भारत छोड़ो आन्दोलन में महिलाओं की भूमिका
भारत छोड़ो आंदोलन (1942) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक ऐतिहासिक अध्याय था, जिसमें महिलाओं ने अद्वितीय साहस, त्याग और बलिदान का परिचय दिया। कनकलता बरुआ, उषा मेहता, अरुणा आसफ अली, तारा रानी श्रीवास्तव और अनेक वीरांगनाओं ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष में सक्रिय भूमिका निभाई। इस आंदोलन ने सिद्ध किया कि भारतीय नारी केवल परिवार की आधारशिला ही नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण और स्वतंत्रता संग्राम की भी अग्रणी शक्ति रही है। उनके योगदान ने भारतीय इतिहास में अमिट स्थान बनाया और नारी शक्ति के गौरव को विश्व पटल पर स्थापित किया।
नर की सहचरिणी नारी का योगदान किसी भी काल खण्ड में,जीवन के किसी भी आयाम पर पुरुषों से कम नहीं रहा है।जीवन विकास के प्रत्येक क्षेत्र में पुरुषों की तुलना में अवसर की कमतरी होने के बावजूद भी अपनी बौद्धिक,कायिक श्रमशीलता तथा त्याग,बलिदान की क्षमता गत श्रेष्ठता को हर युग में साबित करने वाली नारी की पहचान सम्प्रति आदर्श गृहिणी से लेकर कुशल अध्यापिका,वायुयान पॉयलट या फिर शासन-प्रशासन के उच्च पदों के रूप में है।आज़ादी की लड़ाई में भी भारतीय महिलाओं के साहस,पराक्रम,त्याग और बलिदान के एक से बढ़कर एक उदाहरण स्वतन्त्रता आन्दोलन के इतिहास में महिमा मण्डित हैं।१८५७ के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में जहाँ वीरांगना रानी लक्ष्मी बाई,झलकारी बाई,आशा देवी,असगरी बेग़म,अवन्ती बाई लोधी आदि ने स्वतन्त्रता के समर क्षेत्र में अपने प्राणों की आहुति दे दी,तो वहीं महान क्रान्तिकारी आन्दोलन `भारत छोड़ो आन्दोलन' में भी महिलाओं की अहम भूमिका रही है।
आन्दोलन के प्रणेता महात्मा गांधी के अपने ७० मिनट के प्रेरक भाषण के अन्त में `करो या मरो' के आह्वान के साथ ही भारतीय जनों का हुजूम त्याग एवं बलिदान के लिए उमड़ पड़ा। जिन प्रमुख महिलाओं ने अपनी शहादत से इस आन्दोलन को महिमा मण्डित किया, उनके शौर्य, पराक्रम, त्याग-बलिदान की गाथा युगों युगों तक बखानित होती रहेगी। बलिया में जब १३ अगस्त १९४२ को ३० छात्रों को हिरासत में लिया गया तब वहाँ की महिलाएं क्रांति पर उतर आयीं।ये क्रांतिकारी महिलाएं सिविल जज कार्यालय पहुँच कर वहाँ के जज को न केवल चूड़ियाँ पहनाईं,अपितु वीरांगना `जानकी देवी' ने जज की कुर्सी पर कब्ज़ा कर,अदालत को अपने नियंत्रण में लेकर कचहरी पर तिरंगा फहरा दिया।
आंदोलन के इस दौर में आज़मगढ़ के रामनगर की एक दलित महिला `चेती' ने आन्दोलन मेंबहुत ही सक्रियता दिखलाई थी। बदले में उसके साथ एक एक करके बीस अंग्रेज सैनिकों ने तब तक बलात्कार किया,जब तक कि वह मृत्यु को प्राप्त नहीं हो गई। इसी जिले की महिला क्रांतिकारियों के द्वारा महिला थाने की श्रीमती स्टारमार के बँगले को जला दिया गया था। दादरा गाँव की एक स्वतंत्रता प्रेमी महिला को उसके साल भर के बच्चे सहित गोलियों से भून दिया गया था। विरोध में ७० हजार क्रांतिकारियों ने थाने का घेराव किया था। असम प्रान्त के बारंगवाड़ी गाँव में जन्मी क्रान्तिकारी १६ वर्षीया महिला `कनक लता बरुआ' ने २० सितम्बर १९४२ को छात्राओं की एक टोली का नेतृत्व करते हुए जैसे ही थाने पहुँच ब्रिटिश ध्वज को उतार तिरंगा फहराने हेतु छत पर चढ़ीं वैसे ही धांय धांय करती गोलियां उसके सीने को छलनी कर दीं,फिर भी इस वीरांगना नेअविचलित रहकर तिरंगा फ़हरा कर भारत छोड़ो के ऐतिहासिक फ़रमान पर अपने खून से हस्ताक्षर कर दिया।
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आन्दोलन की सक्रियता बनाये रखने तथा उसकी वृद्धि के लिए डॉ. उषा मेहता ने भूमिगत कांग्रेस रेडियो की स्थापना की थी। प्रतिदिन उषा मेहता की ओजस्वी वाणी को भारतवासी सुनते थे। तीन महीने के बाद एक दिन उषा ब्रिटिश गुप्तचरों के शिकंजे में फंस गईं। इन्हें वर्धा जेल में डालकर तमाम यातनाएं दी गईं,फिर भी इन्होंने अपने साथियों के बारे में मुँह नहीं खोला। चार वर्ष तक कारावास में रहने के बाद मार्च १९४६ में इन्हें छोड़ा गया। आप १९५५ में संस्थापित `गांधी स्मारक निधि' की आजीवन ट्रस्टी रहीं। १९४२ के आन्दोलन में सामाजिक एवं राजनीतिक रूप से सक्रिय भूमिका निभाने वाली महिलाओं में कैप्टन लक्ष्मी सहगल,इन्दिरा गाँधी,अरुणा आसफ़अली,तारकेश्वरी सिन्हा,तारा रानी श्रीवास्तव,आरती सहाय आदि प्रमुख रहीं। आंदोलन की भयंकरता इस बात से प्रमाणित है कि आन्दोलन में पुलिस और आंदोलन कारियों द्वारा ५३८ बार गोलियां चलाई गईं,९५० व्यक्ति मारे गए,१३६० लोग घायल हुए,जबकि ६० हजार दो सौ उन्तीस व्यक्तियों की गिऱफ्तारी हुई और ८३ सरकारी भवनों को जलाया गया था।
निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि भारतीय नारियों का भारत छोड़ो आन्दोलन में साहसिक,रक्तिम एवं शौर्यमयी योगदान रहा,जिसने विश्व नारी समाज के समक्ष त्याग एवं बलिदान का बेमिसाल उदाहरण प्रस्तुत कर अपनी असीम शक्ति सम्पन्नता को सिद्ध कर दिया।ध्यानपेक्षित है कि पुरुषों के द्वारा नारी जीवन मूल्यों का हनन किया जाना,उनके स्वतन्त्र व्यक्तित्व विकास को अवरुद्ध किया जाना विश्व मानवता के लिए खतरनाक स्थिति है,क्योंकि नर अपने आदर्श व्यक्तित्व विकास अर्थ में भी महिलाओं की ही देन है।
डॉ. सुरेश लाल श्रीवास्तव
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