वर दे, वीणावादिनि वर दे

यह लेख सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के प्रसिद्ध गीत ‘वर दे, वीणावादिनी वर दे’ का साहित्यिक, सांस्कृतिक और वैचारिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इसमें देवी सरस्वती के ज्ञान, विवेक और नवचेतना के स्वरूप के साथ गीत में निहित राष्ट्रप्रेम, विश्वप्रेम, स्वतंत्रता की आकांक्षा, सामाजिक समानता और नवीन मूल्यों की स्थापना जैसे विचारों को रेखांकित किया गया है। लेख ब्रिटिश शासन के दौर में रचित इस गीत की ऐतिहासिक प्रासंगिकता तथा स्वतंत्रता के बाद भी जाति, वर्ग, धर्म, विचार और अज्ञान से जुड़े बंधनों से मुक्ति की आवश्यकता पर प्रकाश डालता है। निराला के ‘नव’ और ‘नवल’ के प्रयोगों की तुलना हरिवंश राय बच्चन की ‘नव वर्ष’ कविता से करते हुए लेख नवता, सृजनशीलता और युवा पीढ़ी की स्वतंत्र उड़ान के संदेश को भी स्पष्ट करता है।

Oct 9, 2026 - 15:18
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वर दे, वीणावादिनि वर दे
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सरस्वती विद्या, विवेक और वाणी की देवी हैं। सरस्वती हमारे जीवन में संगीत, कला, नृत्य, साहित्य और संस्कृति लेकर आती हैं। देवी भागवत में कहा गया है कि सरस्वती परम विदुषी हैं। उन्हें संगीत और अध्ययन प्रिय है। वे श्वेत परिधान में रहती हैं। 'दुर्गा सप्तशती' में माँ के तीन रूपों-महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती का सुंदर वर्णन है, जो क्रमशः माँ का तामसिक, राजसिक और सात्त्विक रूप है। नवरात्रि की प्रथम तीन रात्रियों में दुर्गा की पूजा शक्ति के रूप में होती है, जिससे तमस पर विजय प्राप्त होती है। उसके बाद तीन रात्रियों में लक्ष्मी की पूजा होती है, जिससे रजस् का प्रभाव दूर होता है और अंतिम तीन दिनों में सरस्वती की पूजा होती है, जिससे सात्त्विक गुणों का विकास होता है। वे सत्य का ज्ञान कराती हैं।
संस्कृत में सरस्वती-वंदना में 'या कुंदेंदु तुषार हार धवला, या शुभ्र वस्त्रावृत्ता' और हिंदी में 'वर दे, वीणा वादिनी वर दे' सर्वप्रमुख हैं। संस्कृत की वंदना में माँ सरस्वती से सम्पूर्ण जड़ता और अज्ञान को दूर करने वाली माँ से रक्षा करने की प्रार्थना है।
'वर दे, वीणावादिनी वर दे' गीत में कवि ने अपने लिए किसी चीज़ की कामना नहीं की है। उसकी कामना भारत में 'प्रिय स्वतंत्र रव, अमृत-मंत्र नव' भर देने की है, विश्व को जगमगा कर देने की है-'जगमग जग कर दे'। एक साथ अपने देश और समस्त विश्व की ऐसी चिंता सरस्वती-संबंधी किसी भी प्रार्थना और वंदना में नहीं है। 'वर दे, वीणावादिनी वर दे' में भारत-प्रेम और विश्व-प्रेम दोनों एक साथ हैं।
'निराला' की 'गीतिका' में संकलित यह गीत पटना से प्रकाशित 'युवक' मासिक पत्रिका के सितम्बर १९३१ के अंक में प्रकाशित हुआ था। मात्र ६३ शब्दों के इस गीत की अर्थवत्ता द्विविध है। एक अर्थ तद्‌युगीन है, दूसरा युग-युगीन।
परतंत्र भारत का कवि प्रार्थना करता है कि वर देने वाली और वीणा बजाने वाली सरस्वती, तुम मुझे वर दो कि भारतवर्ष में वाणी का प्रियकर स्वातंत्र्य हो। कहने का आशय यह है कि वहाँ प्रिय लगने वाले स्वातंत्र्य-मूलक भावों से भरे शब्द हों, क्योंकि उस समय भारत परतंत्रता का भार वहन कर रहा था। भारत माँ परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़ी कराह रही थी। उनके आँसुओं से इंग्लैंड के रंगमहल को सजाया जा रहा था, जबकि उनका पसीना शाही जाम में शराब बनकर छलक रहा था।
ऐसे में कवि प्रार्थना करता है कि हे देवी! तुम शासन-विषयक नवीन अमृतोपम प्राणद मंत्रणा के लिए आयी हो। हमारे हृदय में अविद्या और अज्ञान का अंधकार छाया हुआ है। इसके बंधन की अनेकानेक परतें बिछी हुई हैं। इसमें 'बंधन-स्तर' का एक अर्थ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र का जातिगत बंधन है। दूसरा अर्थ अभिजात और सर्वहारा का वर्गगत बंधन है, तीसरा अर्थ धर्मगत बंधन है। चौथा अर्थ विचार अथवा दल का बंधन है। पाँचवाँ अर्थ छल-प्रपंच का बंधन है। छठा अर्थ माया-मोह-अज्ञान का बंधन है। सातवाँ अर्थ भू-भाग का बंधन है। आठवाँ अर्थ काल का बंधन है तथा नौवाँ अर्थ सभ्यता का बंधन है। कवि माँ से इन्हें छिन्न कर देने की प्रार्थना करता है। इन्हीं बंधनों के कारण हम परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़े हुए हैं।
आजादी मिलने के बाद भी ये बंधन हमारे विकास के मार्ग की सबसे बड़ी रुकावट हैं। कवि देवी सरस्वती से ज्योतिर्मय निर्झर (ज्ञान का तरल आलोक) बहाने की याचना करता है। अपने देश में मानव-मानव में गहरा भेद है। कवि इस भेद-भाव के कलुषांधकार को हरने तथा समता का प्रकाश विकीर्ण कर सारे संसार को जगमगा कर देने के लिए देवी सरस्वती से निवेदन करता है।
दो चरणों के इस गीत के दूसरे चरण में नौ बार 'नव' तथा एक बार 'नवल' की आवृत्ति हुई है। अतः 'नव' प्रतिपाद्य शब्द (थीम वर्ड) है, जो कवि के नवता के प्रति आग्रह को उजागर करता है। कवि पुराने जीर्ण-शीर्ण, घिसे-पिटे मूल्यों का विरोध करता है। कवि नवता का स्वागत करता है, जहाँ सब कुछ नया है-

ठनव गति, नव लय, ताल छंद नव
नवल कंठ नव जलद मंत्र नव
नव नम के नव विहग वृंद को
नव स्वर, नव पद, नव पर दे।ठ

बीसवीं सदी के चौथे दशक के आरंभ में नवता के प्रति ऐसा आग्रह किस कवि में है? १९४५ में प्रकाशित हरिवंश राय 'बच्चन' की 'सतरंगिनी' में संकलित 'नव वर्ष' कविता में नवता के प्रति ऐसा ही कुछ आग्रह देखा जा सकता है-

वर्ष नव
हर्ष नव
जीवन उत्कर्ष नव
नव उमंग
नव तरंग
जीवन का नव प्रसंग
नवल चाह
नवल राह
जीवन का नव प्रवाह।
गीत नवल
प्रीत नवल
जीवन की रीति नवल।
जीवन की जीत नवल
जीवन की प्रीत नवल।

इस कविता में सात बार 'नव' और सात बार 'नवल' प्रयुक्त है।

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निराला प्रार्थना करते हैं कि हे माता सरस्वती! तुम हम भारतवासियों को क्रियाशीलता की नयी गति दो। हमें अपने जीवन में नयी सोच, नयी उमंग और नये उत्साह के साथ आगे बढ़ना है। कवि तल्लीनता की नयी लय, उत्साह-उल्लास के नये ताल-छंद, ब्रिटिश भक्ति के विरोधी नवल कंठ और वैसे ही कंठों में सान्द्र-मन्द्र मेघ जैसे दृढ़-गंभीर स्वर प्रदान करने वाला वर माँगता है।
कवि भविष्य का उन्मुक्त आकाश लाने वाले नवयुवक वर्ग को नये स्वर और नये पंख प्रदान करने की याचना करता है। हे माँ! तुम इस नये आसमान में विचरण अर्थात् उड़ने वाले इन नये-नये पक्षियों को नये पंख प्रदान कर उनमें नये कलरव (स्वर) दे दो। यहाँ कवि परतंत्रता की चहारदीवारी से मुक्त हो उन्मुक्त आकाश में स्वतंत्रता की उड़ान भरने का संकेत देता है।  

डॉ. विजय विनीत

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