`आज तो छोटका दमाद आए हे? '
जानकी के पूछने पर कौशल्या फीकी हंसी हंसते हुए बोली- `निर्लज्ज हवे, रहत भर फूल कस लइका ला दारु पी पी के मारथे। गरियाथे। तहां हफ्ता घलौ नी होही अउ पाछू पाछू
लेहे आथे।
फूल कस लइका मतलब छोटी बेटी ईश्वरी।
‘पी के दंगड़दासी करत होही। निहल नीमत में तो गऊ गंगा कस दिखथे, नइ!'जानकी ने अपनी राय रखी।
कौशल्या ने सहमति में एक लंबी सी हुंकारी भरते हुए कहा-' रात भर नींद नी आइस होही । एकला। मुंह अंधारे दुआर खोलें त भूत कस ठाढ़।तहां बजरबट्ट गोड़ ला धर के ,
‘दई माफी !गलती हो गिस। पियल खाल में । माफी दइ।'
‘नगद तो सुनाए रहते! '
‘कहें -फिर कभु झगड़ा झंझट सुनें त सोच ले रे बाबू ! तोर मूड़ी की मोर चप्पल।'
‘ठीक कहे।' जानकी बोली ।
जानकी और कौशल्या दोनों सब्जी बेचती हैं। लहलहाते खेतों के बीच लगभग बारह-पंद्रह घरों का गांव है जामडोली। यहां के ज्यादातर लोग खेतों में सब्जी उगाते और बेचते हैं। खेतों के बीच टेढ़ी-मेढ़ी पतली पगडंडी है जो गांव को शहर से जोड़ती है। इसी पगडंडी पर जानकी और कौशल्या सिर पर सब्जी की टोकरी रखे शहर की ओर पैदल चली जा रही थीं।
जहां औरतें होती है वहां मौन फटक भी नहीं सकता। क्योंकि उनके पास न तो बातों की कमी होती है न ही मुद्दों की। लिहाजा बातों का सिलसिला कुछ इस तरह बढ़ चला -
कौशल्या बोली- `एक तो कोरोना। ऊपर ले लाकडाउन। अउ घर कर खर्चा। जीयन खान मुस्किल हो गे। सब कर दाम बाढ़ गे,लेकिन पताल कर जस के तस।'
`कहीं काम में नफा नइये।'जानकी ने सहमति जताई-'एदारी भाटा कर दाम चिटिक बाढे हे।'
`देख- देख'- अचानक पगडंडी पर फिसलती हुई जानकी से कौशल्या ने कहा -`तीन महीना हो गे। पताल के दाम दस ले ज्यादा नइ बाढ़े हे। जम्मो बेचाही तभु भूति नइ निकले। जादा ले जादा दु सौ। अढ़ाई सौ। '
`सही कहत हस।अउ सगा मेहमान आए गिन त खानपान कपड़ा-लत्ता, स्वागत सत्कार में दु-तीन हजार तो पानी कस बहाथे।'
कौशल्या ऐसे हुंकारी भरी जैसे जानकी ने उसके मन की बात कह दी हो ।
बातें करते करते वे गुदरी बाजार तक पहुंच गए थे। बाजार में भीड़ कुछ ज्यादा दिख रही थी ।
`झींगा बीस रूपये किलो।' रामसाय चिल्ला रहा था ।
`गोभी ले पचास रूपया किलो।'
`इधर ,इधर ,इधर है मुनगा ४०रू पाव।
`लहसुन १५०। '
इधर पूरे बाजार में बरबट्टी, कुम्हड़ा, धनिया,मिर्च, अदरक सब कुछ दुकानों में दिख रहे थे । लौकी खेखसा से शिमला मिर्च तक।
कौशल्या ने अब तक ताड़ लिया था कि आज बाजार में टमाटर कम है। वह रामेसर के दुकान से गुजरते हुए हमेशा पूछ लेती है -`टमाटर का भाव ददा?'
`आज तो पचास-साठ बेचाही दीदी। बाजार में पताल आलेच नइ हे। '
`कतेक? साठ?' कौशल्या को सहसा विश्वास नहीं हुआ तो उसने पुनः पूछ लिया। ग्राहकों की भीड़ रामेश्वर के दुकान के सामने जुटती जा रही थी।
कौशल्या अपनी खुशी को रोक नहीं पाई। उसके कदम तेजी से अपने दुकान की ओर बढ़े। उसने जल्दी से दो तीन बोरे बिछाये और टमाटर उस पर उड़ेलने लगी। तब तक ग्राहक दुकान पर जमा होने लग गए थे ।
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शाम होते-होते वह सारे टमाटर बेंच चुकी थी। हमेशा दो सवा दो सौ में सिमट जाने वाली कौसल्या की अंटी में आज पूरे सत्रह सौ तीस रूपये थे।
उसे याद आया उसने सबसे पहले आज दामाद का मुंह देखा था। कितना दिल दुखाया था उसका। पर कितना शुभ रहा आज का दिन। वह पछता रही थी। आत्मग्लानि उसके भीतर जैसे कुल बुलाने लगी थी।
घर पहुंचते-पहुंचते अंधेरा हो गया। घर में बेटी इश्वरी अकेली बैठी इंतजार कर रही थी ।
`छोटका दमाद कहाँ गिन?'कौशल्या ने सबसे पहले इश्वरी से यही पूछा ।
ईश्वरी ने लापरवाही से मुंह बिचका दिये । जैसे कह रही हो -`होगा कहीं। क्या पता। '
`मझनिया बढ़िया खवाए रहे कि ?'
`नहीं' इश्वरी गुस्से से बोली -`कमीना मारेल तब तो नइ सोचे कि आखिर एहिच मोला काम आही। बस तकलीफ नइ सहाही तहां कुकुर कस आही। चिकन चिकन बात करके तोला मोह लेथे। तैं भी खुश वो भी खुश।'
`दमाद दिल कर खराब नइ है, भले गुस्सा में कहीं कह देत होही । एकी जग रहे ले हांड़ी हांड़ी में तो ठेस लग जाथे। बात ला बढ़ाए ले फायदा नइ है ईश्वरी। कौशल्या ने समझाया ।- `कहां है दमाद? '
`काका घर जग है। बिहान ले। करत हो ही चारी-चुगली।'
`ठीक है! जा मसाला ला पीस। प्लास्टिक में एक किलो बायलर है । बनात रह। मैं दमाद ला बुलाये जात हंव।' इतना कहते हुए कोशल्या बाहर निकल गई और आधा घंटा बाद जब लौटकर आई तो पीछे पीछे छोटका दमाद भी था।
`बइठा-`कौशल्या ने दीवार से सटाकर पीढा रखते हुए कहा। छोटका दामाद रसोई से आती गंध से भाप चुका था कि आज खाना स्पेशल है।
कौशल्या एक बड़े से लोटे में पानी और गिलास लेकर आई तो ईश्वरी एक पत्तल में ढेर सारे तले हुए गोश्त रख कर चली गई। इससे पहले कि दामाद गोश्त को हाथ लगाता उसने ईश्वरी को आवाज दी - `ईश्वरी ! दुगो गिलास ले आना तो! '
वह उठा अपनी बाइक की डिक्की खोला और अंग्रेजी शराब की एक भरी बोतल निकाल कर कौशल्या को दिखाते हुए बोला - `दइ आज देसी नहीं। अंग्रेजी। स्पेशल लाने हंव तूंहर खतिर।'
कौशल्या ने झट से बोतल लपक लिया और उसके भीतर झाँकते हुए बोली- `ईश्वरी देख-देख दमाद का ले के आइन हैं। जल्दी आ जल्दी।'
ईश्वरी हाथ में दो गिलास लिए वापस आई। उसने दोनों गिलास अपने मम्मी को पकड़ाये।
फिर बोतल लेकर उसका ढक्कन खोलने लगी।
उसके चेहरे पर प्यार और गुस्सा एक दूसरे को ढकने की कोशिश कर रहे थे।
सुनील गुप्ता
केसला रोड सीतापुर