प्रेमचंद की साहित्यिक प्रासंगिकता
यह लेख हिंदी साहित्य के महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद की साहित्यिक दृष्टि, सामाजिक सरोकारों और उनकी आज की प्रासंगिकता पर केंद्रित है। इसमें उनके उपन्यासों और कहानियों के माध्यम से शोषण, सामाजिक असमानता, दलित विमर्श, नारी पीड़ा और किसान जीवन की समस्याओं को उजागर किया गया है। साथ ही यह भी बताया गया है कि प्रेमचंद का साहित्य आज भी समाज का दर्पण बना हुआ है।
उपन्यास सम्राट प्रेमचंद हिन्दीं साहित्य के ‘कालजयी’ साहित्यकार माने गए है। उनकी साहित्यिक कृतियों मे प्रेम मानवता न्याय शोषित के प्रति संवेदनशीलता दलितों के प्रति प्रेम देश के प्रतिनिष्ठा, आजीवन वे शोषण के खिलाफ संघर्ष करते रहे है। यह शोषण चार प्रकार का था, गरीब मजदूर और किसानो का शोषण-दमन नारियल का शोषण दलितो का शोषण और साम्राज्यवादी ताकतो द्वारा समूचे देश का शोषण, इस चहुंमुखी शोषण के खिलाफ उन्होंने अपनी कलम को लाकर शोषण-दमन के खिलाफ आवाज उठाई, इसीलिए अमृतराय उनको हिन्दी साहित्य कलम का सिपाही कहां है। प्रेमचंद्र समाज और साहित्य के एक जागरूक प्रहरी थे। डॉ. हजारी प्रसाद द्वेदी जी नेकहां करते थे, यदि कोई उत्तर प्रदेश के ग्रामीण जीवन का जायजा लेना चाहता है तो उसे प्रेमचंद से बढ़कर अच्छा परिचायक दूसरा कोई नही मिलेगा। प्रेमचंद्र के उपन्यासों तथा कहानियों के जरिए हम तत्कालीन सामाजिक आर्थिक राजनीतिक धार्मिक अध्यात्मिक आंदोलनों गतिविधियों के संन्दर्भो और परिपेक्ष्यो को भली भांति समझ पायेगे।
प्रेमचंद ने अपने समय को लिखा है अपने इतिहास को लिखा और आने वालो युग के पद्चाप को भी पहचाना है।ऐसा लोक धर्मी मानव धर्मी लेखक कभी भी अप्रासंगिक नही हो सकता। प्रेमचंद्र की प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है।आज भी उनकी दृष्टि अनुकरणीय है। उनका भाषागत आदर्श प्रेरक है। प्रेमचंद्र जी ने जिन चार प्रमुख मुद्दो को उठाया है वे आज भी बरकरार है। आज भी गरीब किसान‘पूष की रात मे ठिठुरता है। ‘ठाकुर का कुआं’ का दलित की तरह मानुष आज भी किसी न किसी प्रकार शोषित वंचित है। मजदूर और किसानो का शोषण अनवरत जारी है। अमीर और अमीर गरीब और गरीब होता जा रहा है। वैश्वीकरण के कारण विकास की रफ्तार तीव्र है पर गरीबी खत्म नही हुआ है। नारी का शोषण चक्र आज भी गतिशील है नये नये रूप धारण कर उसका दैहिक शोषण बढ गया है जो और भी भयानक और भयावह है। देश वैश्विक राजनैतिक द्वन्द् और दादागीरी से जूझ रहा है और वैश्विक आंतकवाद से लड़ रहा है। कहां क्या बदला है!
प्रेमचंद उपन्यास के सम्राट कहलाए ही उनकी कहानियां भी उत्कृष्ट है। मेरी दृष्टि मे वह विश्व की सर्वश्रेष्ठ कहानियों मे से कुछ एक अवश्य है। उनकी कहानियां बहुत बहुत अच्छी लिखी है किस्मृति पटल पर आज भी अंकितहै। ईदगाह, कफन पंच परमेश्वर परीक्षा ठाकुर का कुआँ इत्यादि। ईदगाह कहानी मे जिसमे छोटा सा बच्चा मे ले से दो पैसे का चिमटा खरीद कर घर लाता है, उसकी खाला जब उससे पूछती है बेटा तुमने कुछ खाया नही! इसे क्यो ले ले आया तो वह बड़ी ही मासूमियत से कहता है रोटियां बनाते तुम्हारे हाथ जल जाते है इसलिए यह चिमटा खरीद कर लाया हूँ। इस कहानी को पढ़कर हृदय द्रवित हो जाता है। ऐसी कहानी फिर पढने को नही मिली प्रेमचंद जी ने बाल मनः स्थित को गहराई से समझकर उसे अंकित किया है। कफन मे नारी जनित पीडा और आलसी मानव की मनःस्थित का विलक्षण निरूपण किया है।उपन्यासो मे ‘निर्मला’,‘गोदान’,‘सेवासदन’,‘कर्मभूमि’, रंगभूमी’, ‘गबन’ इत्यादि प्रमुख है।
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नारी की संवेदना व उसकी विडंबनात्मक परिस्थिति पर उनका उपन्यास ‘निर्मला’ उपन्यास एक किशोरी के नारकीया पर आधारित है। इसमे प्रेमचंद ने दहेज प्रथा के कारण एक सुंदर शुशील को मल लड़की निर्मला की जिन्दगी नर्क तुल्य हो जाती है। पिता के असमय मृत्यू से मां दहेज नहीं जुटा पाती और उसकी लगी लगाई सगाई टूट जाती है, दहेज के अभाव में अरमानो से भरी कोमल कन्या का विवाह तीन बच्चो के पिता अधेड़ प्रौड और शक्की किस्म के तो ताराम से कर दिया जाता है। तोता राम का बड़ा बेटा निर्मला का हमउम्र है उसे लेकर तोताराम के मन मे शंका के की डेकुल बुलाने लगते है फलतः पूरा परिवार नष्ट हो जाता है सेवासदन उपन्यास मे भी नारी की पीडा विडंबनात्मक स्थित का सामना सुमन को करना पडता है। समस्याओं वही परिणित भिन्न-भिन्न प्रकार से हुई है। समस्याओं के कारण तथा उसका मनोवैज्ञानिक चित्रण के कारण प्रेमचंद का उपन्यास अनमेल विवाह आर्थिक विषमता समाजिक है सियत की जड है। यह संबंधों और मूल्यों को तोड़ती है। जो आज भी किसी न किसी रूप मे बरकरार है। ‘गोदान‘ कृषक जीवन का महाकाव्य है कहां गयाहै।कृषक जीवन की त्रासदी तथा उसके शोषण को उपन्यास मे यथार्थतः रूपायित किया गया है। प्रेमचंद्र की मानवतावाद जनवादी यथार्थ की यह उत्कृष्टतम कृतिहै।यह होरी का गोदान नही बल्कि यह प्रेमचंद की आस्था का गोदान है। कर्म भूमि मे प्रेमचंद्र जी ने अछूत जीवन के व्यापक चित्र मिलते है व उनके समग्र पहलु ओपर रोशनी पड़ती है। यह दलित विमर्श न होकर भी वहां उसके लिए भूमिका निर्माण करते है।
इस उपन्यास का नायक अमर कहता है–मैं चोरी करू खून करू धोखा दू तब भी मै अपने धर्म से भ्रष्ट नही हो सकता पर अगर अछूत के हाथ का पानी भी पीलू तो धर्म छूमंतर हो जायेगा। हम धर्म से बाहर आत्मा का संबंध नही रख सकते आत्मा को भी धर्म ने बांध रखा है। यह धर्म न ही धर्म का कंलक है। अतः कह सकते है धार्मिक कुरीतियां और दलित विमर्श की अनुगूंज, ठाकुर का कुआ, कर्म भूमि रंगभूमि, गाेदान में स्पष्ट दिखाई देती है। इस प्रकार से प्रेमचंद्र की प्रत्येक कृतिक हीन कही आज भी प्रेरणादायक है प्रासंगिक है प्रत्येक दृष्टि से।
डॉ. सीमा शेखर
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