता था। कोयल की आवाज सुनकर कोयल की आवाज निकालता, अपने मित्रों के साथ खेला करता था कभी तो पेड़ चढकर बासुरी बजाता, जहाँ भी गांव में गीत, संगीत नाच का कार्यक्रम होता था राम प्रसाद अपने मित्रों के साथ पहुँच जाता था। उसके पिता शिवनाथ उसे पढ़ना चाहते थे, किन्तु यह पढ नहीं पाया। किसी पांचवीं कक्षा तक पढ़ पाया, आगे स्कूल जाना छोड़ दिया।
इधर शिवनाथ के जीवन में भूचाल आ गया, धीरे-धीरे उसकी घरेलू स्थिति जटिल होने लगी उसकी पत्नी बीमारी हो गयी, ईलाज के रुपये उधार लेने पडे, लेकिन उसके पत्नी की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। शिवनाथ  ईलाज के डॉक्टरों के पास चक्कर लगाने लगा किन्तु कोई सुधार नहीं हुआ। स्थानीय डॉक्टर बडे़ शहर में जाकर ईलाज कराने के सलाह लेने लेगे। रुपये के लिए उसे खेत बंधक रखना पड़ा।

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 बहुत कोशिश के बाद भी शिवनाथ की पत्नी को बीमारी से मुक्ति नहीं मिली एक दिन वह इस दुनिया से चल बसी। पत्नी के मृत्यु से शिवनाथ टूट गया अकेलापन उसे काटने दौडता। लेकिन इंसान को संतोष करना पड़ता है। अब तो शिवनाथ कर्ज के दलदल में फंस चूका था, मूलधन तो मूलधन साथ व्याज भी सूरसा की तरह बढते ही जा रहा था। खेत भी तो बंधक हो गया था अब शिवनाथ और राम प्रसाद को भूख मिटाने के लिए मजदूरी करना पड़ा। राम प्रसाद जन्मजात कलाकार था, बढते उम्र में के साथ उसके अंदर की कला उफान मार रहीं थी। वह अच्छा हास्य कलाकार और गायक भी था उसके गाँव के पास के दूसरे गाँव में नाच मंडली थीअब उसका सम्पर्क नाच मंडली से गया शाम को नाच मंडली के रिहर्सल जाने लगा। अब वह नाच मंडली में भर्ती हो गया, हास्य कलाकार के कारण जोकर की भूमिका में लोगों को हंसाने लगा। अपने अभिनय के बहुत लोकप्रिय हो गया। अब रामप्रसाद एक रात के प्रोग्राम के लिए सात-आठ सौ रुपये मिलने लेगें, धीरे-धीरे राम प्रसाद नाच मंडली के लिए सबसे लोकप्रिय कलाकार हो गया उसकी गायकी और अभिनय उसकी चर्चा दूर-दूर तक होने लगी थी  अब दिन बदलने लगे थे। लेकिन कर्ज और चक्रवृद्धि व्याज  अभी भी मुक्त नहीं हो पाया था।
इसी बीच राम प्रसाद का विवाह हो गया, घर की रौनक बढ गया। जब से उसकी माँ की मृत्यु हुई थी, घर विरान हो गया था। अब तो बाप-बेटे के जीवन में तमाम खुशियाँ दस्तक दे रही थीं, बिन घरनी घर भूत का डेरा  वाली कहावत चरितार्थ हो  रहा था। कभी-कभी उसकी विवाहित बहनें घर सम्हाल लेती थीं और पिता शिवनाथ की देखभाल कर लेती थी,अब तो राम प्रसाद दो पुत्री और एक पुत्र पिता बन गया।
धीरे-धीरे अब हमारे गाँवों की लोक कला और लोक संस्कृति अप संस्कृति के मकड़जाल फंसती जा रही थीं। मानो इनका भी पलायन हो रहा था। ग्रामीण जीवन शैली परिवर्तन के संक्रमण के दौर से गुजर रहा था। मनोरंजन के नये-नये संसाधन गाँव में पहुंचने लगे थे अप संस्कृति नामक लकड़बग्गा ....लोककला रूपी हिरण को दबोच रहा था। लोककला अब पलायन हो रहा था। परम्परागत लोक गीत और संगीत को अब नयी पीढ़ी ने नकार दिया था।
अब गांव के युवा रुपये कमाने के लिए महानगरों के और पलायन कर रहे थे, वैसे तो पलायन की समस्या कोई नहीं थी। अंग्रेजों के राज भी बडी़ संख्या में लोग गांव से पलायन करते थें लकिन अब गांव-गांव युवा महानगरों की ओर पलायनक कर रहे थे। अब गांव विरान लग लगे थे। रोजी रोटी के लिए बहार जाना युवा महानगरों की पलायन करते जा रहे थे।
इधर नाच मंडली टूटती जा रहीं थी अब मनोरंजन नये-नये संसाधन बढते जा रहे थे। जातिगत लोककला भी इतिहास होते जा रहे थे अब तो गांव में भी विडियो में सिनेमा देखना, सिनेमा के गीतो का आनंद लेना बहुत ही लोकप्रिय हो गये। नाच मंडलियों अब प्रोग्राम नहीं मिलतें थी  अंततः नाच मंडलियाँ बंद होती चली गयी।

राम प्रसाद की नाच मंडली भी बंद हो गयी। नाच मंडली के कलाकार रोजीरोटी के महानगरों के ओर पलायन करने लगे।
ऐसे परिस्थिति में राम प्रसाद ने भी घरेलू समस्या से मुक्ति पाने के लिए  गांव से अपनी मित्रों के साथ दिल्ली जाने का निर्णय ले लिया।
रामप्रसाद रोजी रोटी कमाने के लिए दिल्ली जाने की तैयारी कर रहा था। पत्नी के आंखों में आंसू थें बच्चे रो रहे थे । रामप्रसाद ने अपने रोते हुए बच्चों को समझाया ' मत रोयो, अब मैं दिल्ली में जा रहा हूँ, वहाँ  काम करूँगा, बहुत रुपये मिलेंगे, फिर अच्छे स्कूल में  भर्ती करा दूंगा सभी के अच्छे- अच्छे कपड़े लाऊंगा, तुम सब अपनी दादा जी और मम्मी  परेशान मत करना, उनकी बातें मानना, ठीक है।
रामप्रसाद दिल्ली जा रहा था उसके कंधे पर परिवार की बहुत से जिम्मेदारियां थी, बच्चों की पढ़ाई, फिर उनकी शादी - विवाह जो करना था  । कर्ज से मुक्त होना   पाना था। बूढ़े होते पिता का ईलाज भी करवाना था  । वह भविष्य के तमाम  जिम्मेदारी को कैसे पूरा करेंगा इसी उधेड़बुन लगा था उसे तो अपने मेहनत के बल अपने पारिवारिक दायित्व को पूरा करना था।  वह पत्नी और बच्चों एकटक देखा और अपने पिता के चरण स्पर्श कर  घर से  दिल्ली जाने के लिए निकल पडा़ ।
  लेकिन फिर दिल्ली से राम प्रसाद वापस नहीं आ सका, आयी तो उसकी मौत की खबर, जो पिता शिव प्रसाद और राम प्रसाद की पत्नी को अंनत वेदना के सागर में डूबो दिया।

शिवमंगल सिंह

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