श्रीनिवास रामानुजन एक महान गणितज्ञ

श्रीनिवास रामानुजन एक महान भारतीय गणितज्ञ थे, जिन्हें गणित का जादूगर कहा जाता है। उन्होंने अत्यंत कम आयु में गणित के जटिल सिद्धांतों और सूत्रों की खोज की तथा जी. एच. हार्डी के साथ मिलकर कई महत्वपूर्ण शोध कार्य किए। उनका जीवन संघर्ष, प्रतिभा और अद्भुत गणितीय योगदान का प्रेरणादायक उदाहरण है।

Apr 17, 2026 - 15:25
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श्रीनिवास रामानुजन एक महान गणितज्ञ
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श्रीनिवास रामानुजन का जन्म २२ दिसंबर, १८८७ को दक्षिण भारत के कोयंबटूर में इरोड नामक स्थान पर एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता श्रीनिवास आयंगर और माता कोमलताम्मल थीं। गणित के जादूगर कहे जाने वाले श्रीनिवास रामानुजन का बचपन अन्य बच्चों जैसा सामान्य नहीं था। वह ३ साल की उम्र तक बोल नहीं पाए थे, लेकिन वह अपनी प्रतिभा के धनी थे। महान गणितज्ञ की पढ़ाई तमिल भाषा से हुई थी, हालांकि शुरू में पढ़ाई में उनका मन नहीं लगता था। लेकिन आगे जाकर प्राइमरी परीक्षा में उन्होंने पूरे जिले में प्रथम स्थान हासिल किया था। रामानुजन अपने अध्यापकों से लगातार प्रश्न पूछते थे। कभी-कभी उनके प्रश्न इतने जटिल होते थे कि अध्यापक भी उनका सहज उत्तर नहीं दे पाते थे।
वह आगे की पढ़ाई के लिए पहली बार उच्च माध्यमिक स्कूल में गए। वहीं से ही उन्होंने अपने गणित की पढ़ाई की शुरुआत की और इसके बाद से ही वह गणित विषय में महारत हासिल करते चले गए। सातवीं कक्षा में पढ़ाई करने के दौरान ही उन्होंने बीए के छात्र को गणित भी पढ़ाई थे।  उन्होंने मात्र १३ साल की उम्र में त्रिकोणमिति को हल कर दिया था। इसे हल करने में बड़े से बड़े विद्वान भी असफल हो जाते थे। उन्होंने १६ वर्ष की उम्र में जी एस कर की पुस्तक `ए सिनॉप्सिस ऑफ़ एलीमेंट्री रिज़ल्ट्स इन प्योर एंड एप्लाइड मैथमेटिक्स' की ५००० से अधिक थ्योरम्स को प्रमाणित और सिद्ध करके दिखाया था। यह किताब १८८० में प्रकाशित हुई थी और इसके १८८६ में रिवाइज किया गया था।

उन्हें गणित के अलावा किसी अन्य विषय में दिलचस्पी नहीं थी। महान गणितज्ञ के साथ ऐसा भी हुआ था कि ११वीं कक्षा में गणित को छोड़ बाकी सभी विषयों में फेल हो गए थे, तो अगले साल प्राइवेट परीक्षा देकर भी वह १२वीं पास नहीं कर पाए। ‌
श्रीनिवास रामानुजन को भी अपने जीवन में कई उतार-चढ़ाव से गुजरना पड़ा। बारहवीं की पढ़ाई के बाद उन्हें आर्थिक तंगी से जूझना पड़ा। नौकरी की तलाश में उनकी मुलाकात डिप्टी कलेक्टर श्री वी रामास्वामी अय्यर से हुई। वह भी गणित के बहुत बड़े विद्वान थे और उन्होंने रामानुजन की प्रतिभा को अच्छे से पहचाना। उन्होंने रामानुजन के लिए रू२५ की मासिक छात्रवृत्ति की व्यवस्था की।
जुलाई १९०९ में, रामानुजन ने एस. जानकी अम्मल से विवाह किया, जो उस समय केवल दस वर्ष की थीं। रामानुजन की माँ ने इस विवाह की व्यवस्था की थी। १९१२ में, दोनों एक साथ रहने लगे। जब रामानुजन कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में अध्ययन के लिए चले गए, तो उनकी पत्नी उनके माता-पिता के साथ रहने लगीं। रामानुजन की छात्रवृत्ति से कैम्ब्रिज में उनके और कुंभकोणम में उनके परिवार के खर्चे पूरे होते थे। 

१९११ में रामानुजन का प्रथम शोधपत्र `बरनौली संख्याओं के कुछ गुण'  रिसर्च पेपर ‘जर्नल ऑफ इंडियन मैथमेटिकल सोसायटी’ में प्रकाशित हुआ। इसी बीच, लेटर के जरिए रामानुजन ने कुछ फॉर्मूले कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जी एच हार्डी को भेजें। हार्डी रामानुजन से इतने प्रभावित हो गए कि उन्होंने तुरंत रामानुजन को लंदन बुलाने के लिए आमंत्रित किया। हार्डी ने गणितज्ञों की योग्यता जांचने के लिए ० से १०० अंक तक का एक पैमाना बनाया। इस परीक्षा में हार्डी ने खुद को २५ अंक दिए। महान गणितज्ञ डेविड गिलबर्ट को ८० और रामानुजन को १०० अंक दिए, इसलिए हार्डी ने रामानुजन को दुनिया का महान गणितज्ञ कहा था। रामानुजन हार्डी के मेंटोर बने। दोनों ने मिलकर गणित की कई रिसर्च पेपर प्रकाशित किए। १७२९ नंबर हार्डी-रामानुजन नंबर के रूप में काफी प्रसिद्ध है। उनके रिसर्च को अंग्रेजों ने भी सम्मान दिया। इस महान गणितज्ञ ने अपने पूरे जीवन में करीब ३८८४ थ्योरम तैयार की। जिनमें से अधिकांश को सिद्ध किया जा चुका है। गणित पर उनके शोध और मौलिक एवं अपारंपरिक परिणाम आज भी शोधकर्ताओं को प्रेरित करते हैं, हालांकि उनकी कुछ खोजों को अभी तक गणित की मुख्यधारा में पूरी तरह से नहीं अपनाया गया है। रामानुजन के कार्य से प्रभावित होकर गणित के क्षेत्र में हो रहे कार्यों के लिए ‘रामानुजन जर्नल’ की स्थापना की गई। उनका एक पुराना रजिस्टर, जिसे अब ‘रामानुजन की नोटबुक’ के नाम से जाना जाता है। इसमें उनके द्वारा लिखे गए कई अप्रकाशित प्रमेय और सूत्र प्राप्त हुए। इस नोटबुक का प्रकाशन टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान, मुंबई (ऊघ्इR) द्वारा किया गया।

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 सन् १९६७ में प्रोफ़ेसर ब्रूस सी. बर्नाड्ट को प्रोफ़ेसर आर. ए. रेंकिन ने `टाटा इंस्टीट्यूट आफ फंडामेंटल रिसर्च बाम्बे (मुम्बई)' द्वारा प्रकाशित `रामानुजन नोट बुक्स' दिखाई पर उस समय प्रोफ़ेसर बर्नाड्ट की इस पुस्तक में कोई रुचि नहीं थी। सन् १९७४ में इन्होनें एमिल ग्रॉसवॉल्ड के दो पत्रों को पढ़ा जिनमें ग्रॉसवॉल्ड ने रामानुजन के कुछ प्रमेयों की उत्पत्तियाँ दी थीं। प्रोफ़ेसर ब्रूस सी. बर्नाड्ट को लगा कि वह भी रामानुजन के प्रमेयों की उत्पत्तियाँ दे सकते हैं और वह `रामानुजन नोट बुक्स' के बारे में जानने के लिए उत्सुक हो गए। प्रोफ़ेसर बर्नाड्ट प्रिंसटन विश्वविद्यालय गए और वहाँ से `टाटा इंस्टीट्यूट आफ फंडामेंटल रिसर्च' द्वारा प्रकाशित 'रामानुजन नोट बुक्स' की एक प्रति ले आए। यह देखकर प्रोफ़ेसर बर्नाड्ट रोमांचित हो गए कि वह कुछ और प्रमेयों की उत्पत्ति देने में सक्षम थे परंतु उस पुस्तक में ऐसे हजारों प्रमेय थे जिनकी उत्पत्ति वे नहीं दे सकते थे और इस तरह प्रोफ़ेसर बर्नाड्ट ने अपना पूरा ध्यान रामानुजन की पुस्तकों के शोध में लगा दिया। साल १९१८ में महान गणितज्ञ को एलिप्टिक फंक्शंस और संख्याओं के सिद्धांत पर अपने रिसर्च के लिए रॉयल सोसाइटी का फेलो चुना गया। भारत के गुलामी के काल में एक अश्वेत व्यक्ति होते हुए भी, रामानुजन को रॉयल सोसायटी का फेलो नामित किया गया, जो अपने आप में एक असाधारण उपलब्धि थी। रॉयल सोसाइटी के पूरे इतिहास में रामानुजन से कम आयु का कोई सदस्य आज तक नहीं हुआ। इसी साल अक्टूबर में वे ट्रिनिटी कॉलेज के फेलो चुने जाने वाले पहले भारतीय भी बने थे। रामानुजन का कार्य करने का तरीका बड़ा विलक्षण था। वे कभी-कभी आधी रात को जागकर अपनी स्लेट पर गणित के सूत्र लिखकर सो जाते थे, जिससे ऐसा लगता था कि वे सपने में भी गणित के प्रश्नों को हल करते थे। उनकी एक विशेषता यह भी थी कि वे पहले गणित का कोई नया सूत्र या प्रमेय लिख देते थे, लेकिन उसकी उत्पत्ति पर उतना ध्यान नहीं देते थे। उन्होंने शून्य और अनंत के बीच के अंतर्संबंधों को समझने के लिए गणित के सूत्रों का सहारा लिया। उनका अध्यात्म के प्रति इतना गहरा विश्वास था कि वे अपने गणित के क्षेत्र में किए गए किसी भी कार्य को अध्यात्म का ही एक अंग मानते थे।

१९१७ में उन्हें टीबी और विटामिन के स्तर में खतरनाक कमी का पता चला। वे महीनों तक सैनिटोरियम और नर्सिंग होम के चक्कर लगाते रहे। ऐसा लग रहा था कि उनका स्वास्थ्य इतना बेहतर हो गया था कि वे फरवरी १९१९ में भारत लौट आए, लेकिन वे केवल एक साल ही जीवित रहे। दिन पर दिन उनका स्वास्थ्य खराब होता चला गया। लेकिन इसी दौरान रामानुजन ने मॉक थीटा फंक्शन पर एक उच्च स्तरीय शोध पत्र भी लिखा था। जिसका उपयोग गणित के साथ-साथ चिकित्सा विज्ञान में कैंसर को समझने के लिए भी किया जाता है, जो कि अपने आप में अद्भुत और अकल्पनीय भी है। बीमारी के चलते ३३ साल की उम्र में २६ अप्रैल १९२० को उन्होंने कुंभकोणम में अपनी अंतिम सांस ली। रामानुजन के बनाए हुए ढेरों ऐसे थ्योरम हैं जो आज भी किसी पहेली से कम नहीं है। इसलिए उन्हें आज भी गणित के जादूगर के रूप में जाना जाता है। रामानुजन ने अपने पीछे कई अप्रकाशित शोधपत्र छोड़े हैं जिनमें प्रमेयों पर गणितज्ञों ने शोध जारी रखा है। १९१८ और १९५१ के बीच, बर्मिंघम में शुद्ध गणित के मेसन प्रोफेसर जीएन वॉटसन ने 'रामानुजन द्वारा प्रतिपादित प्रमेयों' शीर्षक से १४ शोधपत्र लिखे, और रामानुजन के कार्यों से प्रेरित लगभग ३० रचनाएँ लिखीं। हार्डी ने वॉटसन को रामानुजन की रचनाओं का एक विशाल संग्रह दिया, जिनमें से कुछ १९१४ से पहले लिखी गई थीं और कुछ रामानुजन की मृत्यु से पहले भारत में उनके अंतिम वर्ष के दौरान लिखी गई थीं। रामानुजन की जीवनी, `द मैन हू न्यू इनफिनिटी', १९९१ में प्रकाशित हुई थी, और इस पर आधारित एक फिल्म, जिसमें देव पटेल ने रामानुजन और जेरेमी आयरन्स ने हार्डी की भूमिका निभाई थी, का प्रीमियर सितंबर २०१५ में टोरंटो फिल्म फेस्टिवल में हुआ था। भारत में २२ दिसम्बर को रामानुजन की जयंती के उपलक्ष्य में राष्ट्रीय गणित दिवस के रूप में मनाया जाता है।
एक मज़ेदार घटना के बाद, १७२९ को हार्डी-रामानुजम संख्या के रूप में जाना जाता है, और ऐसी संख्याओं को टैक्सीकैब संख्याएँ कहा जाता है। जब जीएच हार्डी उनसे अस्पताल में मिलने गए, तो उन्होंने बताया कि उन्होंने १७२९ नंबर वाली एक टैक्सी ली थी, और आगे कहा, `अस्पताल जाने के लिए यह कितनी नीरस संख्या है।' रामानुजम ने तुरंत कहा, `नहीं, यह बिल्कुल विपरीत है: यह एक आकर्षक संख्या है। यह सबसे छोटी पूर्णांक संख्या है जिसे दो घनों के योग के रूप में दो अलग-अलग तरीकों से व्यक्त किया जा सकता है।'
हंगरी के गणितज्ञ पॉल इरोज़ पर दिलचस्प किताब `द मैन हू लव्ड ओनली नंबर्स' लिखने वाले पॉल हॉफ़मैन लिखते हैं, `हार्डी और रामानुजन की साझेदारी जब तक चली, दोनों लोग विशुद्ध गणित की दुनिया को शीर्षासन कराते रहे. ये पूरब और पश्चिम का मेल था. आध्यात्म का औपचारिकता से मेल था और इसे रोकना मुश्किल था।'

रामानुजन की जीवनी लिखने वाले रॉबर्ट कैनिगल ने अपनी किताब `द मैन हू न्यू इन्फिनिटी' के पहले अध्याय में उस धार्मिक और सामाजिक परिवेश का ब्योरा दिया है जिसमें रामानुजन पले-बढ़े थे। एक व्यक्ति के तौर पर रामानुजन के लिए ये चाहे जितना भी अहम हो लेकिन उनके गणितीय जीवन पर इस परिवेश के असर का दावा ज़्यादा सही नहीं ठहरता। रामानुजन की बायोग्राफी में रॉबर्ट कैनिगल बताते हैं कि ११ साल की उम्र में `सहपाठी उनसे मदद मांगने आने लगे थे' एक साल बाद वो `अपने शिक्षकों को चुनौती देने लगे थे' और जब वो १३ साल के थे वो एसएल लोनी की त्रिकोणमिति के मास्टर हो गए थे. इस किताब को अब भी कुछ भारतीय छात्र पढ़ते हैं।
बहुत कम लोग जानते होंगे कि पाश्चात्यी गणितज्ञ जीएस हार्डी ने श्रीनिवास रामानुजन को यूलर, गॉस, आर्कमिडीज तथा आईजैक न्यूटन जैसे दिग्गजों की समान श्रेणी में रखा था। 

डॉ.  रवीन्द्र दीक्षित

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