लौकी

यह कहानी एक शिक्षक मनोहर और उसकी पत्नी सुधा के बीच बढ़ती भावनात्मक दूरी को दर्शाती है। एक ताजी लौकी घर में उम्मीद और अपनापन लेकर आती है, लेकिन मोबाइल और व्यस्त जीवनशैली के कारण वह भी अनदेखी रह जाती है। धीरे-धीरे घर का वातावरण भावनात्मक रूप से ठंडा और खाली हो जाता है। कहानी आधुनिक जीवन में रिश्तों की टूटती गर्माहट और संवाद की कमी को उजागर करती है।

May 25, 2026 - 15:59
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लौकी
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स्कूल की छुट्टी की घंटी बजी।बच्चों की उन्मुक्त भीड़ गेट की ओर दौड़ पड़ी, जैसे आज़ादी का कोई छोटा-सा उत्सव हो। शिक्षकगण अपनी किताबें और थकान समेटते हुए स्कूल से पढ़ाकर बाहर निकले। मनोहर उस स्कूल में हिंदी पढ़ाता था, उसके कंधों पर उम्र और ज़िम्मेदारियों का बोझ साफ़ झलकता था। वह जैसे ही स्कूल से बाहर निकला तो स्कूल के भृत्य शंभू ने अपनी पुरानी, गर्मजोशी भरी मुस्कान के साथ एक ताजी लोकी उसके हाथ में थमाते हुए कहा-
‘माड़साहब यह लीजिए, अपनी छत की बेल की लौकी-ताजी, हरी, सोंधी! सोचा, आपके घर की रसोई में काम आएगी। मैडम खुश होंगी।’
लौकी को छूते ही मनोहर के चेहरे पर एक क्षणिक चमक उभरी, जैसे कोई पुरानी, धुँधली याद हल्के से जाग गई हो- ‘अरे वाह! यह तो बहुत बढ़िया है। मेरी माँ ऐसी ही लौकी से हलवा बनाती थीं। मजा आ गया भाई।’
मनोहर की आवाज़ में एक पुरानी गर्माहट थी, जो अब कम ही सुनाई देती थी।

छुट्टी होते ही स्कूल की पुरानी, खटारा बस चल पड़ी। ज्यादातर स्टॉफ उसी से स्कूल आता-जाता था। जैसे ही मनोहर बस में चढ़ा तो स्टॉफ में लौकी चर्चा का विषय बन गई। एक साथी शिक्षक ने कहा, ‘मनोहर जी, इससे रायता बनवाइएगा, गर्मी में ठंडक देगा।’ दूसरा बोला, ‘नहीं सर, लौकी के कोफ्ते बनवाना! मेरी माँ बनाती थीं, स्वाद आज भी जीभ पर है।’
तीसरा हँसते हुए बोला, ‘मनोहर जी, हलवा बनवाना, हम लोग भी दावत पर आ रहे हैं!’
मनोहर ने एक शांत मुस्कान छोड़ दी। उनके मन में एक छोटी-सी उम्मीद जगी - शायद आज सुधा कुछ नया बनाए। मन ऊब जाता है एक ही तरह का खाना खाते-खाते!
घर पहुँचते ही, मनोहर ने बड़े उत्साह से आवाज़ लगाई, ‘सुधा, देखो क्या लाया हूँ!!’
हॉल में सुधा सोफे पर बैठी मोबाइल में डूबी, उंगलियाँ स्क्रीन पर बिना रुके सरका रही थी। बच्चे कमरे में थे – बेटा अपने टेबलेट पर कुछ काम कर रहा था और बेटी स्कूल का कोई क्राफ्ट बनाने में मशगूल थी। मनोहर ने लौकी को हवा में उठाकर सुधा को दिखाया, ‘शंभू ने दी है – ताजी लोकी। छूकर देखो, कितनी मुलायम, कितनी सोंधी! आज कुछ स्पेशल बनाओ न?’
सुधा ने नज़र उठाए बिना, ठंडे स्वर में कहा, ‘हाँ, ठीक है। प्रिâज में रख दो। मैं अभी देख लूंगी।’
मनोहर का उत्साह ठंडा पड़ गया। वह कुछ देर सुधा की बगल में खामोश बैठा रहा, फिर एक अन्तिम कोशिश करते हुए बोला ‘सुधा, याद है न, पहले तुम कितने शौक से नई-नई चीज़ें बनाती थीं? लोकी की रायता, कोफ्ते, हलवा..!!
बच्चे दौड़-दौड़ कर पूछते थे, ‘मम्मी, आज क्या बनाया है?’

आज क्यों न कुछ नया ट्राई क्या जाए? मैं तुम्हारी मदद करूँगा न।’
सुधा ने मोबाइल की स्क्रीन से नज़र हटाली, लेकिन उसकी आंखों में ब्राइटनेस की चमक अभी भी चौंधिया रही थी.. लाल-लाल!
वह मनोहर पर बिगड़ते हुए बोली ‘मनोहर, ये रोज़-रोज़ खाने-पीने की बातें क्यों करते हो? क्या तुम्हें खाना नहीं मिलता?
तुम्हें क्या लगता है, मैं दिन भर मोबाइल में ही घुसी रहती हूँ?
क्या घर संभालना इतना आसान है?
कपड़े, झाड़ू, पोंछा, बर्तन, बच्चों की शिकायतें....और ऊपर से तुम आकर ये रोज रोज सब्जियों का गुणगान शुरू कर देते हो! लौकी लाए हो तो प्रिâज में रख दो। टाइम मिलेगा तो मैं देख लूँगी।
और हाँ, मेरे हाथ में मोबाइल देखकर ये ताने मत मारा करो! यही है जो इस वीरान से मेरा साथ दे रहा है।’
मनोहर को पाला मार गया। उसकी आवाज़ में जो उम्मीद थी, वो कहीं गहरे में दब गई। उसने प्रिâज का दरवाज़ा खोला। लेकिन वहाँ का मंज़र देखकर उसका दिल और भारी हो गया। अंदर सब्जियों का एक ठंडा कब्रिस्तान मौजूद था – जिसमें पुरानी लौकी, तोरई, भिंडी, परवल, हरी मिर्चें और न जाने कितनी सब्जियां दफ़न हो रही थीं। कुछ सड़ चुकी थीं, कुछ सूखकर बेजान हो गई थीं। मानो बर्फ में ढंकी हुई लाशें हों।
मनोहर को याद आया-वह इन सब्जियों को पिछले दिनों ही लाया था। हर बार एक नई उम्मीद के साथ- ‘सुधा, आज टिफिन में यह बना देना।'
लेकिन सुधा का हर बार वही जवाब रहता- ‘जो है, खा लो, मुझ पर पकवान नहीं बनते।’ और अंततः खाने में अधिकतर सूखी सब्जियां ही रहतीं- तेल और मसालों से लथपथ।
मनोहर ने लौकी उस ढेर में रख दी, जैसे किसी मृत परंपरा को दफ़न कर रहा हो। दरवाज़ा बंद किया और भीतर कुछ टूटने की आवाज़ सुनाई दी– शायद उसका धैर्य या फिर उसकी उम्मीदों का पुल!
रात को खाना परोसा गया- आलू की सूखी सब्जी, रोटी और चावल। मनोहर चुपचाप बच्चों के साथ खाता रहा। सुधा पास में बैठी मोबाइल पर किसी से वीडियो कॉल पर चर्चाएं कर रही थी।
मनोहर ने धीमी और भारी आवाज़ में कहा, ‘सुधा, तुम्हें याद है, पहले हम रातभर बैठकर कितनी बातें किया करते थे? तुम खाने की तारीफें सुनकर हँसती खिलखिलाती थीं। बच्चे कितना शोर मचाते थे। और अब?
अब यह घर बस केवल इमारत लगता है। खाना, बस पेट भरने का बहाना रह गया है। क्या तुम्हें सचमुच नहीं लगता कि धीरे-धीरे हम सब-कुछ खोते जा रहे हैं?’
सुधा ने मोबाइल नीचे रख दिया। उसकी आँखों में लालिमा थी- ‘मनोहर, तुम हमेशा मुझे ही दोषी क्यों ठहराते हो?
क्या मैं इंसान नहीं हूं? मुझे भी थकान होती है। मेरी भी ज़िंदगी है।
तुम तो स्कूल में बच्चों को पढ़ाकर मन बहला लेते हो, लेकिन मेरा क्या?
यहाँ मैं बस एवâ मशीन हूँ तुम लोगों के लिए। खाना, घर, बच्चे – बस यही है मेरी दुनिया!!
क्या मैं समझती नहीं?..... थोड़ी देर मोबाइल क्या हाथ में पकड़ लिया, तुम्हारा मुंह लटकने लगता है।
तुम यह क्यों भूल जाते हो कि 

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मोबाइल ही तो मेरा एकमात्र साथी है, जहाँ मैं थोड़ा जी लेती हूँ। और तुम्हें है कि पुराने दिन चाहिए?
अगर तुम्हें बाकई पुराने दिन चाहिए तो वापस से ले आओ वो सुधा, जो तुम्हारी हर बात मानती थी। दिनभर तुम्हारे इंतजार में चौखट निहारती थी मैं वो सुधा नहीं हूँ।’
मनोहर की आँखें नम हो गईं। वह कुछ देर बुत बना बैठा रहा फिर खुद को संभालते हुए बोला- ‘सुधा, मैं तुम्हें बदलने को नहीं कह रहा। मैं तो बस उस अपनेपन को ढूँढ रहा हूँ, जो कभी इस घर में था।
एक ताजी लौकी, जिसे प्यार से पकाना – क्या ये इतना मुश्किल है? क्या हम अपने बच्चों को यही सिखाएंगे – कि अब रिश्ते केवल आदत बनकर रह गए हैं?’
सुधा ने एक ठंडी सांस छोड़ते हुए कहा, ‘रिश्ते?
रिश्ते दोनों तरफ़ से निभते हैं, मनोहर!
तुम्हें अपनापन चाहिए, लेकिन क्या तुमने कभी पूछा कि मुझे क्या चाहिए?...नहीं!
क्योंकि तुम्हें बस अपने काम की धुन सवार रहती है या फिर खाने पीने की!!’
वह उठी और मोबाइल हाथ में लिए दूसरे कमरे में चली गई। वातावरण में नीरवता छा गई।
मनोहर थाली में बचे हुए आलुओं को देखता रहा। अचानक प्रिâज से एक हल्की ‘टिक’ की आवाज़ आई-शायद कोई पुरानी सब्जी बर्फ हो रही थी या फिर वो ताजी लौकी, जो ठंडी हवा में अपनी सोंधी खुशबू खोती जा रही थी। ठीक वैसे ही जैसे मनोहर की उम्मीदें, धीरे-धीरे गलती जा रही थीं।

अगली सुबह, मनोहर ऑफिस के लिए एवं बच्चे स्कूल के लिए अपना-अपना टिफिन लेकर निकल गए।
दोपहर, लंच की घंटी ने भूख का शंखनाद किया। मनोहर ने बड़े उत्साह से बैग से लंचबॉक्स निकाला, तभी स्टॉफ के एक साथी ने मनोहर से कहा `आज तो भाभीजी ने जरूर ही लौकी के कोफ्ते बनाए होंगे?' मनोहर ने झेंपते हुए टिफिन को खोलकर देखा। टिफिन में वही आलू की सूखी सब्जी और रोटियां रखे हुए थे। उसने टिफिन को बैग के पीछे छिपाते हुए अपने साथी से कहा `आज तुम्हारी भाभी की तबीयत ठीक नहीं थी इसलिए उसने कोफ्ते नहीं बनाए।' और वह चुपचाप खाना खाने लगा।
लेकिन लौकी अभी भी उसके दिमाग में घूम रही थी, क्योंकि वह जानता था कि वह लौकी भी और सब्जियों की भांति जल्दी ही उस ठंडे कब्रिस्तान का हिस्सा बन जाएगी, जैसे उसके रिश्ते की बची-खुची गर्माहट..!!

डॉ. यदुनंदन प्रसाद उपाध्याय

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