हमारे छोटे शहर की गल्ला मंडी जिसे उन दिनों मोरगंज कहा जाता था का बड़ा दिलकश नज़ारा होता था। जहां प्रतिदिन गांव के किसान बड़े भोर सुबह से ही बैल गाड़ियों में गांवों से उनका अनाज बेचने के लिए लाया करते थे और उनकी चहल पहल चालू हो जाती थी। मंडी में बीच की एक सड़क पर दो बड़े बड़े गेट थे और उसी सड़क के दोनों और अनाज व्यापारियों की बड़ी बड़ी आढ़तें थीं। मंडी के प्रवेश गेट से ही व्यापारियों के एजेंट किसानों को उनकी आढ़तों में गल्ला ले जाने प्रेरित करते थे। उन दिनों मंडी में कुल जमा पंद्रह बीस आढ़तिया हुआ करते थे। जिनमें पाकिस्तान से विस्थापित होकर आए एक पंजाबी परिवार के तीन भाइयों ने बहुत कम समय में व्यापार, व्यवहार में अपना विशेष स्थान बना लिया था। उन दिनों किसानों की दशा बहुत अच्छी नहीं थी। कृषि प्रधान देश में किसान एक मात्र ऐसा विक्रेता होता था जिसे क्रेता के दरवाजे अपना माल लेकर जाना होता था ।
अन्यथा नमक भी खरीदने क्रेता को विक्रेता की दुकान जाना होता था । ये उन दिनों की बात है जब Door Delivery जैसे Consept का जन्म ही नही हुआ था। ऐसे में किसानों को उनकी उपज की कीमत नीलामी के माध्यम से उसके आढ़तिया के रहम करम और प्रयासों से मिलती थी। जिस पर उससे कीमत की आधा प्रतिशत आढत काट ली जाती थी। उस समय सरकार का भी मंडी की इस व्यवस्था में ज्यादा कोई दखल नहीं होता था ।
ऐसे में पाकिस्तान से विस्थापित तीन भाइयों की फर्म ने क्षेत्र के किसानों के मन में इतना ज्यादा स्थान बना लिया था कि ज्यादा से ज्यादा किसान उनकी ही आढत में माल लाने के लिए इच्छुक रहते थे। तीनों भाइयों की आपसी समझ और व्यवसायिक प्रबंधन उन दिनों मंडी में एक आदर्श उदाहरण हुआ करता था। कार्यों का अलिखित विभाजन ऐसा था कि बड़े भाई के मार्ग दर्शन में छोटे दोनों में से एक खरीदी कार्य करते थे और दूसरे के जिम्मे खरीदे माल का विक्रय का काम होता था। तीनों भाइयों के आपसी समन्वय और उत्कृष्ट व्यवहार शैली से उनका व्यापार दिनोदिन सफलता के नए आयाम छू रहा था। एक समय में उनकी फर्म ने क्षेत्र में सर्वाधिक इनकम टैक्स देने का रिकॉर्ड भी बनाया था। तीनों भाइयों की इस संयुक्त युति का इतना ही प्रभाव उनके पारिवारिक जीवन पर भी था। सभी के बीबी बच्चे एक छत के नीचे एक संयुक्त परिवार की तरह रहते थे। फिर समय के चक्र ने पहले छतों का बटवारा करवाया और तीनों परिवार तीन छतों की छाया में सुख दुख का बंटवारा करते हुए खुशी खुशी रहने लगे। अभी भी परिवारिक व्यवसाय छतों के इस बंटवारे से अप्रभावित पूर्ववत चल रहा था। इसी क्रम में एक समय ऐसा भी आया जब व्यापार में भी कुछ परिस्थिति जन्य कारणों से बंटवारे की स्तिथि निर्मित हो गई। जब तक बड़े भाई भी उम्र जनित कारणों से निवृति की ओर अग्रसित हो चुके थे। और इस कारण व्यापार में मुख्य सक्रिय जबाबदारी दोनों छोटे भाइयों और उनके युवा बच्चों ने संभाल ली थी। अब व्यापार संचालन में भी कुछ कुछ मतभेद आने लगे थे, ये वो ही समय था जब फर्म का व्यापार उन दिनों अपने उत्कर्ष पर था। प्रति दिन क्विंटलों गल्ले की आवक, भारी भरकम किसानों की भीड़, बीसियों हम्मालों, दसों मुनीमों के शोर शराबे में एक दिन संध्या दोनों भाइयों ने देर रात तक काम चालू रखने के बजाय जल्द सबको छुट्टी दे दी। बच्चों को घर भेज दिया, और एक कमरे में अपने आप को बंद कर देर रात तक एक ऐसा आदर्श बंटवारा कर लिया जो न जाने कितनी संपत्तियों के विवादों के सफल बंटवारे के लिए एक आदर्श उदाहरण हो सकता है। इसके पहले की इस आदर्श बंटवारे की कार्यशैली पर कुछ कहा जाए यह कहना ज्यादा उचित होगा कि इस बंटवारे के एक दिन बाद गल्ला मंडी में दोनों भाइयों की पृथक पृथक फर्म सफलता पूर्वक बिना किसी व्यवसायिक और पारिवारिक पूर्वाग्रह दुराग्रह जैसे अवरोध के काम करने लगीं जैसे वे इसके पहले कभी एक फर्म के रूप में काम करती ही न हों। इस बंटवारे के एक ही मूल मंत्र था। जिसे दोनों भाइयों ने निष्ठा पूर्वक अपनाया। वो यह था कि उन दोनों का जिस भी संपत्ति के हस्तांतरण पर सहमति न होकर मतैक्य होता उसे वे लॉटरी के रूप में तय करते और जिसके भी पक्ष में लॉटरी आती दूसरा पक्ष उसे ईश्वर की मर्जी मानकर दिल से स्वीकार करता। ऐसा करके उन्होंने न जाने कितने लंबे चलने वाले विवादों को उत्पन्न होने के पहले तिलांजलि दे दी थी। उन्होंने किसी को चर्चा में यह भी बताया कि परिवार में छतों के बंटवारे के समय भी उन्होंने इसी युक्ति को सफलता पूर्वक अपनाया था ।
अशोक श्रीवास्तव