मीरा रोड में ‘सोच विचार’ काशी अंक-17 का विमोचन, साहित्यकारों ने की काशी की सांस्कृतिक विरासत पर चर्चा

मीरा रोड के विरूंगला केंद्र में स्वर संगम फाउंडेशन द्वारा बनारस से प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका ‘सोच विचार’ काशी अंक-17 का विमोचन एवं परिचर्चा आयोजित की गई। कार्यक्रम की अध्यक्षता महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी के निवर्तमान अध्यक्ष डॉ. शीतला प्रसाद दूबे ने की। डॉ. सूर्यबाला, डॉ. उदय प्रताप सिंह, बोधिसत्व, डॉ. हूबनाथ पांडेय सहित अनेक साहित्यकारों ने काशी की सांस्कृतिक विरासत, संस्मरणात्मक लेखन, स्वतंत्र वैचारिकी और हिंदी साहित्य में पत्रिकाओं की भूमिका पर विचार रखे। वक्ताओं ने अंक को काशी के इतिहास और साहित्यिक परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने वाला महत्वपूर्ण प्रयास बताया।

Aug 21, 2026 - 19:20
Aug 21, 2026 - 19:27
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मीरा रोड में ‘सोच विचार’ काशी अंक-17 का विमोचन, साहित्यकारों ने की काशी की सांस्कृतिक विरासत पर चर्चा
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सोच विचार पत्रिका का काशी अंक -17 का मीरा रोड के विरूंगला केन्द्र में विमोचन व चर्चा

कवियों,लेखकों पत्रकारों और साहित्य प्रेमियों की उपस्थिति में बनारस से निकलने वाली पत्रिका सोच विचार- काशी अंक 17 का विमोचन कल मीरा रोड, के विरूंगला केन्द्र मे  हुआ।स्वर संगम फाउंडेशन के इस आयोजन की अध्यक्षता महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी के निवर्तमान अध्यक्ष डॉ शीतला प्रसाद दूबे ने की तथा विशिष्ट अतिथि के रूप में डॉ सूर्य बाला, डॉ उदय प्रताप सिंह, बोधिसत्व, डॉ हूबनाथ पांडेय तथा डॉ रत्न शंकर पांडेय उपस्थित थे। दीप प्रज्ज्वलन के बाद  शांति स्वरूप भटनागर द्वारा रचित व पंडित ओंकार नाथ ठाकुर द्वारा संगीत बद्ध किए गए काशी के कुल गीत को प्रस्तुति की गयी।कुल गीत के बाद अतिथियों के सम्मान में स्वर संगम फाउंडेशन के चेयरमैन ह्दयेश मयंक ने अपने स्वागत भाषण में एक एक करके सभी मंचस्थ जनो के प्रति आदर व्यक्त किया तथा अतिथि संपादक श्री वाचस्पति जी के साहित्य सेवा की सराहना की। पत्रिका पर चर्चा श्री सिद्धार्थ द्विवेदी के वक्तव्य के साथ शुरू हुई। सिद्धार्थ ने काशी की आध्यात्मिक महिमा का उल्लेख करते हुए पत्रिका के संपादक नरेंद्र नाथ के स्वतंत्र व मध्य मार्गीय विचारों को एक बडी़ उपलब्धि के रूप में उद्धृत किया।

जिसके तुरंत बाद डॉ सूर्य बाला जी का वक्तव्य हुआ। उन्होंने भी काशी अंक -17 के लिए सोच विचार पत्रिका के संपादक को धन्यवाद देते हुए कहा कि हर लेखक की अपनी स्वतंत्र वैचारिकी होनी चाहिए। विचार धाराएं कभी एक दूसरे की विरोधी नही होती है, वे तो एक दूसरे की पूरक होती हैं। विचारधाराओं को प्रदूषित करने का काम उसके अनुयाई करते हैं। उन्होंने सिद्धार्थ द्विवेदी की तरफ ईशारा करते हुए कहा कि काशी में रहने से पाप का, नाश नही होता है। पाप को नष्ट करने के लिए हमें अपने अंदर देखना पड़ता है। दिवंगत साहित्यकारों के कुछ संस्मरणों का उन्होंने उल्लेख किया और बताया कि लेखक जो लिखता है वह महत्वपूर्ण नही है, महत्वपूर्ण वह है जो पाठक तक पहुँचता है। पत्रिका पर चर्चा को आगे बढाते हुए डॉ अनिल गौढ ने अपने बनारस के संस्मरण साझा किए तथा  को दिवाना बना देने वाला अंक बताया जिसके तुरंत बाद प्रोफेसर हूबनाथ पांडेय ने कहा कि विशेषांक निकालना एक चुनौती भरा काम है लेकिन फिर भी साहित्य को राजनीति से बचने की कोशिश करनी चाहिए क्योंकि राजनीति हमेशा साहित्य का दुश्मन होती है और साहित्य हमेशा राजनीति के खिलाफ खड़ा होता है। चर्चा को आगे बढाते हुए शैलेष सिंह कहा कि हिंदी भाषा का इतिहास रचने वालों को इस अंक में स्थान दिया गया है। यह वे लोग हैं जिन्होंने हिंदी भाषा की निर्मिती के लिए ऐतिहासिक काम किया है। उन्होंने सीताराम चतुर्वेदी तथा श्यामसुंदर दास के कुछ संस्मरणों को भी साझा किया। ब्लिज्ट के संपादक रहे राकेश शर्मा ने पत्रिका के अंदर के आलेख और साहित्य कारों का उल्लेख करते हुए कहा कि संस्मरण रोचक हैं तथा नयी पीढ़ी का ज्ञान वर्धन करने में सहायक हैं। पत्रिका पर अपना विचार रखते राज कमल प्रकाशन से जुड़े रमन मिश्र ने कहा कि पत्रिका के संस्मरण पढने में रोचक हैं, ये काशी के इतिहास को समेटे हुए हैं तथा नयी पीढ़ी का ज्ञान वर्धन करने में उपयोगी हैं। बोधिसत्व जी का वक्तव्य सवाल करता हुआ और जबाब देता हुआ वक्तव्य रहा। उन्होंने सवाल किया कि आखिर लगातार एक शहर को कोई क्यों खोज रहा है।

उत्तर में उन्होंने इसे एक नगर के सांस्कृतिक अवदान को नयी पीढ़ी तक पहुंचाने का एक तरीका बताया। कार्यक्रम के अंत में नरेंद्र मिश्र जी अपनी बात रखते हुए कहा कि यह पत्रिका किसी वाद से प्रभावित नही है। वर्ष का पहला अंक इसका विशेषांक होगा। पत्रिका में पारिवारिक भावना के विरोध में किसी बात को स्थान नही दिया जाएगा। उन्होंने सोच विचार को पूरे उत्तर प्रदेश में मासिक और नियमित निकलने वाली एक मात्र पत्रिका बताया। यह पत्रिका साहित्य कारों को केन्द्र में नही रखती बल्कि सामान्य पाठक का भी ध्यान रखती है। उन्होंने आयोजकों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित किया। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में शीतला प्रसाद दूबे जी ने कहा कि आधी काशी मुंबई में बसती है। एक समय था जब विष्णु पराडकर यहाँ से बनारस गए थे और आज सोच विचार पत्रिका बनारस से मुंबई आयी है। उन्होंने संस्मरणात्मक लेखन को काशी मुंबई के अंतर्संबंध को मजबूत बनाने के लिए आवश्यक बताया, तथा कहा कि ये पत्रिकाएं बच्चों के बीच जानी चाहिए। बड़े तो अपने लिए सब कुछ तय कर चुके हैं। कार्यक्रम के अंत में रमन मिश्र ने सबके प्रति आभार व्यक्त किया तथा कार्यक्रम का संचालन डॉ हरिप्रसाद राय ने किया। 

प्रस्तुति- हरिप्रसाद राय

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