मोहन राकेश : हिंदी रचना संसार के महानायक
मोहन राकेश आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रमुख नाटककार, कहानीकार, उपन्यासकार और नई कहानी आंदोलन के अग्रणी साहित्यकार थे। उन्होंने हिंदी नाटक को आधुनिक जीवन की जटिलताओं, मानवीय संबंधों के अंतर्द्वंद्व और मध्यवर्गीय जीवन की विडंबनाओं से जोड़कर नई पहचान दी। ‘आषाढ़ का एक दिन’, ‘आधे-अधूरे’ और ‘लहरों के राजहंस’ उनके प्रसिद्ध नाटक हैं, जबकि ‘अंधेरे बंद कमरे’, ‘न आनेवाला कल’ और ‘अंतराल’ उनके उल्लेखनीय उपन्यास हैं। उनकी रचनाओं में मनोवैज्ञानिक गहराई, संवादों की स्वाभाविकता और आधुनिक मानवीय संवेदनाओं का सशक्त चित्रण मिलता है। प्रस्तुत लेख में मोहन राकेश के जीवन, व्यक्तित्व, प्रमुख साहित्यिक कृतियों, भाषा-शैली और हिंदी साहित्य में उनके योगदान का परिचय दिया गया है।
मोहन राकेश : हिंदी रचना संसार के महानायक
मोहन राकेश : हिंदी रचना संसार के महानायकमोहन राकेश आधुनिक हिंदी साहित्य के उन प्रमुख स्तंभों में हैं, जिन्होंने कथा, नाटक और एकांकी—तीनों विधाओं को नई संवेदना, नई भाषा और नया शिल्प प्रदान किया। वे प्रयोगशीलता, मनोवैज्ञानिक गहराई और आधुनिक जीवन की जटिलताओं के सशक्त रचनाकार थे। हिंदी नाटक को पारंपरिक कथानक और आदर्शवादी दृष्टि से निकालकर उन्होंने जीवन-संघर्ष, अकेलेपन, असमंजस और रिश्तों की टूटन जैसे यथार्थ विषयों से जोड़ा।मोहन राकेश : व्यक्तित्व किसी भी व्यक्ति का कृतित्व उसके व्यक्तित्व की गहराई से प्रभावित होता है, अतः मोहन राकेश के कृतित्व को जानने से पहले आइए, उनके व्यक्तित्व और उनके व्यक्तित्व को प्रभावित करने वाले परिवेश को जान लें, तो बेहतर होगा। मोहन राकेश का जन्म ८ जनवरी १९२५ को अमृतसर में एक सिंधी परिवार में हुआ था। उनका मूल नाम मदन मोहन गुगलानी था। डॉ. सुषमा अग्रवाल के अनुसार ठउनकी दीदी ने उनके लिए नया नाम चुना था- मदन मोहन राकेश। इस नाम से लिखी राकेश की पहली कहानी (नन्ही) 'सरस्वती' में प्रकाशित हुई। बाद में मदन गुगलानी शब्दों को निर्वासित करके जब मोहन राकेश अकेला रह गया, तब उसकी सम्मोहिनी शक्ति से खिंचकर राकेश उसका सहयात्री बन गया। इस प्रकार मदन मोहन गुगलानी से मोहन राकेश नाम बना और हिंदी साहित्य में ख्यात-कीर्त हो गया।ठ मोहन राकेश के पिता का नाम करमचंद गुगलानी था। वे एल. एल. बी. थे और वकालत करते थे। वे वकील होने पर भी साहित्य और संगीत में रूचि रखते थे। राकेश के पिता की आदत में, दोस्तों की महफिल जमाना, साहित्य के बारे में चर्चा करना, देर तक जागकर गपशप लगाना और कुछ घंटों तक अपने गमों को भुलाना शुमार था। मोहन राकेश का मानना था कि ठमेरे लेखन में रूचि उत्पन्न होने का सब से अधिक श्रेय मेरे पिता को है।ठ राकेश सोलहवाँ साल पार कर रहे थे कि १८ फरवरी, १९४१ में उनके पिता की मृत्यु हो गई। राकेश के मन पर एक कठोर आघात हुआ।मोहन राकेश की माँ का नाम 'बचन था। वे अपनी माँ को अम्मा कहकर पुकारते थे। उनके बारे में कृष्णचंदर लिखते हैं कि ठवे बहुत खूबसूरत और ममता से भरपूर मिठाई की तरह मीठी माँ थीं। इतने दुःखों के बाद भी ऐसी मिठास कहाँ से आती है? शायद कुछ औरतें गन्ना होती हैं। धरती से सिर्फ मिठास लेती हैं, बाकी सब कुछ छोड़ देती हैं।ठ माँ की सरलता, उदारता और दयालुता ने राकेश को मानवतावादी इंसान बना दिया था। 'आर्द्रा' कहानी में उनकी अम्मा सजीव हो उठी हैं। राकेश जी ने टूटते संबंधों जोड़ने वाली माँ की तड़फ का ऐसा भावुक चित्र पाठकों के सामने रखा है, जो आज भी चारों तरफ घटता हुआ नजर आता है।मोहन राकेश का बचपन बहुत ही विषम परिस्थितियों में गुजरा - आर्थिक तंगी, पिता की असमय मृत्यु और विभाजन की त्रासदी ने उन्हें बुरी तरह झिंझोड़ दिया था, जो उनकी रचनाओं में साफ साफ दिखाई देता है, उनकी प्रारम्भिक शिक्षा अमृतसर में हुई। लाहौर ओरियंटल कॉलेज में सन १९४१ में सोलह साल की उम्र में उन्होंने `शास्त्री' की उपाधि पाई थी, फिर अंग्रेजी में बी. ए. पास किया। बाद में हिंदी, अंग्रेजी और संस्कृत-तीनों भाषाओं में उन्होंने एम. ए. किया था। उन्होंने मुंबई, शिमला, जालंधर और दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य भी किया १९६१ में उन्होंने सारिका पत्रिका का संपादन भी किया, पर स्वाभिमानी प्रवृत्ति के चलते उन्हें यह सब रास नहीं आया, अतः छोड़ दिया। स्वतंत्र लेखन ही उनकी आजीविका का आधार रहा।उनका वैवाहिक जीवन भी बेहाल ही रहा। पहला विवाह उन्होंने सुशीला से किया, जिससे उसकी स्वार्थी प्रवृति के चलते बाद में विच्छेद हो गया। दूसरी पत्नी पुष्पा भी मानसिक रूप से बीमार रही, 'अंधेरे बंद कमरे' इसी मनःस्थिति में लिखा गया उपन्यास है। तीसरी बार उन्हें अनिताजी से घर का सुख मिला, पर उनके साथ वे वैधानिक रूप से विवाह बंधन में नहीं बंध पाए। ईमानदारी और स्पष्टवादी मोहन राकेश के व्यक्तित्त्व की अनूठी विशेषता है, जोर से ठहाका लगाकर हँसना। उनका ठहाका हिंदी संसार में काफी प्रसिद्ध था। राकेश घर से बाहर दोस्तों से घिरे हुए रहते थे और जोर से ठहाका लगाकर हँसते थे। राकेश के ठहाके के बारें में कमलेश्वर लिखते हैं कि ठवह हँसता तो तारों पर बैठी हुयी चिड़ियाँ पंख फडफडाकर उड़ जाती और राह चलते ऐसे चौंककर देखते जैसे किसी को दिल का दौरा पड़ गया हो। राकेश के ठहाकों को सुनते ही राह चलनेवाले स्तब्ध होकर खड़े रह जाते थे।ठ अपने दोस्तों के साथ जब भी रेस्तराँ में जाते थे, तो वहाँ मॅनेजर को पर्ची भेजनी पढ़ती थी ठप्लीज धीरे सेठ। राकेश जितने जोर से ठहाके लगाकर हँसते थे, उसके पीछे दुःख भी उतना ही बढ़ा छुपा हुआ था। राकेश की सबसे बढ़ी विशेषता यह थी, कि वे खुद भी हँसते थे और दूसरों को भी हँसाते थे। उनके ठहाके की वजह से डॉ. शरेशचंद्र चुलकीमठ लिखते हैं कि ठराकेश के ठहाके की चर्चा के बिना उनके व्यक्तित्व का अंकन अधूरा ही रह जायेगा।ठ उनकी वास्तविक हँसी अलग थी, जिसमें होठ और दांत नजर नहीं आते थे। उनके अंतर्विरोधी व्यक्तित्व के बारे में अनीता लिखती है ठबाहर से राकेश जी जितने सीधे और सरल दिखते थे, उतने वास्तव में नहीं थे। उन्हें, अंदर तक ठीक से समझ पाना, एक बहुत बड़ी तपस्या थी।ठ राकेश के लिए उनके मित्र उनकी संपत्ति थे। मोहन राकेश स्वाभिमानी वृत्ति के थे।
किसी के सामने झुकना उन्हें अच्छा नहीं लगता था। उनके जीवन के अनेक प्रसंग हैं, जहाँ उनका स्वाभिमान दिखाई देता।राकेश को मौत का परिचय भी शीघ्र ही हो गया। चाचा की मौत, पिता की मौत, उनका पहला प्यार दिव्या की मौत, कमला की मौत इन सब की मौत ने राकेश को हिला डाला था। इन सभी की मौत को वे बर्दाश्त कर गए थे, लेकिन अपनी प्यारी अम्मा की मौत को वे बर्दाश्त नहीं कर पाए। १६ अगस्त १९७२ को माँ की मृत्यु के बाद राकेश उदास हो गए थे। उनका सब कुछ छीन लिया गया था। वे भावुक हो जाते थे। माँ की याद में कई दिनों तक रोते रहे और रोते रोते खुद भी ३ दिसंबर, १९७२ को चल बसे। राकेश अपने अंतिम दिनो में कीर्ति, अधिकार, सुविधाएँ, गौरव, संपत्ति आदि सब दृष्टि से उन्नति के शिखर पर थे कि काल ने उन्हें अपने साथ ले जाने की योजना बना डाली। मोहन राकेश : कृतित्वराकेश बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे कहानी, उपन्यास, नाटक, एकांकी, ध्वनि नाटक, बीज नाटक एवं रंगमंच के क्षेत्र में उनका नाम अग्रणी साहित्यकारों में सुशोभित होता है। मोहन राकेश ने लेखन को अपनी में जिंदगी में सर्वाधिक प्राथमिकता दी। वे अपनी पत्नी अनीता से कहते थे ठजिंदगी में पहले नंबर पर मेरे लिए मेरा लेखन है, दूसरे पर मेरे दोस्त और तीसरे पर तुम लेकिन तीनों ही मेरे लिए आवश्यक हैं।ठ राकेश आरंभ में एक कहानीकार के रूप में उभर रहे थे, मगर बाद में हिंदी साहित्य के चोटी के नाटककारों की पंक्ति में जाकर बैठ गए, जिन्होंने हिंदी नाटकों को नई दिशा दी और उन्हें अखिल भारतीय स्तर पर स्थापित किया। अब हिंदी साहित्य में मोहन राकेश मुख्यतः नाटककार के रूप में जाने जाने लगे। आज भी हिंदी नाट्य-क्षेत्र में उनका नाम बड़े आदर के साथ लिया जाता है। स्वातंत्र्योत्तर सांस्कृतिक पुनर्जागरण के युगचेता साहित्यकार मोहन राकेश ने साहित्य-लेखन तो आठ-नौ साल से ही शुरू कर दिया था। केवल सत्रह साल की उम्र में उन्होंने `समझ का फेर' नामक एकांकी लिखा था और उसके बाद उन्होंने हिंदी साहित्य को एक से बढ़कर एक रचनाएँ दी। आधुनिक नाटक के शिखर पुरुष: मोहन राकेश मोहन राकेश को विशेष रूप से उनके नाटकों के लिए जाना जाता है। हिंदी नाट्य जगत में उनका उदय जब हुआ तब भारतीय समाज सांस्कृतिक पुनर्जागरण के ज्वार से आंदोलित हो रहा था। यद्यपि उन्होंने संख्या में बहुत कम नाटक लिखे, पर गुणात्मकता की दृष्टि से उनके नाटक हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं, क्योंकि उनके नाटक आधुनिक मनुष्य की एकांतिक पीड़ा, मध्यवर्गीय कुंठाओं और अस्तित्ववादी चिंतनों को चित्रित करते हैं। 'आषाढ़ का एक दिन', 'आधे-अधूरे', 'लहरों के राजहंस' और 'पैर तले की जमीन' हिंदी नाटक के इतिहास में मील के पत्थर माने जाते हैं। मोहन राकेश का 'आषाढ़ का एक दिन' १९५८ में आया, जो हिंदी का पहला आधुनिक नाटक था, जिसमें उन्होंने कालिदास जैसे ऐतिहासिक पात्र के माध्यम से रचनाकार और सत्ता, प्रेम और महत्वाकांक्षा, निजी सुख और सार्वजनिक यश के द्वंद्व को अत्यंत संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत किया गया है। यह नाटक आधुनिक व्यक्ति की मानसिकता को ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में रखकर उजागर करता है।'आधे-अधूरे’' मध्यवर्गीय परिवार के विघटन और संबंधों की रिक्तता का यथार्थवादी चित्र है। इसके पात्र असंतोष, कुंठा और पहचान-संकट से जूझते हुए आधुनिक जीवन की त्रासदी को सामने लाते हैं।'लहरों के राजहंस’ में बुद्धकालीन पृष्ठभूमि के सहारे वैराग्य और दांपत्य, स्वतंत्रता और बंधन के द्वंद्व को प्रतीकात्मक रूप में उकेरा गया है। मोहन राकेश के नाटकों का मंचन और निर्देशन हिंदी रंगमंच के लिए मील का पत्थर है, जिसमें इब्राहिम अल्काजी, ओम शिवपुरी, श्यामानंद जालान, अरविन्द गौड़, रामगोपाल बजाज जैसे निर्देशकों ने 'आषाढ़ का एक दिन', 'लहरों के राजहंस' और 'आधे अधूरे' जैसे नाटकों को सफलतापूर्वक प्रस्तुत किया गया।'अंडे के छिलके', 'सिपाही की माँ', 'प्यालियां टूटती हैं', 'बहुत बड़ा सवाल' उनके प्रसिद्ध एकांकी हैं। 'सत्य और कल्पना' उनके मरणोपरांत प्रकाशित हुआ। यद्यपि यह एकांकी १९४९ में ही लिख दिया गया था। उनके दो बीज नाटक भी हैं - 'शायद' और 'हं:', 'छतरियां' उनका पार्श्व नाटक और 'रात बीतने तक' ध्वनि नाटक है। इसके अलावा, 'दूध और दांत', 'कंवारी धरती' और 'उसकी रोटी' एकांकी उल्लेखनीय हैं, जिसमें उन्होंने आधुनिक मध्यवर्गीय जीवन की विसंगतियों और मानवीय रिश्तों को गहराई से चित्रित किया है।अस्तित्ववादी कथा-साहित्यकार : मोहन राकेश 'नई कहानी' आंदोलन के अग्रदूत के रूप में उभरते हुए मोहन राकेश ने १९५० के दशक में हिंदी कहानी को नई दिशा दी। उनकी कहानियों ने शहरी मध्यवर्ग की वास्तविकताओं और आधुनिकतावाद को केंद्र में हैं। १९५० में उनका पहला कहानी संग्रह 'इंसान के खँडहर' प्रकाशित हुआ, जिसमें 'मिसपाल', 'आद्रा', 'ग्लासटैंक', 'मलबे का मालिक' जैसी कहानियाँ शामिल रहीं। १९५७ में 'नये बादल' और १९५८ में 'जानवर और जानवर' १९६० में 'एक और जिंदगी' १९६१ में 'पांच लम्बी कहानियां' तथा १९६६ में 'फौलाद का आकाश' कहानी संग्रहों से उन्होंने हिंदी कहानी का परिदृश्य ही बदल दिया क्योंकि ये रचनाएँ परंपरागत आदर्शवाद से हटकर व्यक्तिगत संघर्ष और अस्तित्ववादी चिंताओं पर केंद्रित थीं।मोहन राकेश के उपन्यास भी उतने ही प्रभावशाली हैं, जितनी कहानियां। १९६१ में प्रकाशित 'अंधेरे बंद कमरे' उनका प्रसिद्ध उपन्यास है, जिसमें दांपत्य जीवन की टूटन, भावनात्मक रिक्तता और आत्मसंघर्ष का गहन मनोवैज्ञानिक चित्रण मिलता है। उनके कथा साहित्य में बाहरी घटनाओं से अधिक आंतरिक अनुभूतियों का महत्व है।
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इसके अलावा १९६८ में 'न आनेवाला कल' और १९७२ में 'अंतराल' उनके प्रमुख उपन्यास हैं। मोहन राकेश के उपन्यास उनके व्यक्तित्व का ही प्रतिबिंब है, जो मानवीय रिश्तों की जटिलताओं और बदलते समय के साथ व्यक्ति के संघर्षों को जीवंतता से प्रस्तुत करते हैं। मोहन राकेश की असामयिक मृत्यु के कारण उनके के कई उपन्यास अप्रकाशित ही रह गए, जिनमें प्रमुख हैं - 'स्याह और सफेद', 'कांपता हुआ दरिया', 'कई एक अकेले', 'हिरोशिमा के फूल' और 'नीली रोशनी की बाहें' हैं।काव्य का साधक : मोहन राकेशसफल कथाकार और शिखर नाटककार मोहन राकेश को तो साहित्यजगत में सभी जानते हैं, पर कवि मोहन राकेश की काव्य प्रतिभा से कम ही लोग परिचित हैं। उन्होंने अपनी साहित्यिक यात्रा एक कवि के रूप में ही प्रारंभ की थी। आठ-नौ साल की उम्र में ही उन्होंने हिंदी में कविताएँ लिखना आरंभ कर दिया था। आयु की १३ साल में उन्होंने संस्कृत कविताएँ लिखना शुरू कर दिया था। उनकी अनेक कविताएँ यत्र-तत्र प्रकाशित भी हुई थी। सन १९४४ में लिखी उनकी प्रथम फिल्म पटकथा थी, जिसमें राकेश ने अच्छे गीत भी लिखे हैं -ठदिन ढले दिन ढलेआशा के उज्ज्वल दीप जले।ठ'कुवांरी धरती' शीर्षक एकांकी में विजय नामक एक पात्र के माध्यम से कही गई कविता राकेश की सुंदर कविता है। उनके नाटक 'आषाढ़ का एक दिन' पढ़ते समय किसी भी गंभीर और सहृदय पाठक की नजरों से उनका कवि व्यक्तित्व बचा नहीं रह सकता।बहुआयामी रचनाकार : मोहन राकेश कथा और नाटककार के अतिरिक्त उन्होंने हिंदी साहित्य की विभिन्न विद्याओं पर अपनी लेखनी सफलतापूर्वक चलाई। उन्होंने संस्कृत के महान रचनाकारों की कृतियों का हिंदी अनुवाद किया - 'मृच्छकटिकम', 'शाकुन्तलम', 'स्वप्नवासवदत्ता' 'आखिरी चट्टान तक', 'पतझड़ का रंगमंच', 'ऊंची झील' उनके यात्रा-वृत्तांत हैं।'दिल्ली रात की बाहों में', और 'सतयुग के लोग' रेखाचित्र, 'समय सारथी' जीवनी, 'परिवेश' संस्मरण, 'बिना हाड़ मांस का आदमी' बाल कहानी संग्रह हैं'बकलम खुद', 'रंगमंच और शब्द', 'शब्द और ध्वनि' उनके प्रसिद्ध निबंध संग्रह हैं, इसके अलावा 'मोहन राकेश की डायरी' और 'नाट्य-विमर्श' उनकी उल्लेखनीय रचनाएं तथा 'द ड्रामेटिक वर्ड' शोध ग्रन्थ जो उनकी असामयिक मृत्यु के कारण उनका अधूरा रहा।वे आधुनिक हिंदी साहित्य के ऐसे सृजनशील लेखक हैं, जिन्होंने नाटक और कथा को नई दृष्टि दी, इसीलिए उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और नेहरू फेलोशिप से सम्मानित किया गया थाभाषा और शिल्पभाषा प्रयोग में मोहन राकेश सिद्धहस्त थे, उनकी भाषा विषय और प्रसंग के अनुकूल, संस्कृत निष्ठ, परिमार्जित हिंदी की खड़ी बोली है, जिसमें पात्रानुसार उर्दू और अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग भी हुआ है। नाटकों और एकांकी के प्राण- उनके संवाद स्वाभाविक और प्रभावपूर्ण होते हैं, जो पात्रों की मानसिक स्थिति को स्पष्ट करते हैं। उन्होंने नाट्यशिल्प में मौन, अधूरे वाक्य और प्रतीकों का सशक्त प्रयोग किया, जो उनकी रचनाओं को विशिष्ट बनाता है। उनकी रचनाओं में वर्णनात्मक, विवरणात्मक, चित्रात्मक और भावात्मक शैली का प्रयोग खुलकर हुआ है।उपसंहारमोहन राकेश ने न केवल हिंदी साहित्य को आधुनिक चेतना से जोड़ा, बल्कि उन्होंने यह भी दिखाया कि साहित्य केवल आदर्शों का घोष नहीं, बल्कि जीवन की जटिल सच्चाइयों की अभिव्यक्ति है। उनका जीवन अनुभवों से भरा रहा। व्यक्तिगत संबंधों की जटिलताएँ, आर्थिक संघर्ष और आंतरिक द्वंद्व उनकी रचनाओं में स्वाभाविक रूप से प्रतिध्वनित होते हैं। उनकी रचनाएँ पाठक और दर्शक, दोनों को सोचने पर विवश करती हैं। आधुनिक हिंदी नाटक साहित्य को एक नई दिशा प्रदान करने वाले बहुमुखी प्रतिभा के धनी मोहन राकेश अपने दौर के महानायक साहित्यकार माने जाते हैं। उनके नाटक आज भी मंचित होते हैं और प्रासंगिक बने हुए हैं, क्योंकि उनमें चित्रित संघर्ष आज के मनुष्य के भी हैं। संक्षेप में कहा जाए, तो मोहन राकेश हिंदी साहित्य जगत में कभी न भुला देने वाला व्यक्तित्व है।
डॉ. मधु गुप्ता
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