घर

यह कथा मनु और उसके परिवार के माध्यम से विवाह संस्था में छिपी मानसिक हिंसा, अहंकार और संवादहीनता की परतें खोलती है। पहली बहू वृषाली चुपचाप टूटती है, दूसरी बहू ऋचा प्रतिरोध करती है। दोनों स्थितियों में परिवार का विघटन होता है। यह कहानी बताती है कि केवल रस्मों से नहीं, बल्कि सम्मान, संवेदनशीलता और संवाद से ही घर बनते हैं।

Jan 2, 2026 - 15:58
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घर
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‘‘मनु की शादी तय हो गई है’’ फोन पर मामी जी की आवाज में एक अद्भुत चमक थी। उनके स्वर में उत्साह था, मानों बरसों बाद कोई सपना पूरा होने जा रहा हो। ‘‘देखो, उसकी तो कोई बहन भी नहीं है...तुम लोग आओगे तो उसे अच्छा लगेगा, संवल मिलेगा।’’
बनारस से हम सब तैयार हुए। रिश्तों का ऐसा आव्हान टाला नहीं जा सकता। मनु बचपन में हमारे साथ खूब खेला था- अब वह दूल्हा बनने जा रहा था। सोच कर ही अजीब सी खुशी हो रही थी। शादी दिल्ली की थी। लड़की का नाम था -‘वृषाली’- पढ़ी, लिखी, सुन्दर और शालीन। सब कुछ सलीके से हुआ। परंपराओं का निर्वाह, सजा-धजा मंडप, मनु के चेहरे पर मुस्कान। सब कुछ ऐसा लग रहा था जैसे कोई सुंदर स्वप्न हो।
लेकिन यह खुशी चिरस्थायी नहीं थी। कुछ ही दिनों बाद खबर आई - बहू मायके चली गई है। वजह? ‘‘तबियत ठीक नहीं है’’ समय बीता। फिर खबर आई-‘‘वो पढ़ाई कर रही है’’ धीरे-धीरे सच बाहर आने लगा।
लड़की की आँखें कमजोर थीं। वह सड़क पार करते हुए मनु का हाथ पकड़ लेती। मनु को यह पसंद नहीं था - उसे लगता, लोग क्या कहेंगे। ‘अपमानित’ महसूस करता। मनु की यह संकीर्ण सोच धीरे-धीरे रिश्ते को घुन की तरह खाने लगी।
घर में रोज तानें- ‘‘तुम्हें यह नहीं आता, तुम्हारी माँ ने कुछ नहीं सिखाया....’’ मानसिक प्रताड़ना इतनी गहरी हो गई कि लड़की ने स्पष्ट शब्दों में कह दिया ‘‘मैं उस घर में नहीं लौटूंगी। लौटी तो मेरी अर्थी ही उठेगी’’
तलाक का मुकदमा हुआ। लड़की पर ‘आरोप’ लगे। पर सच्चाई यह थी कि वह एक शांत, सहनशील लड़की थी, जिसे टूटने में कई साल लग गए। अंत तलाक पर जा कर रूका। सब थक चुके थे। मनु भी। मामी जी की निगाह अब एक नई शुरूआत पर थी। ‘‘इस बार सब कुछ ठीक होगा’’, मामी जी ने चाय की प्याली हाथ में लेते हुए कहा। ‘‘लड़की बहुत सुन्दर है। लखनऊ से है। परिवार भी बहुत अच्छा है, और....काफी कुछ देने को तैयार हैं।’’
‘‘लेकिन कुछ लोगों ने मना किया है’’, मैंने संकोच से कहा। मामी जी ने बात काट दी, ‘‘अरे! लोग तो कुछ भी कहते हैं। अब अगर पहली शादी में गड़बड़ हुई तो क्या हम लड़के को कुँवारा ही छोड़ दें?’’ शादी हो गई। सबने राहत की साँस ली। मनु के चेहरे पर एक बार फिर वही मुस्कान थी। इस बार दहेज, कार, और ऋचा के आत्म विश्वासी व्यक्तित्व ने सबको चकाचैंध कर दिया।
कुछ समय तो ठीक चला। दीपावली का त्यौहार आया। मैने आदतन मामा जी को फोन किया। उन्होंने फोन नहीं उठाया। यह ऋचा थी।
‘‘हाँ, कौन बोल रहा है?’’
‘‘मैं बनारस से....मामी जी है?’’
‘‘नहीं’’ फोन कट गया। स्वर कठोर था और व्यवहार से अजनबीयत टपक रही थी।
कुछ दिन बाद मामी जी से बात हुई। मैने बताया-‘‘फोन किया था उस दिन, आपकी बहू ने उठाया था, लेकिन बात नहीं की।’’ मामी जी थोड़ी झुंझला गई, ‘‘हांँ, वही तो है.....किसी से बात नहीं करती, दिन भर पड़ी रहती है। कहती है- अलग रहेंगे। अब बताओं, हम लोग कहाँ जाएं, हमारा तो बस यही एक बेटा है।’’
धीरे-धीरे मामी जी ने शिकवे बढ़ने लगे-‘‘कुछ नहीं करती। भूख लगी तो मैगी बना लेती है। मनु से कहती है-‘‘तुम्हारे मम्मी-पापा के साथ नहीं रहना।’’
एक दिन मामा जी बोले, ‘‘बेटा, हमने सोचा था कि बहू आएगी, घर मे चहल-पहल होगी, लेकिन यह तो अजीब ही स्थिति हैं’’ ऋचा के अंदर एक अलग तरह की खीझ थी। वह मनु से अक्सर कहती-‘‘तुम्हारी माँ हर बात में टोकती हैं। मैं उनकी परछाई बनकर नहीं रह सकती।’’
मनु चुप रहता। लेकिन अंदर ही अंदर खौलता। मामी जी शिकायत करतीं- ‘‘हमने सब कुछ किया, फिर भी यह लड़की हमसे सीधे मुंह बात नहीं करतीं।’’
एक दिन सब्र फूट पड़ा। ऋचा का सामान पैक हो गया। वह लखनऊ चली गई- गहने, कपड़े, नकद सब लेकर। और फिर...................कोर्ट से समन आया। ‘दहेज प्रताड़ना’ का मामला।

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हर महीने मामी जी, मामा जी और मनु को लखनऊ जाना पड़ता। मामी जी के अनुसार मनु को जान का खतरा था। मनु की नौकरी पर असर पड़ने लगा। छुट्टियाँ खत्म होती जा रही थीं। मामा जी का व्यापार प्रभावित हो रहा था। मामी जी की आँखे सूजने लगी थीं, बार-बार कहतीं-‘‘इतना सब करने के बाद भी ये मिला।’’ मनु चुप था। शायद अब कुछ कहने को नहीं रह गया था। हर सुनवाई एक सजा थी, हर यात्रा, एक अपमान!
वकील ने कहा-‘‘मामला लम्बा चलेगा। लड़की बजबूत है, सबूत भी जुटा रही है।’’
८ वर्ष बाद-तलाक मिला। लेकिन कीमत भारी थी-एक करोड़ रूपये। घर बिक गया, जमा पूँजी समाप्त हो गई। केवल रिश्तों की राख बची थी।
एक साल बाद मैं मुंबई गई। मिलने की इच्छा थी।
घर में घुसते ही लगा-यह घर नहीं, गोदाम है। हर कोना सामान से भरा-ढूंसा हुआ सा। रसोई बिखरी हुई। प्रिâज में सड़ा खाना। बच्चों को लेकर मैं अंदर तक सिहर गई। 
मैंने कहा, ‘‘मामी जी, ये कैसा हाल है घर का?’’
वह हँस दी-‘‘तुम्हारा घर तो बड़ा खाली-खाली लगता है। यहाँ देखो-सब है।’’
एक सुबह रसोई में चाकू ढूँढ़ रही थी। मैने पूछा-‘‘मामी जी, चाकू नही दिख रहा।’’
वह झल्लाई-‘‘अंधी हो क्या? वहीं तो रखा है!’’
मैं हतप्रत रह गई। दो दिन के भीतर ऐसा व्यवहार! तो बहुओं ने कैसे सहा होगा?
अब सब समझ आया। मामी जी का व्यवहार केवल उनके भीतर के अधूरेपन का प्रतिबिम्ब था। मनु, जिसने कभी पत्नी को साथी नहीं माना-केवल दिखावा किया। ऋचा, तो तेज थी-जवाब देना जानती थी, इसलिए टकराव हुआ।
पहली बहू वृषाली सह गई, टूट गई। दूसरी-ऋचा लड़ी, जीत गई-पर परिवार हार गया।
आज मनु अकेला है। माता-पिता बूढ़े हो चले है। रिश्तेदारों ने आना बंद कर दिया है। वैसे भी रिश्तेदारों से उनकी कभी बनी नही। घर में दीवारें हैं, आवाजें नहीं।
मामी जी फोन करती हैं-‘‘हमसे गलती कहाँ हुई?’’ और मैं चुप रह जाती हूँ। क्योंकि गलती एक नहीं थीं-वह सोच में थी, भाषा में थी, व्यवहार में थी। वह हर उस पल में थी जब बहू को ‘बहू’ नही, केवल बहू बनाया गया। 
हर घर तब तक ‘घर’ नहीं होता, जब तक उसमें रहने वाले लोग एक दूसरे को सम्मान न दें। मनु का घर दो बार बसा, दो बार टूटा। पर सच तो यह है कि वह कभी बना ही नही था। क्योंकि उसे बनाने के लिए जो ईंट चाहिए थी-वो थी समझदारी, संवाद और स्नेह! जो वहाँ कभी था ही नहीं! 

डाॅ. सीमा जैन
सैदाबाद, प्रयागराज

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