`साहित्य केवल शब्दों का खेल नहीं,
वह तो मानव-हृदय का स्पंदन है।
जो साहित्य हृदय को आंदोलित न करे,
वह साहित्य कहलाने योग्य नहीं।'
-पदुमलाल पुन्नालाल बक्शी
साहित्य की चेतना जब किसी युग की आवश्यकता बनती है, तब समय कुछ ऐसी कालजयी विभूतियों को जन्म देता है, जो अपनी लेखनी से न केवल समकालीन समाज को दिशा देते हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी वैचारिक पाथेय तैयार करते हैं।
आधुनिक हिंदी साहित्य के इतिहास में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के बाद जिस एक नाम ने हिंदी गद्य, समीक्षा और संपादन कला को सबसे अधिक संस्कारित और परिमार्जित किया,वह नाम पदुमलाल पुन्नालाल बक्शी का है। द्विवेदी युग के इस मूर्धन्य साहित्यकार ने अपनी संवेदनशीलता, अगाध विद्वत्ता और निष्पक्ष दृष्टि से हिंदी साहित्य को समृद्ध किया। उनका संपूर्ण जीवन और उनका कृतित्व हिंदी भाषा के उत्थान की एक गौरवशाली गाथा है। बक्शी जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। वे एक प्रखर निबंधकार, कुशल संपादक, गंभीर आलोचक, भावुक कवि और मर्मस्पर्शी कहानीकार थे। साहित्य की लगभग हर विधा पर उनकी लेखनी चली और जहाँ भी चली, वहाँ उन्होंने अपनी मौलिकता और भाषाई शुचिता की अमिट छाप छोड़ी। उनके इस बहुआयामी और अविस्मरणीय साहित्यिक योगदान का मूल्यांकन किए बिना आधुनिक हिंदी गद्य के विकास का इतिहास अधूरा रहता है।
बख्शी जी का साहित्यिक जीवन उस दौर में शुरू हुआ, जब हिंदी साहित्य `द्विवेदी युग' के प्रभाव से निकलकर `छायावाद' की ओर उन्मुख हो रहा था। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के मार्गदर्शन में उन्होंने न केवल हिंदी लेखन को परिष्कृत किया, बल्कि स्वयं भी एक मानक स्थापित किया। यह एक ऐतिहासिक मोड़ था। बक्शी जी के जीवन की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धि `सरस्वती' पत्रिका का संपादन रही।
उनकी साहित्यिक-यात्रा को मुख्य रूप से तीन चरणों में विभाजित किया जा सकता है :-
प्रारंभिक चरण अनुसरण का युग था। इस दौरान उन्होंने अपने पूर्ववर्ती साहित्यकारों और द्विवेदी जी के आदर्शों का अनुसरण किया। उनकी शुरुआती रचनाओं में नीति और नैतिकता का पुट अधिक था।
परिपक्व चरण उनके निबंध और आलोचना का युग था। यह उनके जीवन का सबसे स्वर्णिम काल था। इस दौरान उन्होंने 'पञ्चपात्र', 'मकरंद' और 'विश्व-साहित्य' जैसी कालजयी रचनाएँ दीं। यहाँ उनका स्वतंत्र चिंतन और दार्शनिक दृष्टिकोण स्पष्ट रूप से उभर कर सामने आया। उत्तरार्ध चरण उनके चिंतन और व्याख्या का था, जब जीवन के अंतिम वर्षों में उनका लेखन अधिक दार्शनिक और आत्मपरक हो गया था।
निबंधकार के रूप में स्थापित होने के साथ-साथ बक्शी जी का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण और युगीन अवदान `सरस्वती' पत्रिका के संपादन के रूप में है। `सरस्वती' केवल एक पत्रिका नहीं थी, बल्कि वह आधुनिक हिंदी भाषा और साहित्य को गढ़ने वाली एक महान संस्था थी। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने जिस महती कार्य को प्रारंभ किया था, उसे उनके बाद पूरी निष्ठा, कुशलता और गरिमा के साथ आगे बढ़ाने का उत्तरदायित्व पदुमलाल पुन्नालाल बक्शी जी ने ही सँभाला।
पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का नाम हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के बाद, उन्होंने 'सरस्वती' पत्रिका के संपादन का उत्तरदायित्व सँभाला। यह एक अत्यंत चुनौतीपूर्ण कार्य था, क्योंकि `सरस्वती' उस समय हिंदी साहित्य का मानकीकरण करने वाली एकमात्र संस्था के समान थी। बख्शी जी ने न केवल इस पत्रिका की गरिमा को बनाए रखा, बल्कि इसे नए लेखकों के लिए एक `प्रशिक्षण केंद्र' के रूप में विकसित किया। उन्होंने अपनी संपादकीय टिप्पणियों के माध्यम से हिंदी के व्याकरण और शैली को समृद्ध किया।
बक्शी जी के जीवन की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धि 'सरस्वती' पत्रिका का संपादन रही। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के बाद, उन्होंने दो बार इस प्रतिष्ठित पत्रिका का संपादन भार सँभाला :-
प्रथम काल: १९२० से १९२७ तक।
द्वितीय काल: १९५२ से १९५६ तक।
उन्होंने द्विवेदी जी की इस विशेष परंपरा को आगे बढ़ाते हुए भाषा को परिष्कृत करने और नए लेखकों को मंच देने का सराहनीय कार्य किया। द्विवेदी जी के कड़े अनुशासन के बाद हिंदी भाषा में जो स्थिरता और व्याकरणिक शुद्धता आई थी, बक्शी जी ने उसे एक नया लचीलापन, माधुर्य और व्यापकता प्रदान की। संपादक के रूप में उनकी दृष्टि अत्यंत उदार और पारदर्शी थी। उन्होंने देश के कोने-कोने से उभरते हुए नए और युवा रचनाकारों की प्रतिभा को पहचाना, उन्हें संबल दिया और उनकी रचनाओं को परिमार्जित करके `सरस्वती' में स्थान दिया। उनके संपादन काल में `सरस्वती' का स्वरूप और अधिक कलात्मक, साहित्यिक और वैचारिक रूप से समृद्ध हुआ। उन्होंने तत्कालीन साहित्यिक विमर्श को एक नई ऊँचाई दी और हिंदी पत्रकारिता के समक्ष संपादन के ऐसे मानक स्थापित किए, जो आज भी अनुकरणीय हैं।
बक्शी जी के साहित्यिक व्यक्तित्व का सबसे जाज्वल्यमान पक्ष उनका निबंध-लेखन है। हिंदी निबंध के क्षेत्र में आचार्य रामचंद्र शुक्ल और बाबू गुलाबराय के समकालीन होते हुए भी बक्शी जी ने अपनी एक सर्वथा भिन्न और अनूठी शैली विकसित की। उनके निबंधों को पढ़ते हुए यह स्पष्ट आभास होता है कि वे केवल विचारों का प्रतिपादन नहीं कर रहे हैं, बल्कि पाठक के साथ एक अत्यंत आत्मीय संवाद स्थापित कर रहे हैं। उनके निबंधों में विचारशीलता और भावुकता का ऐसा दुर्लभ समन्वय मिलता है, जो अन्यत्र दुर्लभ है। उन्हें विशेष रूप से हिंदी `ललित निबंध' परंपरा के आधार स्तंभों में गिना जाता है। `पंचपात्र', `पद्मवन', `कुछ और कुछ',`अतीत स्मृति', `उत्सव' और `यात्री' जैसे निबंध-संग्रहों में उनकी यह कला अपने चरमोत्कर्ष पर दिखाई देती है। उनके निबंधों के विषय अत्यंत वैविध्यपूर्ण हैं। वे जीवन के अत्यंत साधारण प्रसंगों, जैसे किसी त्योहार, किसी यात्रा या अतीत की किसी धुँधली याद से लेकर धर्म, दर्शन, समाज और अंतर्राष्ट्रीय साहित्य जैसे अत्यंत गंभीर विषयों पर समान अधिकार के साथ लिखते थे। बक्शी जी के ललित निबंधों में जो आत्मपरकता और आत्मीयता है, उसने आगे चलकर हिंदी में ललित निबंध की समृद्ध परंपरा की आधारशिला रखी। वे गंभीर से गंभीर दार्शनिक विचारों को भी इतने सहज और सुबोध ढंग से प्रस्तुत करते थे कि पाठक बिना किसी मानसिक बोझ के उन विचारों की गहराई में उतर जाता था। उनके निबंधों में जीवन के प्रति एक गहरी सकारात्मकता, मानवीय सहानुभूति और एक दार्शनिक औदात्य सर्वत्र व्याप्त है।
बक्शी जी मुख्य रूप से अपने ललित और विचारात्मक निबंधों के लिए विख्यात हैं। उनके निबंधों में दार्शनिकता और आत्मीयता का अनूठा मिश्रण मिलता है :-
`पंचपात्र' उनका अत्यंत लोकप्रिय और प्रतिनिधि निबंध संग्रह है, जिसमें जीवन के विभिन्न पक्षों पर गंभीर और रोचक निबंध संकलित हैं। 'पद्मवन' संग्रह के निबंधों में प्रकृति, सौंदर्य और मानवीय अनुभूतियों का बहुत ही सुंदर चित्रण हुआ है।
`कुछ और कुछ' में समकालीन सामाजिक, साहित्यिक और वैचारिक विषयों पर लिखे गए निबंध शामिल हैं। `अतीत स्मृति' संग्रह संस्मरणात्मक निबंधों पर आधारित है, जिसमें लेखक ने अपने जीवन और बीते समय की स्मृतियों को जीवंत किया है। `उत्सव' भारतीय संस्कृति, पर्वों और लोक-जीवन के उल्लास को समेटे हुए निबंधों का संग्रह है। `यात्री' में जीवन को एक यात्रा के रूप में देखते हुए लिखे गए वैचारिक निबंध हैं।
एक समीक्षक और आलोचक के रूप में बक्शी जी का योगदान हिंदी आलोचना के क्षेत्र में एक नए दृष्टिकोण का सूत्रपात करता है। उनकी आलोचना पद्धति किसी संकीर्णवाद, पूर्वाग्रह या रूढ़िवादिता से बँधी हुई नहीं थी। वे भारतीय काव्यशास्त्र के सिद्धांतों के जितने गहरे ज्ञाता थे, पाश्चात्य साहित्य और दर्शन पर भी उनकी उतनी ही पकड़ थी। उनकी प्रमुख आलोचनात्मक कृतियाँ `हिंदी साहित्य विमर्श', `विश्व साहित्य', `प्रदीप' और `साहित्य-शिक्षा' हिंदी आलोचना जगत की अमूल्य निधियाँ हैं। `हिंदी साहित्य विमर्श' में उन्होंने हिंदी साहित्य के विकासक्रम, उसकी प्रवृत्तियों और उसकी अंतर्निहित शक्ति का जो तटस्थ विश्लेषण किया है, वह उनकी सूक्ष्म अंतर्दृष्टि का परिचायक है। वहीं दूसरी ओर, `विश्व साहित्य' के माध्यम से उन्होंने हिंदी पाठकों और लेखकों को संसार की अन्य समृद्ध भाषाओं के साहित्य, उनकी शैलियों और उनके वैचारिक आंदोलनों से परिचित कराया। उन्होंने यूनानी, अंग्रेजी, प्रâांसीसी और जर्मन साहित्य के महान विचारकों के सिद्धांतों की तुलना भारतीय साहित्य दर्शन से करते हुए एक व्यापक और तुलनात्मक आलोचना दृष्टि विकसित की। उनकी आलोचना का मुख्य उद्देश्य किसी कृति में कमियाँ ढूँढना नहीं, बल्कि उसके भीतर छिपे सौंदर्य, उसके जीवन-मूल्यों और उसकी प्रासंगिकता को उद्घाटित करना था। वे लेखक की रचनात्मक स्वतंत्रता के प्रबल समर्थक थे और यही कारण है कि उनकी समीक्षाओं में हमेशा एक रचनात्मक सहानुभूति दिखाई देती है।
`आलोचना और साहित्य-इतिहास' में एक समीक्षक के रूप में बक्शी जी ने हिंदी और विश्व साहित्य के सिद्धांतों की बहुत ही निष्पक्ष और तुलनात्मक व्याख्या की है। `हिंदी साहित्य विमर्श' हिंदी साहित्य के विकासक्रम, उसकी विभिन्न धाराओं और प्रवृत्तियों का विश्लेषण करने वाला एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है। `विश्व साहित्य' ग्रंथ के माध्यम से उन्होंने हिंदी पाठकों को दुनिया की अन्य भाषाओं के महान साहित्यकारों और साहित्यिक आंदोलनों से परिचित कराया। `प्रदीप' साहित्य के मूलभूत सिद्धांतों और तत्त्वों पर प्रकाश डालने वाली आलोचनात्मक कृति है। `साहित्य-शिक्षा' विद्यार्थियों और साहित्य-प्रेमियों के लिए साहित्य के स्वरूप को समझाने वाली एक अत्यंत सुबोध पुस्तक मानी जाती है।
यद्यपि बक्शी जी की ख्याति मुख्य रूप से उनके गद्य लेखन, संपादन और समीक्षा के कारण हुई, परंतु उनके भीतर एक अत्यंत संवेदनशील कवि और भावुक कथाकार भी निरंतर सक्रिय था। उनके काव्य संसार की झलक उनके`शतदल' और `अश्रुदल' जैसे काव्य संग्रहों में मिलती है। द्विवेदी युग के कवियों में बक्शी जी की कविताओं का स्वर थोड़ा भिन्न और आंतरिक अनुभूतियों से युक्त था।
`शतदल' (काव्य-संग्रह) उनकी प्रारंभिक और महत्त्वपूर्ण कविताओं का संग्रह है, जिसमें प्रकृति-प्रेम और मानवीय संवेदनाओं की प्रधानत्ाा है। `अश्रुदल' (दूसरा काव्य-संग्रह) में हृदय की पीड़ा, करुणा और रहस्यवादी भावनाओं को अभिव्यक्त करने वाली कविताओं का संकलन है।
द्विवेदी युग की कविता जहाँ इतिवृत्तात्मकता और उपदेशात्मकता से बोझिल हो रही थी, वहीं बक्शी जी की कविताओं में एक आंतरिक तरलता, प्रकृति-प्रेम और रहस्यवादी भावना के दर्शन होते हैं। उनकी कविताओं की भाषा सरल और गेय है, जिनमें हृदय की कोमल अनुभूतियों को अभिव्यक्ति मिली है।
कथा साहित्य के क्षेत्र में भी उन्होंने अपनी विशिष्ट उपस्थिति दर्ज कराई। `झलमला' और `अंजलि' जैसे कहानी-संग्रहों के माध्यम से उन्होंने सामाजिक और पारिवारिक जीवन की सूक्ष्म संवेदनाओं को कहानियों के रूप में ढाला। उनकी कहानियों में कोई कृत्रिम कौतूहल या नाटकीयता नहीं होती, बल्कि वे जीवन के यथार्थ, मानवीय संबंधों के अंतर्द्वंद्व और समाज के वंचित वर्ग के प्रति गहरी सहानुभूति से उपजी हुई कहानियाँ हैं। उनकी कहानियों की भाषा इतनी सहज और प्रवाहमयी होती है कि पाठक पात्रों के सुख-दु:ख के साथ पूरी तरह तादात्म्य स्थापित कर लेता है।
बक्शी जी ने अपनी कहानियों में सामाजिक और पारिवारिक जीवन के मर्म को बहुत ही सहजता से छुआ है। जहाँ `झलमला' ग्रामीण और कस्बाई जीवन के यथार्थ तथा मानवीय रिश्तों के ताने-बाने को बुनती कहानियों का संग्रह है, वहीं `अंजलि' संवेदना और आदर्शों से ओत-प्रोत कहानियों का संकलन है।
उनकी कुछ अनूदित कृतियाँ भी हैं। बक्शी जी ने विदेशी साहित्य का भी गहन अध्ययन किया था और उन्होंने कुछ महत्त्वपूर्ण अनुवाद कार्य भी किए। उन्होंने जर्मन इतिहास और संस्कृति से हिंदी पाठकों को परिचित कराने के लिए 'जर्मनी का इतिहास' ग्रंथ का अनुवाद किया था।
`उन्मुक्ति का बंधन' उनके प्रसिद्ध अनुवाद कार्यों में से एक है।
`भोला' बाल-साहित्य और सरल कथा-प्रसंगों से जुड़ी रचना है।
`वे दिन' अतीत के संस्मरणों और रेखाचित्रों का संक्षिप्त संकलन है।
बक्शी जी के विराट साहित्यिक व्यक्तित्व को समझने के लिए उनकी प्रमुख रचनाओं और उन्हें मिले सम्मानों का विवरण देखना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कविता, कहानी, निबंध, आलोचना और अनुवाद जैसी अनेक विधाओं में विपुल साहित्य की रचना की।
पुरस्कार, सम्मान और उपाधियाँ
पदुमलाल पुन्नालाल बक्शी जी एक निस्पृह साहित्यकार थे, जो यश और पुरस्कारों की चकाचौंध से दूर रहकर मौन-साधना में विश्वास रखते थे। इसके बावजूद, हिंदी जगत ने उनकी महानता को पहचाना और उन्हें कई सर्वोच्च सम्मानों से विभूषित किया।
अकादमिक सम्मान: मध्य प्रदेश शासन और विभिन्न हिंदी साहित्य सम्मेलनों ने उन्हें बार-बार अकादमिक सम्मान से सम्मानित किया। हालाँकि, उनके लिए सबसे बड़ा पुरस्कार पाठकों का वह प्रेम था, जो उनकी कृतियों को आज भी पढ़ता है और उनसे प्रेरणा लेता है।
हिंदी साहित्य सम्मेलन (प्रयाग) द्वारा उन्हें साहित्य जगत की सर्वोच्च और अत्यंत प्रतिष्ठित उपाधि `साहित्य वाचस्पति' से सम्मानित किया गया। यह सम्मान हिंदी भाषा और साहित्य की जीवन पर्यंत की गई उनकी अमूल्य सेवा के लिए दिया गया था। साहित्य के क्षेत्र में उनके विशिष्ट योगदान के लिए उन्हें `वाचस्पति' जैसी प्रतिष्ठित मानद उपाधि से विभूषित किया गया। यह उनके विद्वत्तापूर्ण व्यक्तित्व का प्रमाण था। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के पदचिह्नों पर चलने और `सरस्वती' के कुशल संपादन के लिए उन्हें `द्विवेदी पदक' से भी सम्मानित किया गया। बक्शी जी का जन्म और कर्म स्थल छत्तीसगढ़ रहा, इसलिए वहाँ की सरकार और संस्थाओं ने उन्हें राज्य स्तरीय सम्मान और स्मृति विशेष सम्मान दिया।
छत्तीसगढ़ सरकार ने उनकी साहित्यिक विरासत को जीवित रखने के लिए भिलाई में उनके नाम पर एक 'पदुमलाल पुन्नालाल बक्शी सृजनपीठ' की स्थापना की है। यह पीठ नए लेखकों और शोधकर्ताओं को प्रोत्साहित करती है। छत्तीसगढ़ शासन द्वारा उनकी स्मृति में साहित्यकारों को सम्मानित करने के लिए 'सम्मान निधि' जैसे पुरस्कारों की घोषणा की गई है, जिससे आने वाली पीढ़ी उनके आदर्शों से जुड़ सके।
बक्शी जी के लिए यह अकादमिक गौरव की बात थी कि उनकी कुछ रचनाओं को पाठ्यक्रमों में स्थान मिला। बक्शी जी को सबसे बड़ा सम्मान तब मिला, जब उनकी रचनाओं (जैसे `झलमला', `पंचपात्र' के निबंध) को भारत के विभिन्न राज्यों के माध्यमिक और उच्च माध्यमिक शिक्षा बोर्डों के हिंदी पाठ्यक्रमों में अनिवार्य रूप से शामिल किया गया। आज भी लाखों विद्यार्थी उनके सिद्धांतों को पढ़कर संस्कारित हो रहे हैं।
उनकी साहित्यिक सेवाओं के सम्मान स्वरूप साहित्य-प्रेमियों और विद्वानों ने `बक्शी अभिनंदन ग्रंथ' का भी प्रकाशन किया, जिसमें उनके कृतित्व और व्यक्तित्व का विस्तृत विश्लेषण किया गया है। मध्य प्रदेश शासन और विभिन्न प्रांतीय साहित्यिक संस्थाओं द्वारा समय-समय पर उन्हें राजकीय सम्मान और सम्मान-ग्रंथ से सम्मानित किया गया।
सादगी का पुरस्कार एक विशेष पुरस्कार था। बक्शी जी के लिए सबसे बड़ा पुरस्कार उनके पाठकों का प्रेम था। वे खैरागढ़ की गलियों में एक साधारण धोती-कुर्ता पहने घूमते थे और बच्चों के साथ बच्चा बन जाते थे। उनकी सादगी का आलम यह थ्ाा कि बड़े-बड़े सम्मान पाकर भी उन्होंने कभी अहंकार को पास नहीं फटकने दिया। मध्य प्रदेश के प्रतिष्ठित सागर विश्वविद्यालय द्वारा उन्हें उनकी असाधारण विद्वत्ता, साहित्यिक योगदान और शोधपरक दृष्टि के लिए `डॉक्टर ऑफ लिटरेचर' (डी.लिट.) की मानद उपाधि से विभूषित किया गया।
`सरस्वती' के यशस्वी संपादक के रूप में सम्मान प्राप्त करना कोई सरकारी पुरस्कार नहीं था, परंतु आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के बाद `सरस्वती' जैसी युगीन पत्रिका का संपादन भार सँभालना और संपूर्ण हिंदी जगत से `कुशल संपादक' के रूप में मान्यता पाना उनके जीवन का सबसे बड़ा सम्मान माना जाता है।
बक्शी जी को किसी एक विधा की सीमा में नहीं बाँधा जा सकता। उनकी रचनाएँ और उन्हें मिले ये सम्मान इस बात का प्रमाण हैं कि वे आधुनिक हिंदी गद्य के एक ऐसे आधार स्तंभ थे, जिन्होंने हिंदी भाषा को गरिमा और वैश्विक दृष्टि दोनों प्रदान की।
बक्शी जी के संपूर्ण साहित्य का जब हम भाषा और शैली के धरातल पर विश्लेषण करते हैं, तो हमें उनकी भाषाई निष्ठा और कलात्मक संयम के दर्शन होते हैं। वे भाषा की शुद्धता, व्याकरणिक सटीकता और वर्तनी की पवित्रता के प्रति अत्यंत सजग थे। उनका मानना था कि भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं है, बल्कि वह किसी भी समाज की संस्कृति और उसकी बौद्धिक चेतना का दर्पण होती है। उन्होंने अपने लेखन में शुद्ध, परिमार्जित और तत्समप्रधान खड़ीबोली का प्रयोग किया, किंतु वे इस बात का सदैव ध्यान रखते थे कि भाषा कहीं भी क्लिष्ट, दुरूह या कृत्रिम न होने पाए। उनके गद्य में एक स्वाभाविक प्रवाह और संगीतात्मकता है। विषयों के अनुरूप उनकी शैली भी बदल जाती थी। जब वे किसी गंभीर दार्शनिक या साहित्यिक विषय पर लिखते थे, तो उनकी शैली विवेचनात्मक, तार्किक और विश्लेषणात्मक हो जाती थी, जहाँ हर वाक्य नपा-तुला और गंभीर अर्थ लिए होता था। वहीं, जब वे ललित निबंध या संस्मरण लिखते थे, तो उनकी शैली में एक अद्भुत लालित्य, काव्यात्मकता और हास्य-व्यंग्य का पुट आ जाता था। सूक्तियों और विचारों को छोटे-छोटे वाक्यों में पिरोकर प्रस्तुत करने में वे सिद्धहस्त थे। उनके गद्य की यह विशेषता थी कि वह पाठक के मस्तिष्क को उद्वेलित करने के साथ-साथ उसके हृदय को भी रससिक्त करता था।
२७ मई १८९४ को पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का जन्म छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले के खैरागढ़ की रियासत में हुआ था। उनके पिता पुन्नालाल बख्शी और बाबा उमराव बक्शी दोनों ही साहित्य-प्रेमी और विद्वान थे। साहित्यिक वातावरण ने बालक पदुमलाल के भीतर लेखन के बीज बचपन में ही बो दिए थे। खैरागढ़ के नवाब परिवार के साथ उनका निकट का संबंध रहा, जिसके कारण उन्हें एक ऐसा वातावरण मिला, जहाँ शिक्षा और साहित्य की साधना को सर्वोच्च स्थान प्राप्त था।
उनकी प्रारंभिक शिक्षा खैरागढ़ में ही हुई और प्रयाग विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। उनकी मेधा और साहित्य के प्रति गहरी रुचि को देखते हुए उन्हें उच्च शिक्षा के लिए जबलपुर भेजा गया। उन्होंने अपनी शिक्षा-दीक्षा के दौरान ही साहित्य की जटिलताओं को समझना आरंभ कर दिया था। बख्शी जी का व्यक्तित्व सरल, शांत और गंभीर था। यही सादगी उनके लेखन में भी परिलक्षित होती है।
उन्होंने अपने करियर की शुरुआत एक शिक्षक के रूप में की, लेकिन शीघ्र ही वे पूरी तरह साहित्य-साधना में रम गए। बख्शी जी ने २८ दिसंबर १९७१ को इस नश्वर संसार से विदा ली, लेकिन उनके विचार और उनका साहित्य आज भी जीवित है। वे एक ऐसे साहित्यकार थे, जिन्होंने कलम को तलवार नहीं, बल्कि मरहम बनाया। उन्होंने समाज को उपदेश नहीं दिया, बल्कि अपने लेखन के माध्यम से सोचने की शक्ति प्रदान की।
उनकी संपूर्ण साहित्यिक-यात्रा इस बात का प्रमाण है कि यदि साहित्य में आत्मा का संचार हो, तो वह कालजयी हो जाता है। बख्शी जी की रचनाएँ, चाहे `पञ्चपात्र' के दार्शनिक निबंध हों या `विश्व-साहित्य' की आलोचनात्मक दृष्टि, सब इस बात को सिद्ध करती हैं कि वे हिंदी-साहित्य के एक ऐसे `महापुरुष' थे, जिनकी अनुपस्थिति आज भी साहित्य-जगत में महसूस की जाती है।
हिंदी साहित्य के विद्यार्थी, शोधकर्ता और सामान्य पाठक; सभी के लिए बख्शी जी का साहित्य एक मार्गदर्शिका के समान है। उनकी लेखनी ने हिंदी को जो गरिमा प्रदान की, वह उसे युगों-युगों तक अक्षुण्ण रखेगी। वे न केवल अपने समय के साहित्यकार थे, बल्कि वे सदा के लिए हिंदी साहित्य के एक अविभाज्य अंग बन चुके हैं।
पदुमलाल पुन्नालाल बक्शी जी का साहित्यिक अवदान केवल उनकी पुस्तकों या उनके संपादन तक ही सीमित नहीं है, बल्कि उन्होंने अपने जीवन और आचरण से साहित्य-साधना का जो आदर्श प्रस्तुत किया, वह भी उनका एक बड़ा योगदान है। वे अत्यंत सरल, विनीत, आडंबरहीन और निस्पृह व्यक्ति थे। यश और धन की लालसा से दूर रहकर उन्होंने जीवन पर्यंत छत्तीसगढ़ की धरती पर बैठकर हिंदी की मौन सेवा की। वे एक सच्चे `साहित्य साधक' थे, जिनके लिए साहित्य कर्म कोई व्यवसाय नहीं, बल्कि एक पवित्र अनुष्ठान था। प्रांतीयता के बंधनों से ऊपर उठकर उन्होंने हिंदी को एक अखिल भारतीय और वैश्विक पहचान दिलाने का स्वप्न देखा था और अपने लेखन के माध्यम से उस स्वप्न को साकार करने का निरंतर प्रयास किया। उन्होंने ज्ञान के विभिन्न अनुशासनों के बीच एक सेतु का निर्माण किया, जिससे हिंदी गद्य को एक नई वैचारिक परिपक्वता प्राप्त हुई।
आज के इस संक्रमण काल में, जब भाषा की शुद्धता और साहित्य के उच्च मूल्य निरंतर चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, पदुमलाल पुन्नालाल बक्शी जी का साहित्य और उनका जीवन-दर्शन और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है। उन्होंने हमें सिखाया कि भाषा की मर्यादा की रक्षा कैसे की जाती है, आलोचना में निष्पक्षता और उदारता का क्या महत्त्व है और संपादन किस प्रकार एक सामाजिक और सांस्कृतिक उत्तरदायित्व है। उनकी कृतियाँ आज भी हिंदी के लेखकों, समीक्षकों और अध्येताओं के लिए एक समृद्ध पाठशाला की तरह हैं, जहाँ से गुजरकर कोई भी अपनी भाषाई और वैचारिक चेतना को परिष्कृत कर सकता है। सोशल मीडिया के युग में जब भाषा विकृत हो रही है, बख्शी जी की मानक हिंदी और व्याकरणिक शुद्धता का अध्ययन अत्यंत आवश्यक है।
आधुनिक हिंदी गद्य के निर्माण, विकास और संवर्धन में उनका जो ऐतिहासिक और रचनात्मक अवदान है, वह काल के थपेड़ों से कभी धुँधला नहीं हो सकता। अपनी लेखनी की गरिमा, विचारों की उदात्तता और संपादन की कुशलता के कारण पदुमलाल पुन्नालाल बक्शी जी का नाम और उनका साहित्यिक योगदान हिंदी वाङ्मय के इतिहास में युग-युगांतर तक एक अमिट और अविस्मरणीय धरोहर के रूप में सुरक्षित रहेगा।
नीति भारती खरे