स्नेह और कविता की अदृश्य प्रेरणा रवीन्द्रनाथ ठाकुर और कादंबरी देवी

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस और विश्व कविता दिवस के संदर्भ में प्रस्तुत यह आलेख विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर और उनकी भाभी कादंबरी देवी के आत्मीय संबंधों तथा उनके साहित्यिक प्रभाव का विश्लेषण करता है। कादंबरी देवी केवल पारिवारिक सदस्य नहीं थीं, बल्कि वे रवीन्द्रनाथ की प्रारंभिक रचनात्मक चेतना, संवेदनशीलता और काव्य प्रेरणा की प्रमुख स्रोत थीं। यह लेख नारी और कविता के गहरे संबंध को एक ऐतिहासिक एवं भावनात्मक दृष्टि से प्रस्तुत करता है।

Jun 3, 2026 - 15:27
 0  0
स्नेह और कविता की अदृश्य प्रेरणा रवीन्द्रनाथ ठाकुर और कादंबरी देवी
kadambari-devi-rabindranath-tagore-prerna
८ मार्च को मनाया जाने वाला अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस और उसके कुछ ही दिनों बाद २१ मार्च को मनाया जाने वाला विश्व कविता दिवस। इन दोनों तिथियों को यदि एक साथ स्मरण किया जाए तो मन में एक अत्यंत अर्थपूर्ण संबंध उभर कर सामने आता है। नारी और कविता का संबंध केवल प्रतीकात्मक नहीं है,बल्कि इतिहास के अनेक महान सृजनकारों के जीवन में यह गहराई से दिखाई देता है। जब इन दोनों तिथियों को साथ.साथ सोचते हैं तो सहज ही स्मरण हो आता है उस महान कवि का जिसे भारत ही नहीं बल्कि समूचे विश्व ने अपनी काव्य प्रतिभा के कारण सम्मान दिया, वे हैं रवीन्द्रनाथ ठाकुर जिन्हें हम गुरुदेव और विश्वकवि के नाम से जानते हैं।
रवीन्द्रनाथ ठाकुर भारतीय साहित्य की उस उज्ज्वल परंपरा के प्रतिनिधि हैं जिनकी रचनाओं ने कविता को केवल शब्दों की सजावट न रहने देकर उसे आत्मा की अनुभूति बना दिया। उनकी कविताओं में जो गीतात्मकता, करुणा, सौंदर्य और आत्मीयता दिखाई देती है, उसने उन्हें विश्व साहित्य के महानतम कवियों की श्रेणी में स्थापित किया। उनके काव्य संग्रह गीतांजलि के लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया और इस प्रकार वे पहले ऐसे एशियाई तथा गैर.यूरोपीय साहित्यकार बने जिन्हें यह सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान प्राप्त हुआ। किंतु जब हम उनके काव्य जीवन के पीछे की प्रेरणाओं को खोजने का प्रयास करते हैं तो वहाँ एक स्त्री की सजीव छाया दिखाई देती है वह थीं कादंबरी देवी।
कादंबरी देवी की आत्महत्या बांग्ला साहित्यिक इतिहास की एक रहस्यमय और दुखद घटना मानी जाती है। वह ज्योतिरिन्द्रनाथ टैगोर की पत्नी और रवीन्द्रनाथ टैगोर की नई भाभी थीं। मात्र २५ वर्ष की आयु में उन्होंने ज़हर खाकर आत्महत्या कर ली। कहा जाता है कि उन्होंने आत्महत्या से पहले एक पत्र लिखा था लेकिन उस पत्र सहित सभी सबूत देवेन्द्रनाथ टैगोर की अनुमति से नष्ट कर दिए गए। इसलिए उनकी मृत्यु का असली कारण आज भी स्पष्ट नहीं है।
रवीन्द्रनाथ टैगोर के विवाह के केवल चार महीने बाद उनका यह कदम कई सवाल छोड़ जाता  क्या वह गहरे अकेलेपन से पीड़ित थीं, क्या उन्हें परिवार में अपेक्षित अपनापन नहीं मिलाए या उनके जीवन में कोई और मानसिक पीड़ा थी। इन रहस्यों पर लिखी गई किताब कादंबरी का सुसाइड नोट और नोतून बोठान पर लेखक रंजन बंद्योपाध्याय ने प्रकाश डालने का प्रयास किया है। कादंबरी देवी रवीन्द्रनाथ के बड़े भाई  ज्योतिरिन्द्रनाथ ठाकुर की पत्नी थीं और इस नाते वे उनकी भाभी थीं। किंतु यह संबंध केवल पारिवारिक मर्यादा तक सीमित नहीं था। उनके बीच एक गहरी आत्मीयता,स्नेह और संवेदना का संबंध विकसित हुआ जिसने रवीन्द्रनाथ के मन और उनकी सृजनशीलता पर गहरा प्रभाव डाला। इस संबंध को लेकर वर्षों से अनेक चर्चाएँ होती रही हैं और यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि रवीन्द्रनाथ के जीवन और व्यक्तित्व से संबंधित चर्चाओं का एक बड़ा भाग कादंबरी देवी के साथ उनके संबंधों को लेकर ही केंद्रित रहा है।
ठाकुर परिवार के इतिहास पर दृष्टि डालने से एक विशेष बात सामने आती है। परिवार के प्रमुख देबेन्द्रनाथ ठाकुर अपने पुत्रों का विवाह प्रायः ऐसे परिवारों में करते थे जो सामाजिक दृष्टि से अपेक्षाकृत साधारण थे। ठाकुर परिवार अत्यंत प्रतिष्ठित और समृद्ध था फिर भी बहुएँ प्रायः निम्न या निम्न.मध्यमवर्गीय परिवारों से आती थीं। अधिकांश बहुओं को अंग्रेज़ी शिक्षा का अवसर भी नहीं मिला था और वे ग्रामीण या साधारण पारिवारिक परिवेश से आई थीं। इसी परंपरा के अंतर्गत ५ जुलाई १८६८ को कोलकाता के जोरासांको ठाकुरबाड़ी में एक बालिका वधू का प्रवेश हुआ। उस समय उसकी आयु मात्र नौ वर्ष थी। गोधूलि की लालिमा से रंगी संध्या में जब वह बालिका दुल्हन चार पहियों वाली गाड़ी से उतरकर ठाकुरबाड़ी में प्रवेश कर रही थी, तब वातावरण में शहनाई की मधुर ध्वनि गूँज रही थी। उसने पारंपरिक वस्त्र धारण किए थेए गले में मोतियों का हार था और पैरों में सोने की पायल की झंकार थी। उस समय सात वर्ष का एक बालक उस दृश्य को कौतूहल से देख रहा था वह बालक आगे चलकर विश्वकवि बनने वाला था।
उस बालिका का नाम था मातंगिनी गांगोपाध्याय। विवाह के बाद ठाकुर परिवार में उनका नया नाम रखा गया कादंबरी देवी। इस प्रकार वे ठाकुर परिवार की सदस्य बनीं और उनके जीवन का संबंध हमेशा के लिए उस परिवार से जुड़ गया।
समय के साथ कादंबरी देवी ने ठाकुरबाड़ी के वातावरण में स्वयं को ढाल लिया। धीरे.धीरे उनकी शिक्षा आरंभ हुई और उन्होंने घर के सांस्कृतिक जीवन में भाग लेना शुरू किया। कुछ वर्षों बाद जब परिवार के अन्य सदस्य अपने कार्यों में व्यस्त रहने लगे तब कादंबरी देवी ने घर के दो छोटे देवरों सोमेंद्रनाथ और रवीन्द्रनाथ की देखभाल की ज़िम्मेदारी भी संभाल ली। वे स्वयं उस समय किशोरावस्था में थीं किंतु उनके भीतर मातृत्व का भाव विकसित होने लगा था।
उदार रवीन्द्रनाथ का बालमन भी कादंबरी देवी के स्नेह से गहराई से प्रभावित हो रहा था। दोनों के बीच धीरे धीरे एक अनोखा संबंध विकसित हुआ जिसमें मित्रता, स्नेह और बौद्धिक संवाद का अद्भुत मेल था। रवीन्द्रनाथ अपनी प्रारंभिक कविताएँ और रचनाएँ उन्हें सुनाते थे और कादंबरी देवी उन्हें ध्यान से सुनतीं। कभी-कभी वे उनकी रचनाओं की आलोचना भी कर देतीं।
कहा जाता है कि एक बार उन्होंने हँसते हुए रवीन्द्रनाथ से कहा कि वे कभी महान कवि बिहारीलाल चक्रवर्ती जैसा नहीं लिख पाएँगे। यह वाक्य रवीन्द्रनाथ के मन में एक चुनौती की तरह बस गया। वे सोचने लगे कि ऐसा लिखना है कि कादंबरी देवी को कोई शिकायत न रहे। इस प्रकार उनका प्रोत्साहन रवीन्द्रनाथ की रचनात्मक ऊर्जा को और अधिक तीव्र करता गया।
उस समयए चौदह वर्ष की आयु में रवीन्द्रनाथ ने नाटक `मैकबेथ' का अनुवाद कर लिया था। यहीं पर कवि की मुलाकात `हेकेटी' से हुई। तब से उन्होंने उनको चिढ़ाने के लिए उन्हें हेकेटी नाम दे दिया। और छह साल बाद १८८१ में उन्होंने भग्नहृदय पुस्तक श्रीमती हे.के को समर्पित की। एक बार सजनिकांत दास ने रवीन्द्रनाथ से सीधे पूछा कि,`हे-' वास्तव में कौन हैं। जब मैंने पूछा तो सजनिकांत ने मुड़कर पूछा आप क्या सोचते हैं सजनिकांत ने कहा हेमांगिनी। ज्योतिरिन्द्रनाथ के अलीकबाबू में आप अलीक थे और कादंबरी देवी हेमांगिनी थीं। आपने उस नाम का फायदा उठाया। कवि ने स्वीकार किया और कहा यह सच है बाकी सभी धारणाएँ गलत हैं।
यहाँ एक और बात का ज़िक्र करना ज़रूरी है। जब रवीन्द्रनाथ चौदह साल के थेतब उनकी माता शारदा देवी का देहांत हो गया। जिस रात यह घटना घटी उस रात उनके घर की दासी दौड़कर कमरे में गईं और रोते हुए बोलीं `अरे तुम लोगों का सर्वनाश हो गया।' लेकिन उस दिन ठकुरानी बहु ने उन्हें तुरंत डाँटकर घर से बाहर निकाल दिया.. उन्हें डर था कि कहीं आधी रात को अचानक हमें कोई गंभीर चोट न लग जाए।लेकिन रवीन्द्रनाथ ने इन अधूरी घटनाओं को खुलकर स्वीकार किया है, जिन्होंने उन दोनों के बीच के रिश्ते की नींव रखी।
कादंबरी देवी स्वयं भी साहित्य की अत्यंत प्रेमी थीं। वे बंगाली साहित्य के उपन्यासों और कविताओं में गहरी रुचि रखती थीं। दोपहर के समय जब रवीन्द्रनाथ उन्हें साहित्य पढ़कर सुनाते थे तब वे अत्यंत ध्यान से सुनतीं और उस पर चर्चा करतीं। यही वह समय था जब ठाकुरबाड़ी में साहित्यिक गतिविधियों का एक नया वातावरण विकसित होने लगा था।
१८७७ में ठाकुरबाड़ी में एक साहित्यिक पत्रिका प्रकाशित करने का विचार सामने आया। इस योजना में ज्योतिरिन्द्रनाथ रवीन्द्रनाथ और उनके कुछ मित्र सम्मिलित थे। प्रारंभ में पत्रिका का नाम सुप्रभात रखने का विचार किया गया किंतु बाद में परिवार के वरिष्ठ सदस्य द्विजेन्द्रनाथ ठाकुर ने इसका नाम बदलकर भारती रखने का सुझाव दिया। इसी नाम से वह पत्रिका प्रकाशित हुई और बंगाली साहित्य के इतिहास में उसका विशेष स्थान  बना।
इस पत्रिका के पीछे जो प्रेरणा काम कर रही थी उसमें कादंबरी देवी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी। वे सामने भले ही न आती हों परंतु उनके प्रोत्साहन और प्रेरणा के बिना इस प्रकार की साहित्यिक गतिविधियाँ संभव नहीं थीं। कादंबरी देवी के कारण ठाकुरबाड़ी का वातावरण कला साहित्य और संगीत से परिपूर्ण हो गया था। घर की छत पर साहित्यिक सभाएँ आयोजित होती थीं जहाँ कवि, संगीतकार और कलाकार एकत्रित होते थे। शाम के समय चटाइयाँ बिछतीं तकिए लगाए जाते सुगंधित रूमाल रखे जाते और वातावरण अत्यंत सुसंस्कृत एवं सौंदर्यपूर्ण बना दिया जाता।
ऐसे अवसरों पर कादंबरी देवी सुसज्जित होकर बैठतीं ज्योतिरिन्द्रनाथ वायलिन बजाते और युवा रवीन्द्रनाथ अपने मधुर स्वर में गीत गाते। यह वातावरण उनके मन में सौंदर्यबोध और कला के प्रति गहरी संवेदना उत्पन्न कर रहा था।
दिसंबर १८८३ में रवीन्द्रनाथ ठाकुर का विवाह हुआ। विवाह के कुछ समय बाद उनका एक काव्य.संग्रह प्रकाशित हुआ जिसमें उन्होंने बिना नाम लिए उसे 'नोतून बोठान 'को समर्पित किया। यह समर्पण वस्तुतः कादंबरी देवी के लिए था। उन्होंने लिखा कि पिछले वर्ष के वसंत के फूलों से इस वर्ष के वसंत के लिए एक माला बनाई गई है और वह प्रतिदिन प्रातः उन्हीं को अर्पित की जाती है।
यह समर्पण उनकी गहरी आत्मीयता का प्रतीक था।
किन्तु नियति ने एक अत्यंत दुखद मोड़ ले लिया। १८८४ में कादंबरी देवी ने आत्महत्या कर ली। यह घटना युवा रवीन्द्रनाथ के जीवन में गहरे आघात के रूप में आई।
कई वर्षों बाद अपनी आत्मकथा जीवन स्मृति में उन्होंने उस घटना को याद करते हुए लिखा कि चौबीस वर्ष की आयु में मृत्यु से उनका जो परिचय हुआ वह एक स्थायी परिचय बन गया और हर बिछड़न आँसुओं की एक लंबी माला बनकर उनके जीवन में लौटती रही। कादंबरी देवी ही रवीन्द्रनाथ टैगोर के जीवन की पहली और शेष स्त्री थीं। यद्यपि गुरुदेव के जीवन में समय.समय पर अनेक स्त्रियाँ आईं अनेक संबंध बने अनेक आत्मीयताएँ भी जन्मींफिर भी कादंबरी देवी.सा स्थान उन्हें कहीं और नहीं मिला।
कादंबरी देवी उनके जीवन की केवल एक पारिवारिक उपस्थिति नहीं थीं बल्कि वे उनके संवेदनशील मन की सबसे निकट सखी प्रेरणा और मौन सहचरी थीं। गुरुदेव के आरंभिक जीवन की भावनाएँ उनकी कल्पनाएँ और उनकी नवोदित काव्य चेतना जिस आत्मीयता में पनपी वह बहुत हद तक कादंबरी देवी की उपस्थिति से ही संभव हुई।इस अर्थ में कहा जाता है कि कादंबरी देवी ही रवीन्द्रनाथ के जीवन की पहली भी थीं और अंततः वही एक ऐसी स्त्री रहीं जिनकी स्मृति उनके जीवन और साहित्य के अंतरतम में सदा के लिए बस गई।
इस प्रकार जब हम नारी और कविता के संबंध पर विचार करते हैंए तब रवीन्द्रनाथ ठाकुर और कादंबरी देवी का प्रसंग एक अत्यंत मार्मिक उदाहरण के रूप में सामने आता है। कादंबरी देवी केवल एक पारिवारिक सदस्य नहीं थींए बल्कि वे उस संवेदनशील वातावरण की सर्जक थीं जिसने युवा रवीन्द्रनाथ के मन को आकार दिया।
इसलिए जब हम अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस और विश्व कविता दिवस को साथ.साथ स्मरण करते हैं तब यह अनुभूति और गहरी हो जाती है कि महान कविता के पीछे केवल प्रतिभा ही नहीं होती बल्कि संवेदनाए प्रेरणा और संबंधों की एक अदृश्य धारा भी होती है। कादंबरी देवी उसी अदृश्य प्रेरणा की प्रतीक थीं जिनकी छाया रवीन्द्रनाथ ठाकुर की काव्यधारा में आज भी कहीं न कहीं स्पंदित होती हुई महसूस की जा सकती है।
पंकज कुमार झा

What's Your Reaction?

Like Like 0
Dislike Dislike 0
Love Love 0
Funny Funny 0
Angry Angry 0
Sad Sad 0
Wow Wow 0