गुरु गोरखनाथ जी
यह लेख गुरु गोरखनाथ के जीवन, नाथ संप्रदाय, योग-साधना और सामाजिक चिंतन का विस्तृत परिचय प्रस्तुत करता है। इसमें गोरखनाथ की उत्पत्ति से जुड़ी संत परंपराओं और मान्यताओं, उनके हठयोग एवं कुंडलिनी साधना, मन के अनुशासन, गुरु महिमा, भक्ति और वैराग्य के विचारों का विवेचन किया गया है। लेख उनकी लोकभाषा में अभिव्यक्ति, जाति-पाँति एवं सामाजिक कुरीतियों के विरोध तथा मानवता के संदेश को रेखांकित करते हुए गोरखनाथ मंदिर और नाथ परंपरा की व्यापक प्रभाव-भूमिका को भी प्रस्तुत करता है।
लेख का प्रारम्भ मैं भविष्य पुराण के एक उद्धरण से करना चाहूंगा। महाभारत के युद्ध के उपरान्त जब पांडवों ने भगवान श्री कृष्ण से कहा कि उनका मन अभी युद्ध से विरत नहीं हुआ है, वो और युद्ध करना चाहते हैं। इस प्रकरण में पांडवों का भगवान शिव से युद्ध होता है और शिवजी पांडवों को कलयुग मे पुर्नजन्म लेने का श्राप देते हैं और उनसे कहते हैं कि कलयुग में ही उनको शिवजी के श्राप से मुक्ति मिलेगी। उसी समय भगवान श्री कृष्ण ने कहा कि मैं भी उसी काल में अपने अति सूक्ष्म अंश से जन्म लूंगा और १०० वर्ष तक तपस्या करूंगा और समाज को योगमार्ग एवं भक्ति की शिक्षा दूंगा।
जहाँ तक एतिहासिक ग्रंथों एवं पुराणों का प्रश्न है वहाँ स्पष्ट रूप से ऐसा उल्लेख नहीं मिलता कि भगवान श्रीकृष्ण ने गुरु गोरखनाथ के रूप में अवतार लिया। लेकिन संत परम्परा और नाथ सम्प्रदाय की मान्यताओं में अवश्य इस संदर्भ में कुछ संकेत मिलते हैं। नाथ सम्प्रदाय का विश्वास है कि गुरु गोरखनाथ ने भगवान शिव के अंश के रूप में अवतार लिया यद्यपि कुछ शाखायें ऐसा भी मानती हैं कि गुरु गोरखनाथ श्री विष्णु और शिव दोनों के संयुक्त अंश से प्रकट हुये। वैष्णव एवं शैव दर्शन में ऐसी मान्यता है कि भगवान अपने अंशों को समय-समय पर संत, ऋषि एवं अवतारी पुरूषों के रूप में प्रकट करते हैं।
जन्म काल में मतभेद होते हुये भी यह माना गया कि जब कबीर और नानक की वाणियों में गोरखनाथ जी का उल्लेख मिलता है तो वह निश्चित ही उनसे पूर्व समय में विद्यमान थे। नेपाल के गोरखा लोगों का गोरखा नाम गोरखनाथ जी के नाम से सम्बन्ध रखता है। नेपाल में एक जिला भी गोरखा नाम से है। यह भी मान्यता है गुरु गोरखनाथ जी सर्वप्रथम इसी क्षेत्र में प्रकट हुये थे। गोरखा जिले में एक गुफा है, जहाँ गुरु गोरखनाथ जी के चरण चिन्ह हैं। यहाँ गुरु जी की एक मूर्ति भी है, जहाँ हर वर्ष वैशाख पूर्णिमा को रोट उत्सव मनाया जाता है। आज भी जहाँ-जहाँ गुरु गोरखनाथ जी के मन्दिर या मठ हैं वहा रोट का प्रशाद दिया जाता है। यह भी किवदन्तीयां हैं कि त्रेता युग में राम के राज्याभिषेक के समय गोरखनाथ जी को आमन्त्रित किया गया था और द्वापर में गुजरात के जूनागढ़ के गोरखमड़ी में उन्होंने तप किया था।
गुरु गोरखनाथ का जन्मकाल निश्चित रूप से अज्ञात है। किन्तु इतिहासकार उनका जन्मकाल ११-१२ शताब्दी का मानते हैं। आल्हा ऊदल का भी यही कार्यकाल मिलता है। आल्हा खण्ड मे कई स्थानों पर गुरु गोरखनाथ का वर्णन आता है। पृथ्वीराज चौहान के दरबारी कवि चन्द्र बरदाई के रासो ग्रन्थ में भी गोरखनाथ का वर्णन आता है। गुरु गोरखनाथ जी नाथ सम्प्रदाय के प्रमुख आचार्य मत्स्येन्द्रनाथ के शिष्य थे। उनकी गुरु के प्रति निष्ठा और साधना ने उन्हें महायोगी के रूप में समाज में स्थापित किया।
गुरु गोरखनाथ जी एक ऐसे महापुरूष थे जिन्होने धर्म योग और साधना को जन-जन तक पहुँचाया। वह मानवता के उपासक, समाज सुधारक और लोकभाषा के संत कवि थे। उनके लाखों अनुयायी आज भी उनक बताये अनुशासित एवं संतुलित मार्ग पर चलने का प्रयास करते हैं।
गुरु गोरखनाथ जी ने साधना के क्षेत्र में हठयोग और कुंडलिनी जागरण की महत्ता को प्रतिपादित किया। गोरखनाथ जी का विश्वास था कि शरीर, प्राण और मन- तीनों का अनुशासन ही योग सिद्धि की पहली सीढ़ी है-
सांस रोके सुरति समेटे
आसन बैठा योगी।
तिज घर भीतर दीप जलाया,
तब पावे संजोगी ।।
गुरु जी का स्पष्ट ज्ञान था कि- मनुष्य ईश्वर बाहर इस भौतिक जगत में भगवान को ढूंढता फिरता है परन्तु वह परमपिता परमेश्वर का अंश तो मनुष्य के अन्दर ही विद्यमान है । उसे बर्हिमुखी नहीं अंर्तमुखी होना होगा तभी मुक्ति का द्वार मिलेगा। गुरु जी ने मन पर विजय को योग का आधार बताया-
मन ही माया, मन ही ठगवा,
मन ही रूप विकार ।
मन ही योगी, मन ही भोगी,
मन ही से उद्धार ।।
उपर्युक्त दोहे का अर्थ है कि व्यक्ति को बांधने और मुक्त करने वाला अपना मन ही है। जिसने मन को वश में कर लिया तो उसे आत्मज्ञान और मुक्ति सहज प्राप्त हो जायेगी। गुरु गोरखनाथ जी ने समाज में फैली कुरीतियों का विरोध किया। उन्होनें समाज में व्याप्त ऊँच-नीच जाति-पाति का घोर विरोध किया। गुरुजी ने अपने वचनों में कहा है-
जाति न पछो साधु की
पूछ लीजिये ज्ञान।
मोल करो तलवार का
पड़ी रहन दो म्यान।।
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डा. बड़वाल की खोज में गुरु गोरखनाथ रचित ४० पुस्तकों का पता चलता है, इनमे से १४ ग्रंथ असंदिग्ध रूप से प्राचीन माने जाते हैं क्योंकि इनका उल्लेख प्राय सभी प्रतियों में मिला। गोरखनाथ जी की भाषा उनके अपने अनुभव पर आधारित और अलंकारिक है। गोरखनाथ जी ने अपने लेखन में संस्कृत का प्रयोग किया परन्तु अपनी बात को जन मानस तक पहुँचाने के लिये उन्होंने क्षेत्र में प्रचलित भाषा का प्रयोग किया। उनकी शैली कोई पारंम्परीक या रटे रटाये विचारों से नहीं अपितु आंतरिक ताप से निकली हुई है। उनकी भाषा ने उनके ज्ञान को जन-जन तक पहुँचाने में सुलभ बनाया जिस कारण नाथ सम्प्रदाय और हठयोग पूरे भारत में फैल सका। गोरखनाथ जी की ही भाषा शैली थी जो आगे चलकर भक्ति साहित्य में प्रयोग की गई। कबीर, नानक और फरीद की वाणी मे गोरखनाथ की भाषा शैली देखने को मिलती है। गोरखनाथ के काव्य में, हठयोग साधना पर बल, गुरु महिमा, वैराग्य और सामाजिक कुरीतियों का खण्ड़न प्रमुख है। गुरु गोरखनाथ जी के प्रमुख ग्रन्थों में- गोरक्ष-शतक, गोरक्ष-संहिता और सिद्ध सिद्धान्त पद्धति हैं। गोरक्ष बानी में स्थानीय भाषा में लिखी कविताओं का संग्रह है-
बाहिरि न भीतरि न नेड़ा न दूर।
षोजत रहे ब्रह्मा अरु सूर।।
सेत फटक मनि होरै बीधा।
इहिं परमारथ श्री गौरष सीधा ।।
इस वाणी का तात्पर्य है कि ईश्वर न बाहर है ना भीतर है, न पास है, ना दूर है। वह ऐसे स्थान पर है जिसे ब्रह्मा और सूर्य को भी खोजने पर ना मिला। एक और वाणी मे आप कहते हैं।
सचि का सबद सोना का
रेष निगुरो कौं चाणक सगरा कौ उपदेश।
गुरु की मुज्या गुण मे रहै।
निगुरा भ्रमै औगुण गहे ।।
अर्थात सत्य बोला हुआ शब्द सोने की रेख के समान है। सत्य कहीं भी सत्य ही रहता है- हर कसौटी पर खरा और अर्थपूर्ण जिसे केवल पारखी ही समझ पाता है।
गुरु गोरखनाथ ने योग और भक्ति को केवल सन्यासियों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि ग्रहस्थ लोगों को भी इसका अभ्यास करने को कहा। गुरु जी का मानना था कि योग केवल गुफाओं तक सीमित न रहे अपितु सारे समाज को इसका लाभ मिलना चाहिए। गुरु गोरखनाथ जी की ही शिक्षा संत परम्परा में कबीर, नानक, दादू जैसे महापुरूषों ने भी अपनाई। गुरु गोरखनाथ केवल एक योगी ही नहीं थे, बल्कि एक समाज सुधारक और संत कवि थे जिन्होने समाज को सुधारने के लिये कविता का माध्यम चुना। उन्होने हमें सिखाया कि मन की साधना आत्मज्ञान और मानवता ही जीवन का सार है। मानवता सर्वोपरी है, जाति-भेद का कोई मूल्य नहीं है गुरु जी का यह संदेश आज भी प्रसांगिक है।
उत्तर प्रदेश का गोरखपुर नगर इनके नाम से ही प्रसिद्ध है। यहाँ स्थित गोरखनाथ मन्दिर उनकी तपस्थली थी जो नाथ सम्प्रदाय का प्रमुख स्थान है। लाखों श्रद्धालु प्रतिवर्ष यहाँ आकर गुरु गोरखनाथ की शिक्षाओं और योग परम्परा से प्रेरणा प्राप्त करते है। नाथ सम्प्रदाय के अनुयायी अपने कानों में छल्ला धारण करते हैं, इसीलिये इन योगियों को कनफाटा भी कहा जाता है।
अशोक सूरी
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