आधुनिक भारतीय कला का जनक राजा रवि वर्मा
राजा रवि वर्मा भारतीय कला जगत के महान चित्रकार थे, जिन्होंने देवी-देवताओं और पौराणिक पात्रों को पहली बार मानवीय और जीवंत रूप में चित्रित किया। उन्होंने यूरोपीय यथार्थवादी शैली और भारतीय संस्कृति का अद्भुत संगम प्रस्तुत किया। उनकी बनाई सरस्वती, लक्ष्मी, शकुंतला और द्रौपदी जैसी छवियाँ आज भी भारतीय जनमानस में गहराई से बसी हुई हैं। उन्होंने लिथोग्राफिक प्रेस स्थापित कर कला को राजमहलों से निकालकर आम जनता तक पहुँचाया। उनकी पेंटिंग्स केवल कला नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, भावनाओं और आध्यात्मिकता की सजीव अभिव्यक्ति थीं। उन्हें ‘फादर ऑफ मॉडर्न इंडियन आर्ट’ कहा जाता है और उनकी विरासत आज भी भारतीय कला को प्रेरित करती है।
हाल ही में विद्यालय में आयोजित सरस्वती पूजन के दौरान, जब मैं देवी की प्रतिमा के समक्ष नतमस्तक था, तो मेरी स्मृतियों में अनायास ही एक नाम कौंध गया-राजा रवि वर्मा। आज हम माँ सरस्वती, लक्ष्मी या भगवान विष्णु की जिस सौम्य और मानवीय छवि को पूजते हैं, उसे जन-जन तक पहुँचाने वाले शिल्पी राजा रवि वर्मा थे। १८९६ के कालखंड में उनके द्वारा बनाई गई सरस्वती की पेंटिंग ने भारतीय घरों के पूजा-स्थलों की परिभाषा ही बदल दी।....
राजा रवि वर्मा ऐसे चित्रकार थे जिन्होंने साधारण भारतीय स्त्री के सौंदर्य, भाव और गरिमा में देवीत्व का रूप देखा। उनसे पहले देवी-देवताओं की कल्पना अधिकतर प्रतीकात्मक या शिल्पकला तक सीमित थी, लेकिन रवि वर्मा ने पहली बार उन्हें मानवीय, सजीव और पहचाने जा सकने वाले चेहरे दिए।
उन्होंने देवी लक्ष्मी, सरस्वती, पार्वती, सीता, द्रौपदी जैसी पौराणिक स्त्रियों को भारतीय घर-आँगन की स्त्रियों की तरह चित्रित किया-साड़ी, आभूषण, भाव-भंगिमा सब कुछ परिचित। इसी कारण आम जन पहली बार देवी-देवताओं से भावनात्मक रूप से जुड़ पाया।
अक्सर लोग कौतूहलवश पूछते हैं कि क्या रवि वर्मा किसी रियासत के राजा थे? क्या उन्होंने कोई युद्ध जीता था? सत्य तो यह है कि उनके पास न कोई मुकुट था, न कोई सेना। उन्हें 'फादर ऑफ मॉडर्न इंडियन आर्ट' कहा जाता है। उनकी सत्ता तो रंगों और रेखाओं के उस असीमित साम्राज्य पर थी, जिसे उन्होंने स्वयं निर्मित किया था। वे एक ऐसे विलक्षण चित्रकार थे, जो भारतीय पौराणिक कथाओं, देवी-देवताओं और महाकाव्य के पात्रों को यूरोपीय एकेडमिक शैली में चित्रित करने के लिए विश्वभर में जाने जाते हैं।
कलात्मक यात्रा का आरंभ....
२९ अप्रैल १८४८ को केरल के किलिमन्नूर के एक कुलीन परिवार में जन्मे रवि वर्मा के भीतर कला बचपन से ही रची-बसी थी। महज पाँच साल की उम्र में वे घर की दीवारों को कोयले और चॉक से अपनी कल्पनाओं का दर्पण बना देते थे। उनके चाचा राजा राजा वर्मा ने इस चिंगारी को पहचाना और उसे प्रोत्साहन दिया। १४ वर्ष की आयु में जब वे तिरुवनंतपुरम आए और महाराजा आयिल्यम तिरुनाल से मिले, तो उनकी कला को एक नया क्षितिज प्राप्त हुआ।
रवि वर्मा की चित्रकला यात्रा में पश्चिमी शैली और ऑयल पेंटिंग तकनीक का आगमन एक निर्णायक मोड़ था। इस नवीन कला-दृष्टि का प्रशिक्षण उन्हें थियोडोर जेंसन से प्राप्त हुआ-वे डच चित्रकार थे, जो १८६८ में त्रिवेंद्रम पैलेस आए थे। जेंसन के सान्निध्य में रवि वर्मा ने रंगों, प्रकाश और यथार्थवाद की बारीकियों को आत्मसात किया।
इसी नवशैली में महाराजा तथा राजपरिवार के सदस्यों के चित्र रचते हुए रवि वर्मा ने दरबारी कला को एक नया सौंदर्यबोध प्रदान किया। उनकी प्रसिद्ध कृति ‘मुल्लप्पू चूडिया नायर स्त्री’ ने उन्हें व्यापक ख्याति दिलाई और भारतीय चित्रकला में उनकी विशिष्ट पहचान स्थापित की। वर्ष १८७३ में चेन्नई में आयोजित चित्र प्रदर्शनी में उन्हें प्रथम पुरस्कार से सम्मानित किया गया—यह उनकी कला-प्रतिभा की औपचारिक स्वीकृति थी। आगे चलकर उनकी चित्रकला की गूंज यूरोप तक पहुँची; ऑस्ट्रिया के विएना में आयोजित एक प्रदर्शनी में भी उनके कार्य को पुरस्कृत किया गया। विशेष रूप से उनकी अमर कृति ‘शकुंतला’ को १८७६ में सम्मानित किया गया, जिसने भारतीय मिथकीय संवेदना और पश्चिमी यथार्थवादी तकनीक के अद्वितीय संगम को विश्वमंच पर प्रतिष्ठित किया।
इसे भी पढ़िए :- गांधी और राम- भारत की आत्मा के दो स्वर
एक कलाकार का जीवन अक्सर विरोधाभासों से भरा होता है। १८ वर्ष की आयु में उनका विवाह १२ वर्षीय पुरताठी (भागीरथी थम्बूरत्ती) से हुआ। जहाँ रवि वर्मा का हृदय कालिदास के `मेघदूत' जैसी कल्पनाओं और काव्यात्मक प्रेम से ओतप्रोत था, वहीं उनकी पत्नी अत्यंत व्यावहारिक और कला के प्रति उदासीन थीं। उनके लिए पेंटिंग करना समय की बर्बादी मात्र था।
पत्नी के भीतर कलात्मक संवेदनाओं के अभाव ने रवि वर्मा को एकाकी बना दिया। यही कारण था कि उन्होंने अपनी प्रेरणाओं को घर की दहलीज के बाहर तलाशना शुरू किया। चाहे वह त्रावणकोर की कामिनी हो या मुंबई की प्रसिद्ध सुगंधा-ये महिलाएँ उनके चित्रों की आत्मा बनीं। कहा जाता है कि सुगंधा का चेहरा उनकी कई कालजयी कृतियों में झलकता है। प्रसिद्ध लेखक रणजीत देसाई के अनुसार, रवि वर्मा और उनकी पत्नी के बीच संस्कारों और वैचारिक भिन्नता की एक ऐसी गहरी खाई थी, जिसे प्रेम का सेतु भी कभी पार न कर सका।
राजा रवि वर्मा की विशेषता यह थी कि उन्होंने यूरोपीय यथार्थवादी शैली और तेल रंग तकनीक को भारतीय विषयों के साथ सफलतापूर्वक जोड़ा। इससे भारतीय चित्रकला को एक नई पहचान मिली। उनकी बनाई देवी-देवताओं की छवियाँ आज भी लोगों की कल्पना का आधार हैं। वे भारतीय चित्रकला के ऐसे महान कलाकार थे, जिन्होंने कला को राजमहलों और मंदिरों की सीमाओं से निकालकर आम जनमानस तक पहुँचाया। उनकी पेंटिंग्स केवल चित्र नहीं थीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, पौराणिक कथाओं और मानवीय भावनाओं की सजीव अभिव्यक्ति थीं।
भारत के कला-जगत में राजा रवि वर्मा ने परंपराओं को तोड़कर कला का लोकतंत्रीकरण किया। उन्हें अक्सर ‘किट्सच का सम्राट’ कहा गया, लेकिन इसी लोकप्रियता ने उन्हें हर घर का जाना-पहचाना नाम बना दिया। लेखिका कल्पना सुंदर उनके जीवन, कला और विरासत का सूक्ष्म अध्ययन करती हैं।
मेनका की मृगनयनी दृष्टि, कमल पर विराजमान देवी लक्ष्मी, गरुड़ पर आरूढ़ भगवान विष्णु, या फल थामे मासूम स्त्रा-ये सभी राजा रवि वर्मा की अमर कृतियाँ हैं। भारत में, विशेषकर दक्षिण भारत में, शायद ही कोई ऐसा घर हो जहाँ उनकी कोई छवि न मिले, खासकर पूजा कक्ष में, जहाँ उनके चित्र देवताओं को मानवीय रूप और आत्मीयता प्रदान करते हैं।
शकुंतला: राजा रवि वर्मा की सबसे प्रसिद्ध पेंटिंग मानी जाती है। इसमें शकुंतला को काँटा निकालने या फूल तोड़ने के बहाने पीछे मुड़कर देखते हुए दर्शाया गया है। इसमें लज्जा, प्रेम और स्त्री-सौंदर्य की कोमलता अत्यंत प्रभावशाली ढंग से उभरती है।
हंसा दमयंती: इस पेंटिंग में दमयंती को एक हंस से राजा नल के बारे में सुनते हुए दिखाया गया है। इसमें जिज्ञासा, आश्चर्य और मासूम भावों का सुंदर संयोजन है।
मोहिनी ऑन द स्विंग: इसमें मोहिनी को झूले पर बैठा दर्शाया गया है। बहते वस्त्र, सौम्य भाव और संतुलित रचना इस चित्र को विशेष बनाते हैं।
लेडी इन मूनलाइट: यह एक शांत और विचारमग्न स्त्री का चित्र है, जिसमें चाँदनी की रोशनी वातावरण को रहस्यमय और भावुक बना देती है।
द मिल्कमेड (दूधवाली): इसमें एक साधारण ग्रामीण युवती को आत्मविश्वास और गरिमा के साथ चित्रित किया गया है।
द्रौपदी वस्त्रहरण: महाभारत के प्रसंग पर आधारित यह अत्यंत भावनात्मक और नाटकीय चित्र है, जिसमें द्रौपदी की पीड़ा और ईश्वर पर विश्वास को दर्शाया गया है।
जटायु वध: रामायण से प्रेरित इस चित्र में जटायु और रावण के युद्ध को शक्तिशाली रूप में प्रस्तुत किया गया है।
अहिल्या: इस पेंटिंग में अहिल्या को एक वृक्ष के सहारे चिंतनमग्न दिखाया गया है, जिसमें पश्चाताप और प्रतीक्षा की भावना स्पष्ट है।
उन्होंने `लिथोग्राफिक प्रेस' की स्थापना कर अपनी कला को राजाओं के महलों से निकालकर गरीबों की झोपड़ियों तक पहुँचा दिया। उन्होंने ईश्वर को आम आदमी जैसा चेहरा दिया, जिससे लोग जुड़ाव महसूस कर सकें। सन् १९०४ में ब्रिटिश हुकूमत ने उनकी कला की महत्ता को स्वीकार करते हुए उन्हें 'कैसरी-ए-हिंद' स्वर्ण पदक से नवाजा। उस समय के वायसराय लॉर्ड कर्जन ने जब उन्हें इस सम्मान से विभूषित किया, तब पहली बार उनके नाम के आगे औपचारिक रूप से 'राजा' शब्द जोड़ा गया। यह उपाधि किसी भूमि की जागीर नहीं, बल्कि उनकी कलात्मक श्रेष्ठता का सम्मान थी।
रवि वर्मा भारत के सबसे 'प्रोलिफिक' कलाकारों में से एक थे। उन्होंने मात्र ५८ वर्ष की आयु में लगभग २,००० से अधिक चित्र बनाए। उनकी कृतियाँ अंतरराष्ट्रीय नीलामियों में बेहद ऊँची कीमतों पर बिकी हैं-
दमयंती: न्यूयॉर्क में १.६ मिलियन डॉलर में नीलाम हुई।
राधा इन द मूनलाइट (१८९०): लगभग २०० करोड़ रुपये में बिकी। तिलोत्तमा (२०१८): ७.९५ लाख डॉलर में सोथबीज़ (न्यूयॉर्क) में नीलाम हुई।
कला क्यूरेटर रूपिका चावला अपनी पुस्तक Raरa Raन्ग् न्न्arस्a: झ्aग्हूी दf ण्दत्दहग्aत् घ्ह्ग्a में लिखती हैं: ‘उन्होंने जिन चित्रों को बनाना चाहा, उनके विषय, विधा और माध्यम का उन्होंने सचेत रूप से चयन किया। देवताओं और नायकों के भव्य ऐतिहासिक चित्र तथा धनवान और शक्तिशाली लोगों के पोर्ट्रेट-यही उनके प्रमुख विषय थे।’
उनकी शैली में बनावट, प्रकाश और छाया का ऐसा प्रयोग मिलता है जो चित्रों को जीवंत कर देता है। भारत में प्रचलित एक प्रसिद्ध कथन है कि उनकी पेंटिंग्स में आप लगभग रेशमी साड़ियों की सरसराहट सुन सकते हैं। कोच्चि की कलाकार बिंधी राजगोपाल कहती हैं, ‘उनकी विशेषता चरम यथार्थवाद थी-हर पोशाक और हर आभूषण बिल्कुल असली जैसा दिखाई देता है।’
विवाद और विरासत
१८९४ में लोनावला में लिथोग्राफिक प्रिंटिंग प्रेस की स्थापना उनके जीवन का निर्णायक मोड़ था। यहाँ से 'ओलियोग्राफ' तैयार किए जाते थे जो देखने में ऑयल पेंटिंग जैसे लगते थे। इस पहल ने जाति-आधारित भेदभाव को भी चुनौती दी, क्योंकि अब हर कोई धार्मिक चित्रों तक समान रूप से पहुँच बना सकता था।
स्वामी विवेकानंद की शिष्या सिस्टर निवेदिता ने उनकी सराहना करते हुए कहा था कि उन्होंने चित्रकला को स्वदेशी और राष्ट्रवाद की सेवा में लगाया। उनके पर-पर-पौत्र श्रीकुमार वर्मा बताते हैं कि रवि वर्मा अत्यंत प्रगतिशील थे। उनके प्रेस में काम करने वालों में से एक दादासाहेब फाल्के भी थे, जिन्हें उन्होंने आर्थिक सहायता दी और जिनकी पहली फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' रवि वर्मा की कला से गहराई से प्रभावित थी।
हालाँकि, उनकी कला को आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ा। पारदर्शी वस्त्रों में सजी स्त्रियों के चित्रों ने तत्कालीन समाज में विवाद पैदा किए। कला इतिहासकार रतन परिमू जैसे आलोचकों ने उन पर 'अश्लीलता' को बढ़ावा देने का तर्क दिया। स्वतंत्रता के बाद उनकी कला के प्रति रुचि कम हो गई थी, लेकिन १९९३ में राष्ट्रीय संग्रहालय में आयोजित प्रदर्शनी के बाद उनकी लोकप्रियता पुनः लौटी।
२ अक्टूबर १९०६ को यह महान ज्योतिपुंज बुझ गया, लेकिन उनके रंगों की चमक आज भी फीकी नहीं पड़ी है। आज १९७९ से उनकी कृितयों को ‘राष्ट्रीय धरोहर’ घोषित किया गया है। पिल्लै कहते हैं कि उनकी खास बात उनकी महत्वाकांक्षा और संघर्ष करने की क्षमता थी।
'राजा रवि वर्मा ने भारतीय कला को आधुनिकता का वह वसंत उपहार में दिया, जिसने पत्थर की मूर्तियों को इंसानी भावनाओं के रंगों से सराबोर कर दिया।'
पंकज कुमार झा
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Angry
0
Sad
0
Wow
0